बोले काशी : सुविधाएं मिलें तो छक्के लगाएं, क्लीन बोल्ड भी करें

बोले काशी : सुविधाएं मिलें तो छक्के लगाएं, क्लीन बोल्ड भी करें

संक्षेप:

भारत की बेटियों ने भले ही विश्व कप जीतकर देश का मान बढ़ाया हो, लेकिन काशी की महिला क्रिकेट प्रतिभाएं बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं। जिस ‘हुनर’ ने देश को विश्व विजेता बनाया हैं(

Nov 17, 2025 06:12 pm ISTSandeep Kumar Shukla लाइव हिन्दुस्तान
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वाराणसी। काशी कि बेटियों की आंखों में झूलन गोस्वामी जैसा जुनून और हरमनप्रीत कौर जैसा जज्बा है। ये पिच पर पसीना बहाती हैं, लेकिन इनके सपनों के पंख आज भी सुविधाओं की कमी से कटे हुए हैं। जब देश में महिला क्रिकेट का डंका बज रहा है, तब काशी कि प्रतिभाशाली बेटियां फिजियोथेरेपिस्ट, महिला कोच और खेलने के लिए पैसों की कमी से मायूस हैं। महिला क्रिकेट खिलाड़ियों का कहना है कि अब खेल संघों को याद रखना होगा कि यह सिर्फ खेल नहीं, बल्कि देश के भविष्य का सवाल है। काशी की बेटियां हर दिन गरीबी की रेखा और खेल के जुनून के बीच की पिच पर उतरती हैं। इनके पास लोहे सा इरादा है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर सिर्फ खाली मैदान है। जब ये खिलाड़ी खुद किराया भरकर, बिना बीमा के चोट का खतरा उठाकर अभ्यास करती हैं। यह सिर्फ खेल संघों की नहीं, बल्कि पूरे शहर की जिम्मेदारी है कि वह इनके सपनों को पूरा करने के लिए आगे आएं। प्रतिभाएं सिर्फ हौसले से विश्व कप जीतेंगी या अब सुविधाएं भी मिलेंगी? सिगरा स्पोर्ट्स स्टेडियम में महिला क्रिकेट खिलाड़ियों ने हिन्दुस्तान से बातचीत के दौरान कहा कि स्टेडियम में महिला क्रिकेट खिलाड़ियों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं, स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपिस्ट की कमी के कारण असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। प्रशिक्षण के दौरान चोट लगने पर तुरंत उचित इलाज नहीं मिल पाता। महिला क्रिकेट खिलाड़ी व ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी विजेता प्राजंलि सिंह ने बताया कि सिगरा स्टेडियम में उनके लिए कोई चिकित्सा कक्ष (मेडिकल रूम) नहीं है। अभ्यास या मैच के दौरान छोटी-मोटी चोट लगने पर उन्हें प्राथमिक उपचार के लिए संघर्ष करना पड़ता है। प्रशिक्षण के दौरान मांसपेशियों में खिंचाव या अन्य खेल-संबंधी चोटों के लिए विशेषज्ञ स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपिस्ट की आवश्यकता होती है, जो यहां नहीं है। चोट लगने पर मजबूरी में निजी क्लीनिकों का सहारा लेना पड़ता है। इसमें समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है।

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हुनर है, ललक भी, पर प्लेटफॉर्म नहीं

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर व स्टेडियम में महिला कोच अजय यादव ने कहा कि सिगरा स्पोर्ट्स स्टेडियम पर नियमित अभ्यास कर रहीं महिला क्रिकेट खिलाड़ियों में राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का जुनून और प्रतिभा स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन उचित एक्सपोजर, प्रमोशन और प्लेटफार्म की कमी उनके सपनों की उड़ान में बाधा बन रही है। खिलाड़ियों और उनके प्रशिक्षकों के अनुसार, स्थानीय महिला खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा साबित करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं। खिलाड़ियों को बड़े शहरों या अन्य राज्यों की टीमों के साथ खेलने का मौका कम मिलता है। कृति पाण्डेय ने कहा कि हम घंटों अभ्यास करते हैं और अच्छा प्रदर्शन भी करते हैं, लेकिन जब तक बड़े टूर्नामेंट में खेलने का मौका नहीं मिलेगा, तब तक चयनकर्ताओं को हमारी प्रतिभा कैसे पता चलेगी? एक्सपोजर के बिना हुनर दबा रह जाता है।

साल में मात्र 5% प्रतियोगिताएं

पांच सालों से क्रिकेट खेल रहीं खिलाड़ी अत्या काजल ने कहा कि महिला क्रिकेट खिलाड़ियों का उत्साह और समर्पण आसमान छू रहा है, लेकिन उन्हें मिलने वाली प्रतियोगिताओं (टूर्नामेंट्स) की संख्या कम है। पूरे साल में महिला खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए मात्र पांच प्रतिशत ही प्रतियोगिताएं मिल पाती हैं। यह पुरुषों के लिए उपलब्ध अवसरों की तुलना में बहुत कम है। यह कमी हमारी प्रगति को रोक रही है। हमें जो गिनती के मैच मिलते हैं, उनसे हमारी प्रतिभा का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता है। साल में 2-3 टूर्नामेंट काफी नहीं हैं। हमें लगातार खेलने का मौका चाहिए। सीमित अवसर मिलने के कारण खिलाड़ियों का मनोबल प्रभावित होता है। प्राजंलि ने बताया कि अगर हमारे खिलाड़ियों को साल में 95% समय सिर्फ अभ्यास करना पड़ता है। प्रतिस्पर्धा सिर्फ 5% मिले तो वे कैसे अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार हो पाएंगी? प्रतिस्पर्धा ही सबसे बड़ा प्रशिक्षण है। वाराणसी की महिला क्रिकेटरों को अधिक से अधिक प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा को निखारेगा, बल्कि देश में महिला क्रिकेट के आधार को भी मजबूत करेगा।

प्रतिभा पर भारी पड़ रहा वित्तीय बोझ

कोमल साहू ने कहा कि महिला क्रिकेट खिलाड़ी वित्तीय बाधाओं के कारण राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना पा रही हैं। क्योंकि खिलाड़ियों को कोई स्पॉन्सरशिप (प्रायोजक) नहीं मिलता है। खेल जारी रखने के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ता है। यह दोहरा बोझ हमारी प्रगति में बड़ी रुकावट बन गया है। महिला खिलाड़ियों को अक्सर टूर्नामेंट की फीस, प्रशिक्षण शुल्क, किट (बैट, पैड, दस्ताने), यात्रा और आवास के खर्चों के लिए स्वयं या अपने परिवार पर निर्भर रहना पड़ता है। यह खर्च निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए बड़ा वित्तीय बोझ बन जाता है। वंशिका श्रीवास्तव ने बताया कि स्थानीय कारपोरेट जगत और व्यापारिक संस्थाएं पुरुष क्रिकेट या अन्य खेलों को तो स्पॉन्सर करती हैं, लेकिन महिला क्रिकेट की प्रतिभाओं को नजरअंदाज कर देती हैं। हुनर होने से क्या फायदा, जब खेलने के लिए पैसे ही न हों? कई होनहार लड़कियां सिर्फ इसलिए क्रिकेट छोड़ चुकी हैं क्योंकि उनके परिवार इतनी महंगी ट्रेनिंग और टूर्नामेंट का खर्च नहीं उठा सकते थे। खिलाड़ियों ने मांग करते हुए कहा है कि महिला टीमों और टूर्नामेंट्स के लिए प्रायोजकों को आकर्षित करने के लिए पहल की जाए, जिससे खिलाड़ियों को वित्तीय सहायता मिल सके।

महिला खिलाड़ियों की प्रगति पर ब्रेक

काजल यादव ने कहा कि पूरे क्षेत्र में महिला क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए एक भी प्रशिक्षित महिला कोच नहीं है। महिला कोच की अनुपस्थिति खिलाड़ियों को मानसिक संबल से वंचित कर रही है। तकनीकी विकास और खेल में सहजता को भी प्रभावित कर रही है। कई महिला खिलाड़ी मासिक स्वास्थ्य, शारीरिक बदलाव या खेल से जुड़ी व्यक्तिगत समस्याओं पर पुरुष कोच से खुलकर बात करने में सहज महसूस नहीं करती हैं। प्रिंशी यादव ने कहा कि एक महिला कोच होने से ये समस्याएं आसानी से हल की जा सकती हैं। युवा महिला क्रिकेटरों के लिए एक सफल महिला कोच प्रेरणास्रोत का काम करती है। बल्लेबाजी, गेंदबाजी या क्षेत्ररक्षण में महिला खिलाड़ियों की शारीरिक आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझने और प्रशिक्षण देने के लिए एक महिला विशेषज्ञ कोच की जरूरत होती है। प्रियांशी गुप्ता ने कहा कि पुरुष कोच बहुत सहयोग करते हैं, लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें हम केवल एक महिला कोच से ही कह पाते है। महिला कोच की कमी से हमें कई बार अपनी समस्या को भीतर ही दबाना पड़ता है।

निःशुल्क बस और स्पोर्ट्स हॉस्टल जरूरी

लक्ष्मीना राजभर ने कहा कि स्टेडियम आने-जाने का खर्च भी स्वयं वहन करना पड़ता है। यह आर्थिक रूप से कमजोर खिलाड़ियों के लिए बड़ी बाधा है। इसके चलते कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी बीच में ही अपने खेल करियर को छोड़ने पर मजबूर हो जाती हैं। ग्रामीण और दूर क्षेत्रों से आने वाली खिलाड़ियों को बस, ऑटो या अन्य साधनों का इस्तेमाल करना पड़ता है। इसका मासिक खर्च हजारों रुपये तक होता है। दिव्यांशी केसरी ने बताया कि यह खर्च गरीब परिवारों के लिए खेल जारी रखना असंभव बना देता है। सार्वजनिक परिवहन पर निर्भरता के कारण खिलाड़ियों का बहुत समय आने-जाने में बर्बाद होता है। अगर हमें आने-जाने की सुविधा मिल जाए, तो हमारा पूरा ध्यान सिर्फ खेल पर रहेगा। खिलाड़ियों ने मांग की कि शहर के प्रमुख प्रशिक्षण केंद्रों के लिए महिला खिलाड़ियों के लिए सुबह और शाम के अभ्यास के समय निःशुल्क रोडवेज बस सेवा शुरू की जाए। सिगरा स्टेडियम के पास या शहर के भीतर महिला क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए स्पोर्ट्स छात्रावास की सुविधा दी जाए। खेल विभाग यदि इन दोनों मांगों पर ध्यान देता है, तो यह पूर्वांचल की महिला क्रिकेट प्रतिभाओं को बड़ा सहारा देगा। खिलाड़ी बिना किसी वित्तीय चिंता के राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करेगा।

चोट लगने पर सुरक्षा कवच नहीं

प्राजंलि सिंह ने कहा कि खिलाड़ियों को प्रशिक्षण और मैच के दौरान चोट लगने पर उचित चिकित्सा देखभाल और उपचार के लिए हेल्थ इंश्योरेंस (स्वास्थ्य बीमा) की सुरक्षा भी प्राप्त नहीं है। क्रिकेट एक शारीरिक खेल है, जिसमें मांसपेशियों में खिंचाव, लिगामेंट टियर या फ्रैक्चर जैसी चोटें लगना आम बात है। इन चोटों के इलाज में बड़ा खर्च आता है। वर्तमान में चोट लगने पर खिलाड़ियों को अपना पूरा इलाज खर्च खुद उठाना पड़ता है। विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श, फिजियोथेरेपी और सर्जरी का खर्च हजारों से लाखों रुपये तक हो सकता है। यह हमारे परिवारों के लिए वहन करना कठिन है। काजल यादव ने बताया कि कई बार खिलाड़ी महंगा इलाज कराने से बचते हैं या उसमें विलंब करते हैं। इससे उनकी चोट पूरी तरह ठीक नहीं हो पाती और उनके करियर पर नकारात्मक असर पड़ जाता है। बिना किसी हेल्थ इंश्योरेंस या चिकित्सा सहायता के खिलाड़ियों को हमेशा इस बात की चिंता सताती रहती है। खिलाड़ियों को अगर कोई गंभीर चोट लगी तो उनका भविष्य क्या होगा?

पूर्वांचल को चाहिए महिला क्रिकेट स्टेडियम

अत्या काजल ने कहा कि सिगरा स्पोर्ट्स स्टेडियम में मैदान को कई अन्य खेलों के साथ साझा करना पड़ता है। इससे महिला खिलाड़ियों को पर्याप्त और अनुकूल प्रशिक्षण का समय नहीं मिल पाता है। एक समर्पित महिला क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण पूर्वांचल के पूरे खेल परिदृश्य को बदल सकता है। एक नया स्टेडियम होने पर वहां पिच, आउटफील्ड, नेट्स और पवेलियन जैसी सभी सुविधाएं महिला क्रिकेट की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाई जा सकती हैं। यह हमें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार करेंगी। महिला खिलाड़ियों का कहना है कि स्टेडियम महिला क्रिकेट को एक विशिष्ट पहचान देगा। बनारस और पूर्वांचल की महिला खिलाड़ियों में अपने मैदान पर खेलने से गौरव और आत्मविश्वास बढ़ेगा। समर्पित स्टेडियम होने से बनारस को अंतर-राज्यीय और राष्ट्रीय स्तर की महिला क्रिकेट प्रतियोगिताओं की मेजबानी करने का मौका मिलेगा। स्थानीय खिलाड़ियों को अपने घर पर ही उच्च स्तरीय एक्सपोजर मिल पाएगा। प्राजंलि ने कहा कि अपना स्टेडियम होने से हम पूरी तरह से अपने खेल पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगी। यह केवल एक मैदान नहीं होगा, बल्कि पूर्वांचल की महिला क्रिकेट को आगे बढ़ने का नया आयाम देगा।

घर की चौखट से मैदान तक

प्रियांशी गुप्ता ने कहा कि पूर्वांचल में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन सामाजिक धारणाएं और अवसरों का अभाव महिला खिलाड़ियों को घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर मैदान तक पहुंचने से रोक रहे हैं। महिला क्रिकेट को जमीनी स्तर से मजबूत करने और खिलाड़ियों को घर से बाहर निकालने के लिए स्कूलों में महिला क्रिकेट को एक अनिवार्य खेल गतिविधि के रूप में प्रमोट किया जाए। लक्ष्मीना ने कहा कि वर्तमान में ज्यादातर स्कूल महिला क्रिकेट को गंभीरता से नहीं लेते हैं। इससे प्रतिभाशाली बेटियां मुख्यधारा से दूर रह जाती हैं। ज्यादातर स्कूलों के पास महिला क्रिकेट के लिए न पिच होती है और न ही महिला खिलाड़ियों के लिए पर्याप्त किट और प्रशिक्षण की व्यवस्था है। पुरुषों के लिए होने वाले नियमित इंटर-स्कूल टूर्नामेंट की तुलना में महिला क्रिकेट के लिए स्कूल स्तर पर प्रतियोगिताओं का आयोजन लगभग न के बराबर है।

खेल संघ की अनुमति का शिकंजा

खिलाड़ियों ने बताया कि खेल संघ की औपचारिक अनुमति के बिना उन्हें किसी भी बाहरी टूर्नामेंट या चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति नहीं मिलती है। खिलाड़ियों को खेलने के लिए बार-बार संघ के अनुमोदन का इंतजार करना पड़ता है। इससे खिलाड़ियों का समय बर्बाद होता है। कई बार अंतिम तिथि निकल जाने के कारण प्रतियोगिताओं में भाग नहीं ले पाती हैं। काजल ने कहा कि हमें पता है कि हम अच्छा खेल सकते हैं, लेकिन संघ की हां के बिना हम कदम भी नहीं रख सकते हैं। यह नियंत्रण हमारे हुनर को दबा रहा है। खिलाड़ियों ने मांग करते हुए कहा है कि खेल संघ की कार्यकारी समिति और चयन पैनल में महिला क्रिकेटरों, कोचों की न्यूनतम संख्या अनिवार्य की जानी चाहिए। महिला क्रिकेट से जुड़े सभी फैसलों (टूर्नामेंट चयन, टीम चयन, फंडिंग) में पारदर्शिता लाई जाए। संघ को खिलाड़ियों के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। खेल संघों में महिलाओं के प्रभुत्व को बढ़ाना पूर्वांचल में महिला क्रिकेट के लिए आवश्यक है।

5000 रुपये की फीस से प्रतिभाएं बाहर

खिलाड़ियों के अनुसार, एक टूर्नामेंटों में भाग लेने के लिए भी प्रति खिलाड़ी कम से कम 5000 रुपये या उससे अधिक का शुल्क लिया जाता है। यह आर्थिक रूप से कमजोर और दूर-दराज के प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर रही है। कोमल साहू ने कहा कि महिला क्रिकेट के विकास को बढ़ावा देने के बजाय, यह उच्च प्रवेश शुल्क खिलाड़ियों के लिए वित्तीय रुकावट बन गया है। वंशिका ने कहा कि एक टूर्नामेंट के लिए हजारों रुपये गरीब या मध्यम वर्गीय परिवारों की खिलाड़ियों के लिए वहन करना मुश्किल होता है। कई खिलाड़ी केवल इसलिए टूर्नामेंट में भाग नहीं ले पाती हैं, क्योंकि वे इतनी बड़ी राशि का भुगतान नहीं कर सकती हैं।

हमारी व्यथा सुनें

1. प्रतियोगिताओं में लगातार भाग लेने से ही खिलाड़ियों में दबाव को झेलने और बड़े मैचों में प्रदर्शन करने का आत्मविश्वास आता है।

- अजय सिंह

2. स्टेडियम में महिला खिलाड़ियों की देखरेख के लिए कोई डॉक्टर या प्रशिक्षित नर्स उपलब्ध नहीं रहती है। इसकी व्यवस्था शीघ्र होनी चाहिए।

- प्राजंलि सिंह

3. हमें पुरुषों के समान एक्सपोजर और प्रचार मिलना ही चाहिए ताकि हम भी चयनकर्ताओं और प्रायोजकों की नजर में आ सकें।

- अत्या काजल

4. पुरुषों के लिए स्थानीय स्तर पर लीग और टूर्नामेंट आयोजित किए जाते हैं, लेकिन महिला क्रिकेट के लिए प्लेटफॉर्म न के बराबर हैं।

- कोमल साहू

5. समर्पित स्टेडियम बनने से पूर्वांचल के अन्य जिलों की महिला क्रिकेटरों के लिए स्टेडियम एक ‘टैलेंट हब’ के रूप में काम करेगा।

- दिव्यांशी केसरी

6. नियमित अंतराल पर उच्च-स्तरीय प्रतियोगिताएं न होने से महिला क्रिकेट खिलाड़ियों के खेल में आवश्यक सुधार और विकास रुक जाता है।

- कृति पाण्डेय

7. स्पोर्ट्स छात्रावास बनने से दूरदराज की महिला खिलाड़ियों को बनारस में रहकर उच्च स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त करने का मौका मिल सकेगा।

- लक्ष्मीना राजभर

8. महिला कोच की कमी से हमें मार्गदर्शन देने वाली और उन्हें समझने वाली एक सशक्त छवि का अभाव महसूस होता रहता है।

- काजल यादव

9. महिला क्रिकेट खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण, सुविधाएं और विशेषज्ञ कोच उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी संघों को लेनी ही चाहिए।

- प्रिंसी यादव

10. हेल्थ इंश्योरेंस न होना एक तरह से बिना सुरक्षा कवच के खेलने जैसा है। चोटिल खिलाड़ियों को कैशलेस उपचार मिलना चाहिए।

- प्रियांशी गुप्ता

12. जिन खिलाड़ियों के पास खेलने का जुनून है, वे भी आर्थिक तंगी के कारण उच्च-स्तरीय प्रतियोगिताओं में भाग नहीं ले पाती हैं।

- वंशिका श्रीवास्तव

सुझाव और शिकायतें

सुझाव

1. सिगरा स्टेडियम में महिला खिलाड़ियों के लिए चिकित्सा कक्ष बनाएं। प्रशिक्षण समय में अनिवार्य रूप से स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपिस्ट की नियुक्ति की जाए।

2. स्थानीय खेल संघ महिला क्रिकेट के लिए एक अनिवार्य वार्षिक कैलेंडर जारी करे और मासिक लीग का आयोजन भी सुनिश्चित किया जाए।

3. टूर्नामेंट का प्रवेश शुल्क खत्म हो। कारपोरेट जगत को खिलाड़ियों की मदद के लिए स्पॉन्सरशिप योजना शुरू करनी चाहिए, ताकि वित्तीय बोझ न पड़े।

4. सिगरा स्टेडियम में महिला कोच की तत्काल नियुक्ति करे। स्थानीय महिला खिलाड़ियों को करियर बनाने के लिए ट्रेनिंग और वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाए।

5. बनारस में महिला क्रिकेटरों के लिए नि:शुल्क स्पोर्ट्स हॉस्टल और शहर के प्रमुख प्रशिक्षण केंद्रों के लिए नि:शुल्क रोडवेज बस सेवा शुरू की जाए।

शिकायतें

1. अभ्यास के दौरान चोट लगने पर तुरंत इलाज या प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा नहीं है। स्टेडियम में स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपिस्ट भी मौजूद नहीं है।

2. पूरे साल में न के बराबर टूर्नामेंट कराए जाते हैं। पर्याप्त प्रतिस्पर्धा न मिलने से खिलाड़ियों का आत्मविश्वास और खेल स्तर पिछड़ रहा है।

3. खेलने के लिए टूर्नामेंट फीस, किट और यात्रा का खर्च खुद उठाना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर खिलाड़ी पिछड़ जाती हैं।

4. पूर्वांचल में महिला क्रिकेटरों की कोचिंग के लिए प्रशिक्षित महिला कोच नहीं है। पुरुष कोच से सभी व्यक्तिगत बातें साझा करने में संकोच होता है।

5. अभ्यास के लिए आने-जाने का खर्च खुद उठाना पड़ता है, जो महंगा है। इसके कारण ज्यादातर दूर की खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ पाती हैं।

एक नजर में

-100 महिला खिलाड़ी हैं क्रिकेट की बनारस में

-20 खिलाड़ी सिगरा स्टेडियम से जुड़ी हैं

-20 वर्षों से स्टेडियम में महिला क्रिकेटरों को मिलती है ट्रेनिंग

Sandeep Kumar Shukla

लेखक के बारे में

Sandeep Kumar Shukla
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