
बिना सुनवाई आरोपी को बरी करना अवैध, चेक बाउंस मामले में हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में बरी करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। यह आदेश न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने चेक बाउंस के आरोपी राय अनूप प्रसाद की आठ याचिकाओं पर एकसाथ सुनवाई करते हुए दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि आरोपी न्यायालय में उपस्थित होकर मुकदमे का सामना ही नहीं कर रहा है तो केवल शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति के आधार पर सीआरपीसी की धारा 256 के तहत उसे बरी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में बरी करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। यह आदेश न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने चेक बाउंस के आरोपी राय अनूप प्रसाद की आठ याचिकाओं पर एकसाथ सुनवाई करते हुए दिया है।
कोर्ट ने याची पर 50 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया है जो उसे शिकायतकर्ता को देने होंगे। मामला आगरा की अदालत में लंबित परिवाद (कम्प्लेंट केस) से जुड़ा था, जिसमें मजिस्ट्रेट ने 29 सितंबर 2014 को शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति के आधार पर सीआरपीसी की धारा 256 के तहत आरोपी को बरी कर दिया था, जबकि रिकॉर्ड से स्पष्ट था कि आरोपी कभी भी मुकदमे की सुनवाई के लिए उपस्थित नहीं हुआ और न ही ट्रायल प्रारंभ हुआ।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 256 का उद्देश्य उस स्थिति में आरोपी को राहत देना है, जब वह नियमित रूप से अदालत में उपस्थित हो और शिकायतकर्ता जानबूझकर अनुपस्थित रहकर कार्यवाही में देरी कर रहा हो। यदि आरोपी स्वयं ट्रायल से बच रहा हो, तो उसकी अनुपस्थिति में उसे बरी किया जाना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सम्मन मामले की प्रक्रिया आरोपी की उपस्थिति से प्रारंभ होती है। सीआरपीसी की धारा 251 के तहत आरोप की जानकारी देना, धारा 254 के तहत साक्ष्य लेना और धारा 255 के तहत दोषसिद्धि या बरी का निर्णय तभी संभव है, जब आरोपी ट्रायल का सामना करे। ऐसे में बिना ट्रायल के बरी करना विधिसम्मत नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में अपील (धारा 378 सीआरपीसी) की बजाय पुनरीक्षण (धारा 397/399 सीआरपीसी) उचित उपाय था, क्योंकि आरोपी ने कभी ट्रायल का सामना ही नहीं किया था और बरी करने का आदेश प्रथम दृष्टया अवैध था। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि पुनरीक्षण अदालत के आदेश के बाद भी आरोपी लंबे समय तक सम्मन, जमानती वारंट और गैर-जमानती वारंट के बावजूद उपस्थित नहीं हुआ और सीधे धारा 482 सीआरपीसी के तहत हाईकोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में देरी करने का प्रयास माना। साथ ही आरोपी की आठों याचिकाएं खारिज करते हुए 50 हजार रुपये का संयुक्त जुर्माना शिकायतकर्ता को 30 दिन के भीतर अदा करने का निर्देश दिया।
साथ ही शिकायतकर्ता की याचिका स्वीकार करते हुए आगरा की ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि सभी संबंधित मामलों की सुनवाई चेक बाउंस के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के त्वरित सुनवाई के निर्देशों के अनुरूप शीघ्रता से पूरी की जाए। मामले के तथ्यों के अनुसार शिकायतकर्ता गोपाल प्रसाद शर्मा ने अपने परिचित राय अनूप प्रसाद (याची) से 80 लाख रुपये में नोएडा में एक फ्लैट का सौदा किया। एडवांस के तौर पर 30 लाख रुपये दिए गए। बाद में सौदा पूरा नहीं हो पाया और याची ने शिकायतकर्ता को आठ चेकों के माध्यम से धनराशि वापस की लेकिन सभी चेक बाउंस हो गए। जिसके बाद मामला अदालत पहुंचा।

लेखक के बारे में
Dinesh Rathourदिनेश राठौर लाइव हिन्दुस्तान की यूपी टीम में पिछले आठ सालों से काम कर रहे हैं। वह लाइव हिन्दुस्तान में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। कानपुर यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है। पत्रकारिता में 13 साल से अधिक का अनुभव रखने वाले दिनेश की डिजिटल मीडिया और प्रिंट जर्नलिज्म में अलग पहचान है। इससे पहले लंबे समय तक प्रिंट में डेस्क पर भी काम किया है। कुछ सालों तक ब्यूरो में भी रहे हैं। यूपी और राजस्थान के सीकर जिले में भी पत्रकारिता कर चुके हैं। यूपी की राजनीति के साथ सोशल, क्राइम की खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाते हैं। वायरल वीडियो की फैक्ट चेकिंग में दिनेश को महारत हासिल है।
और पढ़ें



