प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक शिवकुमार नहीं रहे

Last Modified: Sun, Sep 02 2018. 20:30 IST
offline

हाथरस में जन्मे शिव कुमार फिल्मी दुनिया में पूनम की रात से कैरियर की शुरुआत की भादों सप्तमी को अंधेरी रात में जन्माष्टमी से एक दिन पहले शिव कुमार अस्त हो गए। सासनी के देदामई के रहने वाले शिवकुमार ने कई फिल्मों में ब्रज की देहरी को दिखाया। वर्ष 1965 बालीबुड की दुनिया में कदम रखा। ब्रजभूमि सहित कई फिल्मों में निर्देशक से लेकर किरदार निभाया है। ब्रज क्षेत्र में अपनी फिल्मों में धूम मचाने वाले अभिनेता शिवकुमार पाठक को लंबी बीमारी के बाद उनकी ननिहाल गांव देदामई में रविवार को निधन हो गया। जिसे लेकर क्षेत्र में शोक की लहर दौड गई। पूर्व केन्द्रीय मंत्री, विधायक से लेकर मुम्बई तक से लोगों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

हरे कांच की चूड़ियां सिल्वर जुबली हिट हुई

कॉलेज के ही दिनों में फिल्मी अखबार ‘स्क्रीन में निर्माता-निर्देशक किशोर साहू ने ‘नए चेहरों की तलाश का विज्ञापन दिया तो शिवकुमार जी के दोस्तों ने उन पर दबाव डालकर उनका भी फर्म भरवा दिया। साल 1965 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘पूनम की रात तो खास नहीं चली लेकिन ‘हरे कांच की चूड़ियां सिल्वर जुबली हिट हुई । इस फिल्म ने शिवकुमार जी को एक पहचान दी। प्रेमनाथ और सुनील दत्त साहब ने मुझे हमेशा ही बहुत स्नेह दिया। ‘अहिंसा के बाद शिवकुमार जी ने फिल्म ‘आस्तिक का निर्माणशुरू किया सुनील। दत्त, मौसमी चटर्जी, मिथुन चक्रवर्ती और रति अग्निहोत्री की मुख्य भूमिकाओं वाली इस फिल्म का निर्देशन खुद शिवकुमार जी कर रहे थे ‘अलीगढ़के लोग अक्सर मुझसे कहते थे कि अपनी भाषा में भी तो कुछ बनाओ, सो मैंने साल 1982 में फिल्म ‘बृजभूमि का निर्माण और निर्देशन किया । बृजभाषा में बनी ये पहली फिल्म थी। इस फिल्म की मुख्य भूमिकाओं में राजा बुन्देला, अलका नूपुर, अरूणा ईरानी, अरूण गोविल और टम अल्टर थे और इसमें मैंने भी एक अहम भूमिका निभाई। संगीत रवीन्द्र जैन का था। महज एक महीने में बनकर तैयार हुई इस फिल्म ने गोल्डन जुबली मनाई थी।

1965 में फिल्मी कैरियर की शुरुआत

बता दें कि हिन्दी सिनेमा में सुदेश कुमार, शैलेश कुमार, राकेश पांडे, विक्रम जैसे कई अभिनेता हुए जिन्होंने दर्शकों के बीच बहुत कम समय में अपनी अच्छी पहचान बनाई लेकिन फिर जल्द ही वो गुमनामी में खो गए इन्हीं अभिनेताओं में शामिल थे शिवकुमार के नाम से मशहूर शिव कुमार पाठक जिन्होंने साल 1965 में बनी फिल्म ‘पूनम की रातसे अपना केरियर शुरू किया था और जिन्हें साल 1969 में बनी फिल्म ‘महुआ ने स्टार बना दिया था। करीब साढ़े तीन दशक के अपने करियर में शिवकुमार जी ने अभिनय के साथ-साथ फिल्मों के निर्माण और निर्देशन में भी हाथ आजमाया और सफलता हासिल की। लेकिन फिर अचानक ही वो भी गुमनामी के अंधेरों में खो गए।

दादी ने गांव में बांट दी जमीन

उनके बाकी दो भाई पुश्तैनी गांव बैम्बीरपुर के रहने वाले थे। शिवकुमार जी की मां भी जिला अलीगढ़ के एक जमींदार खानदान से थीं। शिवकुमार जीका जन्म 12 जनवरी 1942 को छोटी कसेर में हुआ था और पोते के जन्म की खुशी में उनकी दादी ने गांव के गरीबों में तीन-तीन बीघा जमीन बांटी थी। 3 भाई और 2 बहनों में शिवकुमार जी सबसे बड़े थे।कृष्णा तेरे देश में फिल्म में निर्माण, निर्देशन‘बृजभूमि के बाद शिवकुमार जी ने बृजभाषा में दो और सफल फिल्में ‘लल्लूराम (1985) और ‘माटी बलिदान की (1986)बनाईं फिल्म ‘लल्लूराम की केन्द्रीय भूमिका में वो खुद थे। साल 2000 में उन्होंने हिन्दी और बृजभाषा के मिले जुले प्रयोग के साथ फिल्म ‘कृष्णा तेरे देश में का निर्माण और निर्देशन किया। ये फिल्म निर्माण के दो साल बाद साल 2002 में प्रदर्शित हुई थी। शिवकुमार जी की शादी साल 1987 में हुई। उनकी पत्नी सुमन पाठक हाथरस के एक सम्मानित परिवार से हैं। शिवकुमार जी के परिवार में पत्नी के अलावा दो जुड़वां बेटे राम पाठक और लखन पाठक हैं। लंबी बीमारी के बाद शिवकुमार पाठक ने अपनी ननिहाल सासनी के गांव देदामई में अंतिम सांस ली। परिजनों ने उनके शव कर अंतिम संस्कार अश्रुपूर्ण नेत्रों से किया। पूर्व केन्द्रीय ऊर्जा मंत्री सतीश शर्मा, विधायक सदर हरीशंकर माहौर, नगर पालिका अध्यक्ष आशीष शर्मा,जायस चौहान एवं कई दिग्गजों ने ननिहाल देदामई पहुंचकर भावभीनी श्रद्धांजलि दी। वहीं विभिन्न संस्थाओं ने उनके निधन को अपूर्णनीय क्षति बताया है। जगह-जगह शोक सभाओं का दौर जारी है।

चार जिलों में हुई थी फिल्म की शूटिंग

कृष्णा तेरे देश में फिल्म की शूटिंग हाथरस, आगरा, मथुरा, हाथरस सहित पड़ोसी जिलों में हुई। खास बात यह है कि शहर के बागला मांटेसरी व बागला कालेज में फिल्म की शूटिंग हुई थी। जिसमें ब्रज की देहरी हाथरस शहर व देदामई के कई दृष्य है।

हिन्दुस्तान मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें
Show comments