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72 साल बाद भी अपने घर में किरायेदार हैं शरणार्थी

1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के समय शहर में आए शरणार्थी आज भी अपने घरों में किरायेदार हैं। लोहामंडी क्षेत्र के मालवीय कुंज में रहने वाले शरणार्थियों को आज भी उस समय दिए घरों का मालिकाना हक नहीं मिला है। गदर के समय भीषण हिंसा देखकर आए लोगों का कहना है कि भारत में आज भी उनके साथ पक्षपात किया जाता है।

कॉलोनी के सबसे बुजुर्ग गुरुबक्श लाल शर्मा (93) बताते हैं कि उनका जन्म गुरुदासपुर (पंजाब) में हुआ था। उनकी नौकरी में लाहौर में थी। बंटवारे के बाद सरहदें खिंचीं। उस पार हिंसा का वो रूप था, जिसे सोच कर आज भी रूह कांप जाती है। जैसे-तैसे भारत आए। भारत की सरकार ने रहने के लिए जगह दी, लेकिन शर्तें भी रखीं। उन्होंने बताया कि 20 रुपये प्रति माह के हिसाब से घर के पैसे देने पड़ते थे। आज भी वह रकम दे रहे हैं।

82 साल के महेंद्र कुमार कपूर पाकिस्तान के सरहौदा में रहते थे। उस वक्त करीब 10 साल के थे। गदर के समय उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा। पैरों में जूते तक नहीं थे। लोगों से मांग कर खाना खाते थे। भारत पहुंचे, लेकिन यहां आज तक अपने हक के लिए लड़ रहे हैं। उनका भी कहना है कि आज तक मकान के पैसे चुका रहे हैं, लेकिन मालिकाना हक नहीं मिला। नगर निगम से आज भी नोटिस आ रहे हैं। इनके अलावा मालवीय कुंज में रहने वाले अर्जुन दास राय सिंघानी (87), सुरेंद्र कुमार चालवा (77), जीवत राम (79), विनोद चंद कुमार (79) ने कहा कि वह बंटवारे के बाद आगरा पहुंचे। सभी को किरायेदार बनाकर रखा है। आज तक मालिकाना हक नहीं मिला है।

200 घर बनाए गए थे

बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए लोगों का कहना है कि शहर में उनके लिए 200 घर दिए गए थे। 120 घर मालवीय कुंज में और 80 घर मोतीकुंज में थे। उनका कहना है कि मोती कुंज और अन्य शहरों में बसे लोगों को उनके घरों का मालिकाना हक मिल चुका है, लेकिन वह आज भी भटक रहे हैं। हालांकि यह जांच का विषय है कि लोगों को मालिकाना हक मिला है या नहीं।

कई लोग बेच चुके हैं अपने घर

मालवीय कुंज में 120 लोगों को घर दिए गए थे। जिनमें शरणार्थी रहते थे।, लेकिन आज सिर्फ छह या सात परिवार ही बचे हैं। ज्यादातर लोग अपने घरों को बेच कर जा चुके हैं। प्रशासन का कहना है कि शरणार्थियों को मालिकाना हक नहीं मिलने के बावजूद घरों को बेचा गया है। उन्हें बेचने का अधिकार नहीं है।

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सरकार ने घर दिया, लेकिन किरायेदार ही बना कर रखा। जब आए थे उस समय 20 रुपये प्रति माह दिया जाता था, जबकि दो रुपये में शहर में बड़ा बंगला किराए पर मिलता था। उस वक्त मजबूरी थी, इसलिए लेना पड़ा।

गुरुबक्श लाल शर्मा

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पाकिस्तान से धक्के खाकर यहां आए। सब कुछ लुट चुका था। बड़ी मुश्किलों के बाद भारत में आए। आगरा में घर मिला, जो आज तक अपना नहीं हो सका है। मालिकाना हक के लिए आज भी लड़ रहे हैं। राज्य और केंद्र की सरकार का कोई सहयोग नहीं है।

महेंद्र कुमार कपूर

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पाकिस्तान ने सिंध क्षेत्र में रहते थे। बंटवारे के बाद वहां बहुत बुरे हालात हो गए। भाग कर भारत पहुंचे। यहां रिफ्यूजी का नाम मिला, जो आज तक हमारे साथ है। जो घर हमें दिए गए, वो आज तक हमारे नहीं हो सके हैं।

अर्जुन दास राय सिंघानी

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गदर के बाद भारत लौटे शरणार्थियों को मालवीय कुंज में रहने के लिए घर दिए गए थे। यह घर शरणार्थी पुर्नवास अधिनियम के तहत थे। उस समय 11 लाख रुपये में मालवीय कुंज को बसाया गया था। 120 लोगों को घर दिए गए थे। तब 20 रुपये लिए जाते थे। जो पक्ष हमें मिला था उसमें लिखा था कि यह घर नो प्रोफिट-नो लॉस स्कीम के तहत दिए गए थे। लेकिन तय रकम से ज्यादा देने के बाद भी आज तक घरों का मालिकाना हक नहीं मिला है।

राजेश महाजन, कोषाध्यक्ष, प्रेमसभा कल्याणकारी रिफ्यूजी कॉलोनी समिति

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बंटवारे के समय भारत में आए लोगों को स्कीम के तहत घर दिए गए थे। हमारे पास सभी गाइड लाइन मौजूद हैं। जिन्हें भी कोई दिक्कत है वह हमसे आकर मिले। आवश्यक और प्रभावी कार्यवाही कराई जाएगी।

अरुण प्रकाश, नगरायुक्त

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