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3 जून, 2020|3:11|IST

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फिर सिर उठा रहा है नक्सलवाद

एस श्रीनिवासन

बीते 23 सितंबर को विशाखापट्टनम जिले की अराकु वैली में नक्सलियों ने तेलुगुदेशम विधायक के सर्वेश्वर राव और पूर्व विधायक सिवेरी सोमा की हत्या कर दी। आंध्र प्रदेश में एक लंबे अंतराल के बाद हुई इन नक्सली हत्याओं ने राज्य प्रशासन के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। खबरों के मुताबिक, विधायक राव और उनके साथी पर्याप्त सुरक्षा बंदोबस्त के बिना ही अराकु वैली में गए थे। सुरक्षा बलों का कहना है कि यह वैली हाल के दिनों में बढ़ती नक्सली गतिविधियों के लिए कुख्यात रही है।
सुरक्षा बलों के साथ नक्सलियों का चूहे-बिल्ली का खेल दशकों से जारी है, क्योंकि वे सुर्खियों में बने रहने के लिए हमले का मुफीद वक्त और जगह चुनते हैं। ठीक डेढ़ दशक पहले 1 अक्तूबर, 2003 को मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू जब तिरुपति से लौट रहे थे, तब एक बारूदी सुरंग के हमले में वह जख्मी हो गए थे। नायडू उस समय अविभाजित आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उस हमले में उनके कंधे और दाएं हाथ की हड्डियां टूट गई थीं। उस घटना से बहुत पहले 1989 में ही नक्सलियों व माओवादियों के खिलाफ गठित स्पेशल टास्क फोर्स के तहत एक आईपीएस अधिकारी ने 2,000 शिकारी कुत्तों का एक दस्ता तैयार किया था। नायडू पर नक्सली हमले के बाद इस दस्ते का इस्तेमाल नए संकल्प के साथ किया गया। नतीजतन, 2008 से 2010 के बीच नक्सली गतिविधियों में जबर्दस्त गिरावट देखी गई। 

वैसे, नक्सलियों से निपटने के लिए नायडू ने दोहरी रणनीति अपनाई थी। एक तरफ, शिकारी कुत्ते घने जंगलों में नक्सलियों का पीछा कर रहे थे, तो दूसरी तरफ सुरक्षा बलों के आगे उनके आत्म-समर्पण करने पर सजा में छूट का दरवाजा भी उन्होंने खोल दिया था। उस समय कई सारे पूर्व नक्सलियों का पुनर्वास किया गया था। पुलिस सख्ती बढ़ाने के अलावा राज्य सरकार ने कई सारे सामाजिक कार्यक्रम भी शुरू किए थे, जिनमें ग्राम सभाओं को सशक्त करने की पहल शामिल थी। गौरतलब है कि ग्राम सभा, ग्राम पंचायत के मुकाबले प्रशासन की सबसे छोटी इकाई है, जिसमें स्थानीय लोगों की सर्वाधिक भागीदारी होती है। बाद में तेलंगाना के गठन और चंद्रशेखर राव सरकार द्वारा उठाए गए नए कदमों ने भी नक्सलियों की गतिविधियों को हतोत्साहित किया। कहा जा रहा है कि जो नक्सली छत्तीसगढ़ की तरफ चले गए थे, वे दक्षिण में एक नया गलियारा बनाने के लिए अपने को पुनर्संगठित कर रहे हैं। चर्चा यह भी है कि माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले वरवर राव की हालिया गिरफ्तारी ने अराकु वैली की हत्याओं के लिए नक्सलियों को उकसाया। इन घटनाओं के जरिए वे इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का एहसास कराना चाहते थे। 

तेलंगाना जब अविभाजित आंध्र प्रदेश का हिस्सा था, तभी से वामपंथियों का एक मजबूत गढ़ रहा है। आम मान्यता यह है कि इस क्षेत्र में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाला आंदोलन दरअसल ‘किसानों का पुनर्जागरण’ आंदोलन था, जिसने हैदराबाद के निजाम के खिलाफ राष्ट्रवादी आंदोलन की शक्ल ले ली थी और 1952 के संसदीय चुनाव और विधानसभा चुनावों में सीपीआई को इसका फायदा भी मिला। इसे विधानसभा में 77 सीटें मिली थीं और करीब 20 फीसदी वोट मिले थे। कम्युनिस्टों को आंध्र प्रदेश, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में अच्छी-खासी कामयाबी भी मिली।

1960 के दशक की घटनाओं, रूस के प्रभाव और चीन के साथ जंग के कारण सीपीआई विभाजित हो गई। परिणामस्वरूप, एक नई पार्टी सीपीआई(एम) वजूद में आई और चारू मजूमदार के नेतृत्व में एक उग्र सुधारवादी गुट उभरा, जो माक्र्स-लेनिन और माओ के हिंसक सिद्धांतों का हिमायती था। इसने भारत में नक्सली आंदोलन की बुनियाद रखी। पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से शुरू हुए ‘संघर्ष’ ने धीरे-धीरे देश के 14 सूबों के 160 जिलों में 450 पुलिस स्टेशन क्षेत्रों को अपनी जद में ले लिया। यह आंदोलन बड़ी चिंता का सबब इसलिए बना, क्योंकि इसका विस्तार उन इलाकों में हुआ, जो खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध इलाके हैं। जाहिर है, औद्योगिक विकास के लिए ये संसाधन जरूरी हैं। विडंबना यह है कि इन्हीं इलाकों में सामाजिक रूप से सबसे हाशिये के लोग बसते हैं और यही बात सरकार के लिए जटिल स्थितियों को जन्म देती है। सबसे बड़ी समस्या सशस्त्र क्रांति की वह विचारधारा है, जो उस व्यवस्था को मिटाने की बात करती है, जिसे वह ‘सामंती, साम्राज्यवादी और जटिल नौकरशाही वाली’ मानती है और जो गरीबों की उपेक्षा करती है। हालांकि पिछले कुछ दशकों में राज्य सरकारों ने केंद्र के सहयोग से इन्फ्रास्ट्रक्चर का काफी विकास किया है, पुलिस बलों की संख्या बढ़ाई है, सामाजिक उत्थान के कई कानून बनाए हैं, ताकि इस आंदोलन से निपटा जा सके, मगर वे नाकाम रही हैं। बहरहाल, सरकारी बलों और माओवादियों के बीच लोग पिस रहे हैं। 

तो आखिर नक्सली चाहते क्या हैं? उनकी मांगों की विभिन्न पर्चियों पर निगाह डालें, तो यह साफ हो जाएगा। वे चाहते हैं कि भूमिहीनों को भूमि का पुनर्आवंटन किया जाए, जिसमें औरतों को बराबरी का अधिकार हासिल हो। कृषि विकास के साथ यह गारंटी नत्थी हो कि फसलों की लाभकारी कीमत दी जाएगी और पुरुष-स्त्री कामगारों के काम के घंटे व वेतन तय किए जाएं। वे ठेकेदारी परंपरा और बालश्रम को खत्म कराना चाहते हैं। उनकी मांगों में रोजगार की गारंटी और सामाजिक विषमता का अंत भी शामिल हैं। नागरिक के तौर पर वे अपनी गरिमा, आजादी व सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण चाहते है।

केंद्र और राज्य सरकारों के भी यही लक्ष्य हैं। फिर यह संघर्ष क्यों? साधारण बुद्धि के राजनेताओं के पास भी इसका जवाब है। बहरहाल, नक्सली समस्या के समाधान के लिए एक संवेदनशील संवाद की रणनीति की दरकार है। इसके अलावा, पुलिस व प्रशासनिक पदों पर और ज्यादा स्थानीय लोगों को नियुक्त करना होगा, सुरक्षा बलों को सशक्त करने और उनमें बेहतर तालमेल की भी दरकार है। सबसे जरूरी है हालात का संजीदगी से प्रबंधन। नक्सलियों से निपटने के लिए सुरक्षा बलों ने कभी ‘आंध्र मॉडल’ को आदर्श माना था, पर मौजूदा हालात में नक्सली उसे भी चुनौती पेश करने लगे हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Senior Journalist S Srinivasan article in Hindustan on 06 october