टीले के नीचे दफन था 2000 साल पुराना इतिहास, जमीन की खुदाई में निकली चीजों को देखकर वैज्ञानिक भी हैरान

लाइव हिन्दुस्तान, रायबरेली
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रायबरेली में एक किसान के खेत के नीचे 2000 साल पुराना इतिहास दफन मिला है। लखनऊ  से पहुंचे वैज्ञानिकों ने जब खुदाई की तो टीले के नीचे से कई कीमती चीजें बरामद हुई हैं। जिसे देखकर वैज्ञानिक भी हैरान रह गए।

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रायबरेली में जमीन से निकला 2000 साल पुराना इतिहास

Raibareilly News: यूपी के रायबरेली से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे सुनकर इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले रोमांचित हो उठेंगे। जिले में एक टीले के नीचे 2000 साल पुराना इतिहास दफन था। प्रशासनक को जब इसकी जानकारी मिली तो तुरंत लखनऊ से वैज्ञानिकों को उसके परीक्षण के लिए बुलाया गया। वैज्ञानिकों ने जमीन की खुदाई करवाई। खुदाई के दौरान जमीन के नीचे से एक से बढ़कर एक बेस कीमती चीजें निकलीं। जिसे देखकर वैज्ञानिक भी हैरान रह गए। वैज्ञानिकों को जमीन से प्राचीन प्रतिमाएं और मुद्द्राएं भी बरामद की गई हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार टीले के नीचे से मिली चीजें कुषाणकालीन नगरी के मजबूत अवशेष हैं। दरअसल हरचंदपुर थानाक्षेत्र स्थित ओई गांव किसान सुशील मौर्या के खेत में तेज बारिश के चलते अचानक से एक बड़ा हिस्सा धंस गया था। जब मिट्टी नीचे धंसी तो वहां प्राचीन ईंटों से बनी गहरी संरचना और दीवारें दिखाई देने लगी। गांव से निकलते हुए इसकी खबर जिला प्रशासन तक पहुंच गई। बिना देर किए लखनऊ से वैज्ञानिक मौके पर पहुंचे और खुदाई का काम शुरू कराया। सारी चीजें जांच पड़ताल के बाद वैज्ञानिका वापस लखनऊ चले गए।

SDM महाराजगंज की मौजूदगी में वैज्ञानिकों ने की जांच पड़ताल

पिछले एक सप्ताह से क्षेत्र में चर्चा का विषय बने ओई गांव के टीले के नीचे दो हजार साल पुराना इतिहास दफन है। इसका खुलासा बुधवार को लखनऊ से पहुंची राज्य पुरातत्व विभाग की टीम ने किया। बुधवार को एसडीएम महाराजगंज की उपस्थिति में पुरातत्व विभाग की टीम ने दिनभर टीले पर बने गड्ढे के अंदर उतरकर सुरंगनुमान संरचना का बारीकी से निरीक्षण किया। इस दौरान टीम को मौके से दो हजार साल पुरानी ईंटों से बनी दीवार मिली। पुरातत्व विभाग की टीम से कुषाणयुग की दीवार बता रही है। लखनऊ से ओई गांव के टीले की जांच करने पहुंचे सहायक पुरातत्वविद डॉ. मनोज कुमार यादव ने बताया कि टीले पर गड्ढे के अंदर दिख रही सुरंगनुमान संरचना के बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसके अंदर दिख रही दीवार करीब दो हजार साल पुरानी कुषाणकालीन है।

कुषाणकालीन हैं जमीन के नीचे से मिले मिट्टी के बर्तन

गांव में जो प्राचीन मिट्टी के बर्तन और खिलौने मिले हैं, वो भी कुषाणकालीन हैं। उन्होंने बताया कि बुधवार को दिनभर सर्वेक्षण का काम पूरा कर लिया गया है। अब इसकी रिपोर्ट बनाकर विभाग में दी जाएगी। इस टीले का साल 1967-68 में सर्वेक्षण हुआ था। इसकी अधिसूचना जारी नहीं की गई थी। यहां सबसे बड़ी समस्या ये है कि किसान खेती कर रहे हैं। जबकि जहां प्राचीन संस्कृति होती है, वहां एक फुट से ज्यादा जमीन नहीं खोद सकते हैं। माउंट के किनारे-किनारे अतिक्रमण भी किया गया है। इसे दर्शाते हुए इसकी रिपोर्ट बनाकर शासन को भेजी जाएगी। उसके बाद जो भी दिशा-निर्देश मिलेंगे, उसी आधार पर आगे बढ़ा जाएगा।

पूर्व प्रधान के घर जाकर देखे अवशेष

लखनऊ से पहुंची जांच टीम ने ओई की पूर्व प्रधान के घर जाकर टीले से मिले अवशेषों की जांच की। पूर्व प्रधान के बेटे अशोक प्रताप सिंह ने अधिकारियों को टीले से मिलीं खंडित प्रतिमाएं और हजारों साल पहले की मुद्राएं दिखाईं। इस दौरान एसडीएम महराजगंज चंद्र प्रकाश गौतम भी मौजूद रहे। इससे पहले मंगलवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के अधिकारी डॉ.राजेंद्र यादव ने किसान के खेत मे गड्ढे का मौका - मुआयना किया था। उन्होंने राज्य पुरातत्व विभाग को टीले की जांच करने की संस्तुति की थी। इसी के बाद बुधवार को राज्य पुरातत्व विभाग के सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव, सहायक हिमांशु सिंह के साथ किसान के खेत पर पहुंचे। सहायक पुरातत्व अधिकारी, अपने सहायक के साथ गड्ढे में सीढ़ी लगाकर नीचे उतरे। गड्ढे के अंदर अगल बगल मिलीं दीवार का भौगोलिक स्थिति देखी। दीवार के प्राचीन ईंटा की नाप जोख की। गड्ढे के अंदर मिली मिट्टी की मशाल, गगरी का जायजा लिया। इसके बाद जांच अधिकारी ओई गांव के पूर्व प्रधान स्व.सविता मौर्या के पति अशोक प्रताप मौर्य ( शोभनाथ) के घर पहुंचे। अशोक प्रताप मौर्य ने टीम को टीले में मिलें भगवान बुद्ध, उनकी माता महामाया की खंडित प्रतिमाएं दिखाई।

1985 में भी टीले का किया गया था सर्वेक्षण

पूर्व प्रधान के बेटे अशोक प्रताप मौर्य ने टीम को बताया कि टीले से समय-समय पर धातुएं-मुद्राओं समेत अन्य प्राचीन वस्तुएं प्राप्त हुईं, जिन्हें उन्होंने सहेजकर रखा है। उन्होंने जांच अधिकारी को बताया उनके पास 3500 साल पुराने कुशाण कालीन सिक्के, बर्तन उसके पास मौजूद हैं। सन 1985 में तत्कालीन राज्य पुरातत्व विभाग के उत्खनन एवं संरक्षण अधिकारी राजाराम पाल शास्त्री प्राचीन टीला को देखने आए थे। विभाग की परिचय पुस्तिका के क्रमांक नंबर 141 पर यह स्थान ओई डीह के नाम से संरक्षित हैं। इसका रिकॉर्ड विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव ने बताया कि खेत में 15-20 फुट गहरा गड्ढा है। उसके अंदर दोनों तरफ भवन की दीवार के अवशेष हैं।

छह दिन से चर्चा का विषय बना है टीला

ओई गांव में 6 दिन पहले बारिश के दौरान किसान के खेत में मिट्टी धंसने से रहस्यमयी सुरंगनुमा संरचना निकली। बुधवार को राज्य पुरातत्व विभाग लखनऊ की दो सदस्यीय टीम जांच करने पहुंची। गड्ढे में उतरी टीम ने गहन पड़ताल की। जांच अधिकारियों ने बताया कि इस टीले का पहले भी सर्वेक्षण हुआ है। हालांकि इसकी अधिसूचना जारी नहीं होने से यह संरक्षित नहीं हो सका। फिलहाल गड्ढे को यथास्थिति रख्ने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग और सरकार के निर्देश पर आगे की कार्यवाही शुरू की जाएगी।

क्या बोले वैज्ञानिक

लखनऊ के सहायक पुरातत्वविद डॉ. मनोज यादव ने बताया, ओई गांव के टीले पर स्थित खेत में करीब 15 से 20 फुट गहरा गड्ढा है। इसके अंदर कुषाणकालीन दो दीवारें मिली हैं। इस टीले का पहले भी सर्वेक्षण हुआ था, लेकिन इसकी अधिसूचना जारी नहीं होने के चलते पूर्ण रूप से संरक्षित नहीं किया गया। अब हम इसकी रिपोर्ट बनाकर शासन और विभागीय अधिकारियों को भेजेंगे। इसके बाद जैसा निर्देश होगा, उसके अनुरूप कार्रवाई की जाएगी।

Dinesh Rathour

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दिनेश राठौर वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। डिजिटल और प्रिंट पत्रकारिता में 13 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले दिनेश ने अपने करियर की शुरुआत 2010 में हरदोई से की थी। कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक दिनेश ने अपने सफर में हिन्दुस्तान (कानपुर, बरेली, मुरादाबाद), दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका (डिजिटल) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। हरदोई की गलियों से शुरू हुआ पत्रकारिता का सफर आज डिजिटल मीडिया के शिखर तक पहुँच चुका है। दिनेश राठौर ने यूपी और राजस्थान के विभिन्न शहरों की नब्ज को प्रिंट और डिजिटल माध्यमों से पहचाना है।
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