हीमोफीलिया नहीं रोक पाया बच्चों के सपनों की उड़ान

हिन्दुस्तान, अलीगढ़
Follow us on Google News
share

खेल में बार-बार बैठना ‘आलस’ नहीं, हीमोफीलिया का हो सकता है संकेत, 90 प्रतिशत मामलों में माता-पिता शुरुआती लक्षणों को समझने में करते देरी

हीमोफीलिया नहीं रोक पाया बच्चों के सपनों की उड़ान

(विश्व हीमोफीलिया दिवस) अलीगढ़, वरिष्ठ संवाददाता। आठ साल की उम्र में आकाश जब बार-बार खेलते-खेलते बैठ जाता था, तो परिवार को लगता कि वह कमजोर या आलसी है। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह हीमोफीलिया जैसी गंभीर बीमारी का संकेत है। इलाज शुरू हुआ तो परिवार को भी भरोसा नहीं था कि बेटा सामान्य जीवन जी पाएगा। लेकिन आज वही आकाश 22 साल का हो चुका है और एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है। उसका इलाज करने वाले बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास मेहरोत्रा बताते हैं कि सही समय पर इलाज शुरू होने से ही यह संभव हुआ। ऐसे कई बच्चों की आज भी काउंसलिंग जारी है।बच्चों

में खेलते समय बार-बार बैठ जाना, जल्दी थक जाना या मामूली चोट पर लंबे समय तक खून बहना, ये लक्षण अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। जबकि, विशेषज्ञों के अनुसार यह हीमोफीलिया जैसी अनुवांशिक बीमारी का संकेत हो सकते हैं। जेएन मेडिकल कॉलेज में ऐसे बच्चों का इलाज नियमित रूप से किया जा रहा है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप बंसल का कहना है कि हीमोफीलिया खून जमाने वाले प्रोटीन (क्लॉटिंग फैक्टर) की कमी के कारण होता है। इस बीमारी में बिना किसी बड़ी चोट के भी जोड़ों के अंदर धीरे-धीरे रक्तस्राव शुरू हो सकता है, जिससे सूजन, दर्द और चलने में परेशानी होती है। करीब 90 प्रतिशत मामलों में माता-पिता शुरुआती संकेतों को समझ नहीं पाते। बच्चे के बार-बार गिरने या बैठने को सामान्य थकान मान लिया जाता है, जिससे इलाज में देरी हो जाती है। यही देरी आगे चलकर जोड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है और बच्चा दिव्यांगता की ओर बढ़ सकता है। उन्होंने बताया कि यदि बच्चे में बार-बार खून बहना, सूजन या जोड़ों में दर्द जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत जांच कराएं। समय पर फैक्टर थेरेपी, नियमित फॉलोअप और सतर्कता से बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है।.....समय पर जांच व इलाज जरूरीडॉ. विकास मेहरोत्रा बताते हैं कि हीमोफीलिया एक अनुवांशिक विकार है, जो माता-पिता से बच्चों में आता है। इसमें खून जमाने वाले फैक्टर की कमी होती है, जिससे खून का बहाव जल्दी नहीं रुकता। समय पर जांच और सही इलाज मिलने पर हीमोफीलिया से पीड़ित बच्चे भी सामान्य जीवन जी सकते हैं। नियमित दवा, फिजियोथेरेपी और सावधानी से बच्चे पढ़ाई, खेल और करियर में आगे बढ़ सकते हैं।...जागरूकता की कमीबाल रोग विशेषज्ञ डॉ. संजीव कुमार के अनुसार, साल में एक या दो बच्चे हीमोफीलिया से पीड़ित सामने आते हैं। वे बताते हैं कि जागरूकता की कमी के कारण अधिकतर मामलों में देरी से पहचान होती है। जेएन मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया पीड़ितों का इलाज होता है।

Hindustan

लेखक के बारे में

Hindustan
हिन्दुस्तान भारत का प्रतिष्ठित समाचार पत्र है। इस पेज पर आप उन खबरों को पढ़ रहे हैं, जिनकी रिपोर्टिंग अखबार के रिपोर्टरों ने की है। और पढ़ें

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।