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'लड़कों से भी लड़ जाती थी मैं', मैरीकॉम से सुनिए उनकी कहानी

MC Mary Kom

भारत की चोटी की मुक्केबाज एमसी मैरीकॉम  ने अपने सफर की शुुरुआत की कहानी कुछ ऐसे शेयर की है।मेरा जन्म मणिपुर के एक छोटे-से गांव में हुआ था। पिता जी खेती किया करते थे। उसी खेती से हम लोगों का गुजर-बसर होता था। मैं भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। बावजूद इसके बचपन में मैं बहुत शैतान थी। हर वक्त लड़कों के साथ खेलती रहती थी। हमारे गांव में उस वक्त लड़कियां खेलती ही नहीं थीं। उन्हें खेल-कूद के बारे में कुछ पता नहीं था। लड़के कम से कम इतने ‘अवेयर’ थे कि फुटबॉल खेलते थे, तो मैं भी लड़कों के साथ ही खेला करती थी। 

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उस उम्र में एक-दूसरे का मजाक उड़ाने पर लड़ाई-झगड़ा भी हो जाता था। मैं लड़ाई-झगड़े में भी पीछे नहीं रहती थी। किसी से डरती नहीं थी। जरूरत पड़ती थी, तो मैं लड़कों से लड़ भी जाती थी। इसके अलावा पेड़ पर चढ़ने में मुझे बहुत मजा आता था। खासतौर पर जब कोई फल तोड़ना हो। इस तरह मेरा पूरा बचपन ज्यादातर लड़कों के साथ बीता है, जिसमें मौज-मस्ती है, तो लड़ाई-झगड़ा भी है। कई बार घर पर शिकायत भी हो जाती थी। खूब डांट पड़ती थी। इसके अलावा अगर अंधेरे से पहले घर नहीं पहुंचे, तो भी डांट पड़ती थी। मेरी आदत थी कि जब तक रोशनी रहती थी, मैं खेलती रहती थी। इसी वजह से मां ने कई बार पिटाई भी की। देखा जाए, तो जरूरत से ज्यादा खेलते रहने के अलावा मैं कोई और शैतानी नहीं करती थी। घर के कामों में मां-बाप का हाथ भी बंटाती थी।

मेरे पिता जी तो दिन भर खेती में ‘बिजी’ रहते थे। उन्हें मेरी बदमाशियों का पता नहीं चल पाता था कि मैं दिन में कितनी देर तक खेलती रही। जबकि मां ज्यादातर समय घर पर ही होती थी। कभी कभार आस-पड़ोस से कुछ खरीदने चली गई, तो चली गई, वरना उनका लगभग पूरा समय घर पर ही बीतता था, इसलिए मेरी बदमाशियां उनकी निगाह में तुरंत आ जाती थीं। पिता जी बहुत मेहनत करते थे, ताकि हम लोगों को कम से कम खाने-पीने की दिक्कत न हो। हम दोनों वक्त का खाना खा सकें, यही बहुत था। उस वक्त भी हमारे गांव की दुकान में टॉफी, कैंडी, मिठाई जैसी चीजें मिलती थीं, लेकिन वो हमारे लिए नहीं थीं, क्योंकि हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी। बचपन में इस तरह की चीजें खाने को मिली भी होंगी, तो एकाध बार। 

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गांव में हम लोग फुटबॉल खेलते थे। रेस करते थे। बाद में जाकर बॉक्सिंग को लेकर ‘इंटरेस्ट’ बढ़ा। स्कूल में मैं ज्यादा शैतानी नहीं करती थी, लेकिन वहां भी मेरा दिमाग खेलों में ही लगा रहता था। स्कूल में कोई भी ‘एनुअल स्पोट्र्स मीट’ होती, तो मैं जरूर उसमें होती थी। मैं फुटबॉल के साथ-साथ वॉलीबॉल, एथलेटिक्स सभी में अच्छी थी। जिस भी टीम से खेलती, वो टीम ज्यादा जीतती थी। ‘इंडीविजुअल’ मैं बहुत मेडल जीतती थी। हर कोई चाहता था कि मैं उसके हाउस ग्रुप से खेलूं। इसी वजह से मेरे सारे टीचर्स मेरा बहुत ध्यान रखते थे। धीरे-धीरे जब मेरा ज्यादातर समय खेल-कूद में जाने लगा, तो मेरी पढ़ाई कमजोर हुई। बावजूद इसके ज्यादातर टीचरों ने मुझे सलाह दी कि मुझे खेल-कूद में ही जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि स्कूल में तो अच्छी ट्रेनिंग की सुविधा नहीं है, लेकिन अगर मुझे स्पोट्र्स में जाना है, तो मुझे किसी अच्छी एकेडमी में जाना शुरू करना चाहिए। टीचरों के अलावा कोई कुछ बताने वाला नहीं था। मम्मी-पापा पढ़े-लिखे नहीं हैं। गांव के बाकी लोग भी यह तो जानते थे कि मैं खेलने-कूदने में अच्छी हूं, पर आगे क्या करना है, यह रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं था। लड़कियों के खेलने-कूदने पर उल्टी-सीधी बातें कहने वाले लोग भी बहुत थे। 

वो तो जब टीचरों ने बार-बार समझाया, तब जाकर मैंने इम्फाल में स्पोट्र्स एकेडमी ज्वाइन करने का फैसला किया। वहां स्पोट्र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया का सेंटर था। मुझे लगा कि अगर मैं वहां जाकर खेलूंगी, तभी आगे कुछ कर पाऊंगी। इम्फाल में मेरे एक ‘रिलेटिव’ रहते थे। मैं उनके पास गई। वहीं रहकर मैंने अपनी स्पोट्र्स ट्रेनिंग शुरू की। सबसे पहले मैंने एथलेटिक्स में ट्रेनिंग शुरू की। शाम के वक्त ट्रेनिंग हुआ करती थी। वहां लड़के भी ट्रेनिंग करते थे। एक-दो लड़कियां भी थीं। बॉक्सिंग की ट्रेनिंग करते हुए लड़कों के साथ लड़कियों को मैंने देखा, तो मेरा जोश बढ़ गया। मुझे अंदर से लगा कि जब ये लड़कियां कर सकती हैं, तो मैं क्यों नहीं कर सकती? मैंने घरवालों को कुछ नहीं बताया। खुद ही जाकर वहां कोच से मिली और मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं भी बॉक्सिंग कर सकती हूं? कोच ने मेरा जोश देखा। उन्होंने यह भी समझ लिया कि मेरे अंदर बॉक्सिंग को लेकर बहुत उत्साह है। उन्होंने ‘ओके’ कर दिया। इस तरह अगले दिन से इम्फाल में मेरी बॉक्सिंग की ट्रेनिंग शुरू हो गई।  

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  • Web Title:mary kom struggle to become international boxer know motivational and success story