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रिकॉर्ड हमेशा टूटते रहने चाहिए

अश्विनी नचप्पा प्रसिद्ध धाविकाPublished By: Manish Mishra
Sat, 19 Jun 2021 09:31 PM
रिकॉर्ड हमेशा टूटते रहने चाहिए

सन 1989 की घटना है। दिल्ली में ओपन नेशनल गेम्स के मुकाबले चल रहे थे। 200 मीटर की दौड़ में पीटी उषा की जीत सभी को तय लग रही थी। वह निस्संदेह एक बेहतरीन एथलीट हैं और उनकी योग्यता किसी से छिपी नहीं थी। मगर खेल के इतिहास में वह दौड़ एक यादगार मुकाबले के रूप में दर्ज न हुई होती, यदि ‘उड़नपरी’ को शिकस्त न मिली होती। मुझे अपनी उस जीत पर काफी रश्क था, लेकिन जिन शब्दों से मेरे हौसले को सचमुच बल मिला, वे ‘कैप्टन मिल्खा सिंह’ सर के थे। मेरी पीठ थपथपाते हुए उन्होंने कहा था, ‘शाबाश बेटे, अच्छा भागी। और मेहनत करो। आपको और तेज भागना है’। शायद यह उनका ही आशीर्वाद था कि करीब दो हफ्ते बाद एक अन्य मुकाबले में मैंने फिर से उषा को हरा दिया। इन घटनाओं का जिक्र कर मैं पीटी उषा को कोई कमजोर एथलीट नहीं बता रही, बल्कि वह आज भी उसी सम्मान की हकदार हैं। मगर उन दिनों उनका जो कद था, उसको देखते हुए उनसे आगे निकलने का सपना कमोबेश सभी एथलीट देखा करते थे। संभवत: इसकी वजह भी कैप्टन मिल्खा सिंह ही थे, जो हर वक्त कहा करते, ‘रिकॉर्ड हमेशा टूटते रहने चाहिए’।

दिल्ली में जब भी कभी कोई बड़ा मुकाबला होता, हम हमेशा मिल्खा सिंह सर को अपने बीच पाते। वह हर चैंपियनशिप देखने के लिए आया करते थे। मुझे ही नहीं, छोटे-बडे़ सभी एथलीटों को वह प्रेरित करते। उनके भीतर जीतने का जज्बा भरते। वह इतने प्रभावी तरीके से अपनी बात रखते कि सामने वाला खुद-ब-खुद जोश से भर उठता था। और यही व्यवहार उन्हें हरेक खिलाड़ी की नजर में सम्मानित बना देता। खेल जगत में उन्हें जो ऊंचा मुकाम मिला, उसकी बड़ी वजह यह थी कि मिल्खा सिंह ने उस समय देश का नाम रोशन किया, जब हालात बिल्कुल विपरीत थे। उस वक्त तक बंटवारे की टीस खत्म नहीं हुई थी और खुद उनका जीवन काफी पीड़ादायक अनुभवों से गुजरा था। सन 1929 में पंजाब सूबे के गोविंदपुरा (अब पाकिस्तान) में वह पैदा हुए, लेकिन बंटवारे के वक्त दंगाइयों के हाथों अपने माता-पिता और कई भाई-बहनों की हत्या देख चुके थे। एक अनाथ बच्चे के रूप में भारत आने, शरणार्थी शिविरों में रहने, ढाबों पर बर्तन धोने जैसे तमाम उतार-चढ़ावों से गुजरने के बाद उन्हें फौज में अपना भविष्य दिखा, जहां एक धावक के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। युवावस्था के गमगीन दिनों को तो वह खैर कभी नहीं भूले, लेकिन अपनी सारी तकलीफों को किनारे रखकर उन्होंने लक्ष्य पर फोकस किया। संसाधनों का अभाव था, सुविधाओं की कमी थी, फिर भी वह नजीर गढ़ते रहे। दुनिया उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ यूं ही नहीं पुकारती रही।

कोविड-19 के इस संकट काल में भी उनका जीवन हमें काफी प्रेरित कर रहा है। भले ही कोरोना से वह जिंदगी की जंग हार गए, लेकिन इससे भी उन्होंने आसानी से शिकस्त नहीं मानी। मौजूदा नकारात्मक माहौल से बाहर निकलने के लिए हम उनसे काफी कुछ सीख सकते हैं, खासकर मानसिक मजबूती के लिए। मिल्खा सिंह ने अपने परिवार के साथ जैसी बर्बरता देखी थी, उससे उबरना आसान नहीं था। बहुत सारे लोग तो अपना दिमागी संतुलन हमेशा के लिए गंवा देते, लेकिन वह उससे न सिर्फ बाहर निकले, बल्कि एक मजबूत इंसान बनकर उभरे। और यह मजबूती उन्होंने तब अर्जित की, जब मानसिक व भावनात्मक संबल के लिए आज जैसी तकनीक मौजूद नहीं थी। हमें भी आज अपनी भावनात्मक उलझनों से मिल्खा सिंह जैसी खिलाड़ी भावना से पार पाने की जरूरत है, क्योंकि महामारी ने लाखों लोगों को मानसिक रूप से आहत किया है। कहते हैं, जब मिल्खा सिंह के पिता दंगाइयों से लड़ रहे थे, तब बेटे के लिए उनके आखिरी शब्द थे, ‘भाग मिल्खा भाग’, ताकि वह अपनी जान बचा सके। वह युवक खूब भागा, पहले अपनी जान बचाने के लिए, फिर मेडल जीतने के लिए। यह जज्बा उनमें ताउम्र बना रहा। 1960 के रोम ओलंपिक में वह ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़कर भी पदक से चूक गए थे, लेकिन 45.73 सेकंड में 400 मीटर की दूरी तय करने का उनका राष्ट्रीय कीर्तिमान तकरीबन चार दशकों तक कायम रहा। वह कहा करते कि जो मेरा रिकॉर्ड तोड़ेगा, उसे मैं अपने हाथों से पुरस्कृत करूंगा। इस तरह वह नए बच्चों को प्रेरित करते और उन्हें चुनौती लेना व उस पर खरा उतरना सिखाते।

मिल्खा सिंह की एक खूबी और थी, वह सबके थे। उनके दरवाजे सबके लिए खुले रहते। भारत में गिनी-चुनी हस्तियां ही ऐसी रही हैं, जो हरेक सामाजिक क्षेत्र, प्रत्येक राजनीतिक वर्ग में समान रूप से सम्मान पाती रहीं और सराही जाती हैं। मिल्खा सिंह उनमें भी पहली कतार में रहे। वह एक लंबी और सार्थक जिंदगी जीकर गए हैं। हम सबको जीवन जीने का सलीका बताकर गए हैं। इसलिए उनकी मौत ‘डिजास्टर’ नहीं, ‘सेलिब्रेशन ऑफ लाइफ’ है। हमें उन्हें इसी रूप में याद करना चाहिए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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