
1993 मुंबई में हुए आतंकवादी बम ब्लास्ट के दौरान एक धमाका सिनेमा हॉल में भी हुआ था। उस समय लोग थिएटर में ये देशभक्ति फिल्म देख रहे थे। इस हादसे में कई लोगों की जान चली गई थी। इस हमले ने देश के लोगों लो हिला कर रख दिया।

1963 के हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर का एक ऐसा ही गाना है, जिसे लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से अमर कर दिया। इस गाने में अभिनेत्री एक तरफ कहती है कि वो अपने प्रेमी के बिना रह नहीं सकती, तो वहीं दूसरी तरफ शिकायत करती है कि वो उसे अपने प्यार के पिंजरे में कैद कर रहा है।

आज भी लोग उन्हें 'इलू-इलू' गाने की वजह से याद करते हैं। उन्होंने फिल्म 1991 की ब्लॉकबस्टर फिल्म के साथ डेब्यू किया था। इस फिल्म में वोदो दिग्गजों दिलीप कुमार और राजकुमार के साथ नजर आए थे। वहीं, उनके अपोजिट मनीषा कोइराला लीड रोल में थीं।

1965 में आई फिल्म काजल का गाना 'छू लेने दो नाजुक होठों को' मोहम्मद रफी ने गाया था। जानिए ये गाना क्यों सिंगर्स के लिए मिसाल बन गया? लिखने वाले गीतकार ने अपनी आत्मा इस गामे में डाल दी हो जैसे।
‘ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं’ इस गाने को लिखने वाले शायर थे इस मशहूर एक्ट्रेस के पिता। अमर गीत को मोहम्मद रफी ने दी आवाज और एक्टर राज कुमार ने पर्दे पर दिखाया दिल टूटने का दर्द। आज भी इस गाने के बोल दिल को छू जाते हैं।
हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी फिल्म मानी जाने वाली ‘मुगल-ए आजम’ के म्यूजिक डायरेक्टर एक गाने के आगे अवॉर्ड हार गए थे। सिर्फ एक गाना बनाने उस साल के सभी बड़े गानों पर भारी पड़ गया था।
हिंदी फिल्मों के सबसे बड़े एक्टर दिलीप कुमार ने इसलिए सीखी थी भोजपुरी भाषा। बिहार से था घर कला माली। इस फिल्म में भोजपुरी बोलते दिखे थे दिलीप कुमार। फिल्म ने की थी जबरदस्त कमाई।
राज कुमार की एक फेमस लाइन थी जानी। फिल्म हो या रियल लाइफ वह सामने वाले को जानी बोलते थे। अब इसके पीछे की वजह सामने आई है जिसे सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे।
सुभाष घई ने तस्वीर शेयर कर बताई राज कुमार और दिलीप कुमार के बीच हुई दोस्ती की बात। दोनों ने फिल्म सौदागर में साथ काम किया था। डायरेक्टर ने पुरानी तस्वीर शेयर कर वो पल याद किया है।