
इलाहाबाद हाई कोर्ट में जजों की तैनाती इलाहाबाद और लखुनऊ में है। लखनऊ खंडपीठ में 28 जजों की तैनाती है, जबकि इलाहाबाद में 79 जज हैं। पोर्टल पर इलाहाबाद स्थित जजों की सूची में अब भी जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम तीसरे स्थान पर है। उनसे ऊपर जस्टिस एमसी त्रिपाठी और जस्टिस अरिंदम सिन्हा का ही नाम है।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से ठीक पहले इस्तीफा दे दिया है। भारत के न्यायिक इतिहास में ऐसा करने वाले वे तीसरे हाई कोर्ट जज हैं। जानिए 15 करोड़ कैश मिलने से लेकर इस्तीफे तक का पूरा मामला।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पत्र में कहा है कि एक साल से भी ज्यादा समय से, मुझ पर बेबुनियाद आरोपों के आधार पर एक बदनामी भरा अभियान चलाया जा रहा है। ये आरोप इतने कमजोर हैं कि कानून की नजर में ये उस न्यूनतम स्तर को भी पूरा नहीं करते।

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के न्यायिक कामकाज छीन लिए और उन्हें कोई काम न सौंपने के निर्देश जारी किए। घटना के बाद संसदीय प्रक्रिया तेज हुई। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की ओर से गठित समिति ने इन-हाउस जांच शुरू की।
आपको बता दें कि उनके आवास पर जले हुए कैश मिलने को लेकर हुए विवाद के बाद उनका दिल्ली हाई कोर्ट से वापस इलाहाबाद तबादला कर दिया गया था। उन्होंने 5 अप्रैल, 2025 को शपथ ली थी और फिलहाल उनके खिलाफ आरोपों के संबंध में एक आंतरिक जांच चल रही है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के घर में जले नोट मिलने और महाभियोग मामले की जांच कर रही तीन सदस्यीय समिति का पुनर्गठन किया है। जानें जांच कमेटी में बदलाव का कारण और पूरी खबर।
रोहतगी ने मीडिया ट्रायल को आज हमें डुबो रही सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बताया और कहा कि सोशल मीडिया की तुलना में मुख्यधारा का मीडिया अधिक खतरनाक है क्योंकि उसे अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
याचिका में जस्टिस वर्मा ने लोकसभा स्पीकर द्वारा उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए बनाई गई संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी। उन्होंने समिति के गठन पर यह कहते हुए सवाल उठाया था कि महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा के उपसभापति ने खारिज कर दिया था।
संसदीय समिति के समक्ष अपनी बात को रखते हुए जस्टिस वर्मा ने आगे कहा कि शुरू में, घटना के समय कोई रिकवरी नहीं हुई थी, और मौके पर कैश मिलने के दावे बाद में सामने आए।
जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि जब संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन (महाभियोग का) प्रस्ताव दिया जाता है, तो प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए एक जॉइंट-कमेटी बनाने के लिए यह जरूरी है कि वह प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार किया जाए।