Aligarh News: नियो-कॉन : नवजात एवं बाल स्वास्थ्य के लिए क्रांति

हिन्दुस्तान, अलीगढ़
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Aligarh News: बोले अलीगढ़ नियो-कॉन : नवजात एवं बाल स्वास्थ्य के लिए क्रांति अलीगढ़ । वरिष्ठ

Aligarh News: नियो-कॉन : नवजात एवं बाल स्वास्थ्य के लिए क्रांति

Aligarh News: बोले अलीगढ़ नियो-कॉन : नवजात एवं बाल स्वास्थ्य के लिए क्रांतिअलीगढ़ । वरिष्ठ संवाददाताचिकित्सा विज्ञान में नवजात शिशु देखभाल और बाल रोग सबसे संवेदनशील, तेजी से विकसित होने वाले क्षेत्र हैं। अलीगढ़ में आयोजित राष्ट्रीय चिकित्सा सम्मेलन 'नियो-कॉन 2026' देशभर के चिकित्सकों ने शिरकत की। यह सम्मेलन सिर्फ चिकित्सकों का जमावड़ा नहीं बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आ रहे तकनीकी बदलाव के आदान प्रदान का पल रहा। जहां देशभर से आए चिकित्सकों ने नवजात स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर मंथन किया। साथ ही उन्होंने तकनीक की भी जानकारी दी।सम्मेलन में देशभर से आए शीर्ष बाल रोग विशेषज्ञों, नवजात शिशु विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने नवजात मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में कमी लाने, अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीकों के अनुप्रयोग, तथा समय पूर्व पैदा हुए बच्चों की जीवन रक्षा प्रणाली पर गहन मंथन किया।

विशेषज्ञों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया कि नवजात शिशुओं की उत्तरजीविता और जीवन की गुणवत्ता में सुधार केवल उन्नत दवाओं से नहीं, बल्कि समय पर निदान, साक्ष्य-आधारित देखभाल और आधुनिक प्रौद्योगिकियों के त्वरित अंगीकरण से संभव है। विशेषज्ञों ने समय पूर्व जन्म और कम वजन वाले बच्चे पर कहा कि वैश्विक स्तर पर और विशेष रूप से भारत में नवजात मृत्यु का एक मुख्य कारण प्री-टर्म बर्थ है। सम्मेलन में सरफैक्टेंट थेरेपी, नॉन-इन्वेसिव वेंटिलेशन और उन्नत इनक्यूबेटर तकनीकों पर विस्तृत प्रदर्शन प्रस्तुत किए गए। बर्थ एस्फिक्सिया एवं थेराप्यूटिक हाइपोथर्मिया जैसी समस्या में जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी से मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए 'कूलिंग थेरेपी' के उपयोग पर विशेषज्ञों ने अपने अनुभव साझा किए। एनआईसीयू में होने वाले अस्पताल-जनित संक्रमणों को रोकने के लिए 'जीरो-टोलरेंस स्वच्छता प्रोटोकॉल' और एंटीबायोटिक स्टेवर्डशिप पर जोर दिया गया।जन्म के पहले 60 सेकेंड संवेदनशीलविशेषज्ञों के अनुसार, नवजात शिशु की सुरक्षा तीन प्रमुख चरणों पर निर्भर करती है। गर्भधारण के दौरान, जन्म के तुरंत बाद और जन्म के प्रथम 28 दिन अहम हैं। ऐसे में कंगारू मदर केयर कम वजन और समय से पहले जन्मे बच्चों के लिए त्वचा से त्वचा का संपर्क शरीर का तापमान बनाए रखने, संक्रमण से बचाने और वजन बढ़ाने में वरदान साबित होता है। जन्म के पहले 60 सेकेंड नवजात के जीवन के लिए अति संवेदनशील होते हैं। इस दौरान त्वरित रिससिटेशन, थर्मल मैनेजमेंट (गर्मी बनाए रखना) और गर्भनाल देरी से काटना आवश्यक है। जन्म के प्रथम 1 घंटे के भीतर पहला गाढ़ा दूध (कोलोस्ट्रम) पिलाना बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए सर्वोत्तम टीका माना गया है। वहीं जन्मजात विकारों की प्रारंभिक जांच जैसे थायराइड, जी6पीडी, सुनने की क्षमता की जांच और जन्मजात हृदय रोगों की पल्स ऑक्सीमेट्री से जांच अनिवार्य रूप से होनी चाहिए।सीएमई के आयोजन मजबूत होता है स्वास्थ्य ढांचाराष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के चिकित्सा सम्मेलनों का आयोजनों केवल ज्ञान साझा करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह देश के स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने में बहुआयामी भूमिका निभाता है। चिकित्सा क्षेत्र निरंतर परिवर्तनशील है। नियो-कॉन जैसे आयोजनों से टियर-2 और टियर-3 शहरों के चिकित्सकों को वैश्विक स्तर पर हो रहे नवीनतम अनुसंधानों और गाइडलाइन्स की जानकारी मिलती है। देश भर के अस्पतालों और नर्सिंग होम में नवजात शिशु देखभाल के मानकीकृत प्रोटोकॉल लागू करने में मदद मिलती है। ऐसे आयोजन से ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों के डॉक्टरों का बड़े मेडिकल कॉलेजों और सुपर-स्पेशलिटी सेंटरों के विशेषज्ञों से सीधा संपर्क स्थापित होता है, जिससे गंभीर मरीजों का समय पर सही जगह रेफरल संभव हो पाता है। इन सम्मेलनों से निकलने वाले निष्कर्षों और शोध-पत्रों का उपयोग सरकारें राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों जैसे- सांस अभियान, नवजात शिशु सुरक्षा कार्यक्रम की नीतियां बनाने में करती हैं।चिकित्सा प्रौद्योगिकी में तेजी से बदलावचिकित्सा प्रौद्योगिकी तेजी से बदल रही है। एआई-आधारित मॉनिटरिंग, पॉइंट-ऑफ-केयर अल्ट्रासाउंड, टेली-एनआईसीयू और ऑटोमेटेड मैकेनिकल वेंटिलेशन जैसी तकनीकों ने नवजात देखभाल का परिदृश्य बदल दिया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय चिकित्सक समुदाय इन तकनीकों को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार है? सकारात्मक पहलू एवं तत्परता की बात करें तो युवा चिकित्सकों मेंनई तकनीक को लेकर उत्साह है। नई पीढ़ी के डॉक्टर डिजिटल हेल्थ, रोबोटिक सर्जरी और एआई टूल्स को अपनाने के लिए अत्यधिक उत्सुक और सहज हैं। जटिल मामलों में मानवीय त्रुटि को कम करने के लिए डॉक्टर एआई-आधारित बिलीरुबिन स्कैनर, गैर-आक्रामक हीमोग्लोबिन मॉनिटर और वेंटिलेटर ऑटो-ट्यूनिंग को अपना रहे हैं। टेली-एनआईसीयू दूरस्थ क्षेत्रों में बैठे डॉक्टरों द्वारा महानगरों के विशेषज्ञों से टेली-एनआईसीयू के माध्यम से परामर्श लेने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है।छोटे शहरों तक हो तकनीक की पहुंचटियर-2 और टियर-3 शहरों तक तकनीक की पहुंच आसान है। पर छोटे शहरों के लिए अभी भी चुनौती का विषय है। छोटे शहरों और ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में इनका बजट जुटाना एक बड़ी चुनौती है। लागत एवं ढांचागत कमी उन्नत उपकरण अत्यधिक महंगे हैं। साथ ही अगर तकनीक मिल भी जाए तो केवल उपकरण खरीदना पर्याप्त नहीं है, पैरामेडिकल स्टाफ और डॉक्टरों को इनके सही संचालन का व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलना अनिवार्य है। डिजिटल और स्मार्ट तकनीकों के सुचारू संचालन के लिए निर्बाध बिजली और हाई-स्पीड इंटरनेट की आवश्यकता होती है, जो अभी भी कई ग्रामीण इलाकों में उपलब्ध नहीं है।-----------------------नियो-कॉन 2026 का आयोजन अलीगढ़ में होना हम सभी के लिए गर्व की बात है। प्री-टर्म शिशुओं में सरफैक्टेंट थेरेपी और वेंटिलेशन तकनीक पर हुई चर्चा से कई नई बातें सीखने को मिलीं। यह आयोजन स्थानीय स्तर पर नवजात स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने में बेहद दूरगामी और मददगार साबित होगा।डॉ. अभिषेक शर्मासमय पूर्व जन्मे और कम वजन वाले बच्चों को बचाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। सम्मेलन में नॉन-इन्वेसिव वेंटिलेशन और आधुनिक इनक्यूबेटर के व्यावहारिक प्रदर्शन ने हमारी समझ को और मजबूत किया है। इस तकनीकी ज्ञान से हम गंभीर नवजात शिशुओं को बेहतर जीवन प्रदान करने में सक्षम होंगे।डॉ. प्रदीप बंसलबर्थ एस्फिक्सिया के दौरान ऑक्सीजन की कमी से बच्चों के मस्तिष्क को भारी नुकसान पहुँचता है। इस सम्मेलन में 'कूलिंग थेरेपी' (थेराप्यूटिक हाइपोथर्मिया) पर हुए अनुभव साझाकरण ने हमें यह सिखाया कि कैसे शुरुआती 6 घंटों में सही तकनीक से बच्चे को आजीवन विकलांगता से बचाया जा सकता है।डॉ. यश जैनएनआईसीयू में अस्पताल-जनित संक्रमण नवजात मृत्यु का एक मुख्य कारण बनते हैं। 'जीरो-टोलरेंस स्वच्छता प्रोटोकॉल' पर दी गई जानकारी अत्यंत उपयोगी थी। यदि हम इन मानकों का कड़ाई से पालन करें, तो एनआईसीयू में संक्रमण दर को लगभग शून्य के स्तर पर लाया जा सकता है।डॉ. समरजीत विश्वासएंटीबायोटिक स्टेवर्डशिप आज के दौर की सबसे बड़ी आवश्यकता है। शिशुओं में अनावश्यक एंटीबायोटिक का प्रयोग बेहद खतरनाक हो सकता है। नियो-कॉन में विशेषज्ञों ने साक्ष्य-आधारित चिकित्सा पर जोर दिया, जो हमें अंधाधुंध दवाओं के प्रयोग से बचाकर लक्षित उपचार की दिशा में स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करता है।डॉ. नीलम मंधारयह सम्मेलन सिर्फ एक अकादमिक बैठक नहीं था, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक को धरातल पर उतारने की एक साझा कोशिश थी। अलीगढ़ के बाल रोग विशेषज्ञों के लिए राष्ट्रीय स्तर के शोधकर्ताओं और विचारकों से सीधे जुड़ने और सीखने का यह एक ऐतिहासिक अवसर रहा है।डॉ. संजीव कुमार, मुख्य आयोजनकर्ताकम वजन वाले बच्चों के लिए कंगारू मदर केयर और एडवांस थर्मल मैनेजमेंट पर विशेषज्ञों का मार्गदर्शन बहुत ज्ञानवर्धक था। छोटी-छोटी सावधानियां और सही तकनीक से शिशु मृत्यु दर में भारी कमी लाई जा सकती है, यह संदेश इस मंच से बेहद स्पष्ट रूप से मिला।डॉ. रजत कुमारसम्मेलन में प्रस्तुत शोध-पत्रों से यह पूरी तरह स्पष्ट हुआ कि नवजात शिशुओं की जान बचाने के लिए केवल दवाइियाँ काफी नहीं हैं। त्वरित निदान, सटीक मॉनिटरिंग और आधुनिक उपकरणों का सही समय पर उपयोग ही बेहतर परिणाम दे सकता है। यह आयोजन बेहद व्यावहारिक रहा।डॉ. सुनील गुप्ताअलीगढ़ जैसे टियर-2 शहर में नियो-कॉन का आयोजन यहाँ की स्वास्थ्य प्रणाली में नई ऊर्जा भर गया है। स्थानीय चिकित्सकों को बिना किसी बड़े महानगर में जाए, अपने ही शहर में वैश्विक स्तर की नई चिकित्सा तकनीकों की प्रत्यक्ष जानकारी और प्रशिक्षण प्राप्त हुआ है।डॉ. रवि सूदएनआईसीयू में इस्तेमाल होने वाले वेंटिलेटर और मॉनिटरिंग सिस्टम में तेजी से तकनीकी बदलाव आ रहे हैं। इस सम्मेलन ने हमें नई पीढ़ी की मशीनों से रूबरू कराया। अब हम अपने अस्पतालों में जटिल से जटिल नवजात रोगों का इलाज अधिक आत्मविश्वास के साथ कर सकेंगे।डॉ. पंकज मिश्राशिशु मृत्यु दर (IMR) को घटाना हमारा प्राथमिक लक्ष्य है। सम्मेलन में 'गोल्डन आवर' यानी जन्म के पहले घंटे की देखभाल पर जो जोर दिया गया, वह बेहद महत्वपूर्ण है। यदि इस अवधि में सही प्रबंधन हो तो हजारों मासूमों की जान आसानी से बचाई जा सकती है।डॉ. अशोक अग्रवालनियो-कॉन में कूलिंग थेरेपी के लाइव डेमो और केस स्टडीज ने बहुत प्रभावित किया। कई बार जानकारी के अभाव में बर्थ एस्फिक्सिया के मरीज सही इलाज से वंचित रह जाते थे। अब हम स्थानीय स्तर पर ही इस थेरेपी का प्रभावी उपयोग करने में सक्षम होंगे।डॉ. प्रदीप कुमारसम्मेलन का सबसे बेहतरीन पहलू इसका व्यावहारिक दृष्टिकोण था। विशेषज्ञों ने सिर्फ सिद्धांत नहीं पढ़ाए, बल्कि जमीनी स्तर की चुनौतियों और उनके तकनीकी समाधानों पर खुलकर बात की। अलीगढ़ के चिकित्सा जगत के लिए यह आयोजन मील का पत्थर सिद्ध होगा।डॉ. अरविंद हरि गुप्तानवजात शिशु देखभाल में तकनीक का एकीकरण बेहद जरूरी हो चुका है। एआई और स्मार्ट मॉनिटरिंग जैसी आधुनिक प्रणालियों ने डॉक्टरों का काम आसान किया है। नियो-कॉन ने यह साबित कर दिया कि भारतीय डॉक्टर नई तकनीकों को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।डॉ. राजीव सिंघलसमय से पूर्व जन्मे बच्चों में फेफड़ों की अपरिपक्वता एक गंभीर समस्या है। सरफैक्टेंट थेरेपी को देने के नए और कम दर्दनाक तरीकों पर हुई चर्चा से हमें क्लिनिकल प्रैक्टिस में बहुत आसानी होगी। यह एक बेहद उपयोगी व्याख्यान रहा।डॉ. चिजरंजन सिंहसंक्रमण नियंत्रण के लिए 'जीरो-टोलरेंस' की नीति अपनाना एनआईसीयू के लिए जीवन रेखा समान है। हाथ धोने की सही तकनीक से लेकर हवा के शुद्धिकरण तक, सम्मेलन में बताए गए छोटे-छोटे सुरक्षा बिंदु हमारे अस्पताल प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव लाएंगे।डॉ. पीके शर्माएक शोधकर्ता के रूप में, मुझे देश भर से आए डेटा और केस स्टडीज को देखकर बहुत खुशी हुई। भारत में नवजात शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो रहे वैज्ञानिक शोध अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के समकक्ष हैं। इस सम्मेलन ने हमें नए विचार दिए।डॉ. वाईके द्विवेदीअलीगढ़ को इस आयोजन से बहुत बड़ा फायदा हुआ है। इस सम्मेलन के बाद स्थानीय क्लीनिकों और अस्पतालों में नवजात देखभाल के तरीकों में मानकीकरण आएगा। मरीजों को अब उच्च स्तरीय इलाज के लिए बड़े शहरों की ओर नहीं भागना पड़ेगा।डॉ. आलोक कुलश्रेष्ठबच्चों की देखभाल में साक्ष्य-आधारित प्रैक्टिस का महत्व बहुत अधिक है। पुराने ढर्रे को छोड़कर आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की दिशा में यह सम्मेलन हम सभी बाल रोग डॉक्टरों के लिए एक आँख खोलने वाला अनुभव रहा।डॉ. खान वासिफबबल सीपीएपी जैसी नॉन-इन्वेसिव सांस लेने की तकनीकें कम खर्चीली और बेहद असरदार हैं। छोटे शहरों के अस्पतालों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं हैं। नियो-कॉन ने हमें ऐसी किफायती और जीवनरक्षक तकनीकों के कुशल संचालन की बारीकियाँ सिखाईं।डॉ. सचिन वार्ष्णेयनवजात मृत्यु दर को कम करने के लिए समय पर रेफरल और शुरुआती उपचार बहुत जरूरी है। सम्मेलन में विशेषज्ञों के बीच बना यह नेटवर्किंग ग्रुप ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य केंद्रों के बीच की दूरी को कम करने में भी काफी मददगार साबित होगा।डॉ. मनाजीरअलीचिकित्सा क्षेत्र में ज्ञान का निरंतर अद्यतनीकरण बहुत जरूरी है। नियो-कॉन 2026 ने दो दिनों में हमें जितना व्यावहारिक ज्ञान दिया, वह महीनों की किताबों की पढ़ाई से ज्यादा प्रभावी है। ऐसे आयोजन हर वर्ष आयोजित किए जाने चाहिए।डॉ. रोहित वार्ष्णेयप्री-टर्म बच्चों की देखभाल में केवल दवाएं नहीं, बल्कि तापमान का नियंत्रण और सही पोषण मुख्य भूमिका निभाते हैं। उन्नत इनक्यूबेटर और इन्फेंट वार्मर के सही संचालन पर दिया गया व्याख्यान हम सभी शिशु विशेषज्ञों के लिए बेहद व्यावहारिक था।डॉ. आयशानियो-कॉन 2026 ने अलीगढ़ को मेडिकल एजुकेशन के मानचित्र पर मजबूती से स्थापित कर दिया है। यहाँ से प्राप्त तकनीकी ज्ञान और प्रोटोकॉल का पालन करके हम अलीगढ़ और आसपास के जिलों में नवजात शिशुओं की जान बचाने में नई मिसाल कायम करेंगे।डॉ. इरज

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