रेलवे के गले की फांस बने 300 करोड़ के हाइब्रिड कोच, चार किमी की ट्रैक 7 साल से ठप

आशीष श्रीवास्तव, गोरखपुर
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पूर्वोत्तर रेलवे  के करीब 300 करोड़ रुपये के 154 हाइब्रिड कोच सालों से बेकार खड़े हैं। तकनीकी खामियों के चलते इनका संचालन संभव नहीं हो पा रहा है, जबकि निर्धारित उम्र पूरी न होने से इन्हें कंडम भी घोषित नहीं किया जा सकता।

300 crore hybrid coaches have become a problem for the railways

Train News: करीब 300 करोड़ रुपये की लागत से खरीदे गए 154 हाइब्रिड कोच पूर्वोत्तर रेलवे (एनईआर) के लिए बड़ी समस्या बन गए हैं। तकनीकी खामियों के कारण सालों से बेकार खड़े इन कोचों को न तो ट्रेनों में शामिल किया जा सकता है और न ही उनकी निर्धारित परिचालन अवधि पूरी होने से पहले कंडम घोषित किया जा सकता है। जिसकी वजह से इसका असर दूसरे ट्रेनों के संचालन पर भी पड़ रहा है। ऐसे में रेलवे बोर्ड से इस संबंध में दिशा-निर्देश मांगे गए हैं।

जर्मन तकनीक के हाइब्रिड कोच 2008-09 में एनईआर को आवंटित हुए। प्रति कोच कीमत करीब दो करोड़ रुपये थी। शुरुआत में तो सब ठीक रहा लेकिन कुछ साल बाद से ही छोटे-छोटे पुर्जों की वजह से एक-एक कर बोगियां खड़ी होती गईं। 2019 तक खड़ी होने वाली बोगियों की संख्या डेढ़ सौ का आंकड़ा पार कर गई। इन बोगियों की परिचालन उम्र 2031 तक है, इन्हें तब तक तकनीकी तौर पर कंडम नहीं घोषित किया जा सकता है। ऐसे में एनईआर के यांत्रिक विभाग ने बोर्ड से दिशा-निर्देश मांगा है कि इन बोगियों का क्या किया जाए।

पांच लूप लाइनों के करीब चार किमी ट्रैक ठप

संचलन से बाहर की गईं हाइब्रिड बोगियों को इज्जतनगर और लखनऊ रेल मंडल में खड़ा किया गया है। इज्जतनगर के चार स्टेशनों पर 150 बोगियां खड़े-खड़े धूल फांक रही हैं, वहीं लखनऊ मंडल के नकहा (गोरखपुर) स्टेशन पर भी दो बोगियों की वजह से लूप लाइन ठप है। 24 मीटर लंबी इन बोगियों ने चार किलोमीटर से ज्यादा लंबाई में ट्रैक को व्यस्त कर रखा है।

इन बोगियों से चल सकती हैं 10 गाड़ियां

रेलवे में फिलहाल 22 कोच से एक्सप्रेस गाड़ियों का संचालन हो रहा है। हर रेक में यात्रियों के लिए विभिन्न श्रेणियों के कुल 15 से 16 कोच लगते हैं, ऐसे में बेकार पड़ी 152 बोगियों से करीब 10 ट्रेनों का संचालन किया जा सकता है।

इसे लेकर एनईआर के सीपीआरओ सुमित कुमार का कहना है कि रेलवे सदैव यात्री हित के लिए काम करता है। एलएचबी बोगियों में सुविधाएं तो बेहतर हैं हीं, साथ ही पूरी तरह से सुरक्षित भी है। ऐसे में पारंपरिक और हाइब्रिड कोच के स्थान पर एलएचबी बोगियां लगाई गई हैं। हाइब्रिड बोगियों के संबंध में पत्राचार किया गया है।

कहां कितनी बोगियां खड़ी हैं

स्टेशनखड़े कोच
दुधिया खुर्द60
निगोही50
शाहगढ़30
टनकपुर10
नकहा02

कैसे-कैसे कोच

पारंपरिक (आईसीएफ): भारतीय रेलवे के स्थापना के साथ ही 2008 तक सिर्फ आईसीएफ यानी कि पारंपरिक लाल रंग की बोगियां संचलन में थी।

हाइब्रिड: 2009 से 2014 तक हाइब्रिक बोगियां चलन में आईं। कोच की बॉडी स्टील की है। 2019 में इसका प्रयोग अचानक से रोक दिया गया।

एलएचबी: वर्ष 2015 में एलएचबी बोगियां चलन में आ गईं। वर्तमान में 99% ट्रेनें एलएचबी कोच से ही चल रही हैं। ये आरामदायक और सुरक्षित हैं।

पुश-पुल: 2022 में सेमी हाईस्पीड वंदे भारत और अमृत भारत ट्रेन संचलन में आई। इसकी बोगियां पुश-पुल तकनीक आधारित हैं। काफी आरामदायक हैं।

Pawan Kumar Sharma

लेखक के बारे में

Pawan Kumar Sharma

पवन कुमार शर्मा पिछले चार वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान से जुड़े हैं। डिजिटल मीडिया में काम करते हुए वह उत्तर प्रदेश की राजनीति, क्राइम, सरकारी योजनाओं और टूरिज्म से जुड़े मुद्दों पर नियमित रूप से लिखते हैं। इससे पहले पवन एबीपी न्यूज के साथ बतौर फ्रीलांसर काम कर चुके हैं। पवन ने नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से रेडियो एवं टेलीविजन पत्रकारिता की पढ़ाई की है। इससे पहले क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। ग्राउंड रिपोर्टिंग और अकादमिक समझ के साथ पवन तथ्यात्मक, संतुलित और पाठक-केंद्रित समाचार लेखन करते हैं।

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