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जहां आज भी लागू हैं ब्रिटिश कानून

मोहन भंडारी, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड)

अंग्रेज 1600 ईस्वी में व्यापारी बनकर भारत आए थे और फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपने पांव पसारने शुरू किए। उन्होंने भारत में अपनी छावनियां यानी कैंटोनमेंट बनाईं, जिसकी शुरुआत रॉबर्ट क्लाइव ने की। सन् 1772 में बैरकपुर में पहली छावनी गठित की गई। कैंटोनमेंट का अर्थ 19वीं सदी की शुरुआत तक काफी विस्तार पा चुका था और इसे सेना द्वारा खासतौर से इस्तेमाल किया जाने वाला निर्धारित क्षेत्र माना जाने लगा।

यहां अंग्रेज अधिकारियों द्वारा घरों के निर्माण या उनकी खरीद-बिक्री के लिए किसी भी तरह के लोन (कर्ज) की मांग ईस्ट इंडिया कंपनी लगातार खारिज करती रही। बजाय इसके, वह उन्हें अपने लिए ऐसे किसी स्थानीय अधिकारी का घर तलाशने को कहती, जिसने खुद के रहने के लिए उसे बनाया हो। यह नीति लगातार अमल में लाई जाती रही। मगर दूसरी तरफ, स्थानीय लोगों को घर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा, ताकि उनके घरों को सेना के अधिकारियों के इस्तेमाल के लिए किराये पर लिया जा सके।

आज ब्रिटेन, अमेरिका या किसी भी दूसरे विकसित या विकासशील देश में कैंटोनमेंट नहीं है। यह 1857 की आजादी की पहली लड़ाई ही थी, जिसके बाद हमारे यहां बड़े सैन्य प्रतिष्ठानों का निर्माण हुआ। इसमें अपने खादिम और घरेलू कामगारों के साथ सैन्यकर्मियों को ही नहीं, बल्कि विदेशी व्यापारी, आंग्ल-भारतीय, अन्य यूरेशियाई और ‘स्थानीय लोगों’ (जिन्हें सैन्य नीति-निर्माताओं ने विशेष सुविधा व अधिकार दिए थे) को रहने का हक मिला। ओल्ट ग्रांट बंगला (ओजीडब्ल्यू), ओल्ड ग्रांट, फ्री होल्ड, लीज, पर्पेचुअल यानी स्थाई लीज, अस्थाई लीज जैसी अवधारणाएं और शर्तें ब्रिटिशों ने इसी तरह से गढ़ी हैं। विडंबना यह है कि हमारी आजादी के 71 वर्षों के बाद भी यहां के स्थानीय निवासियों को अपने घरों में या अपनी जमीन पर शरणार्थियों की तरह रहने को मजबूर होना पड़ रहा है, जिसकी वजह यही है कि हम पुरानी राजशाही कानून-नियमों द्वारा शासित हैं। 

अंग्रेजों ने शहर के किनारे एक छोटी-सी यूरोपीय दुनिया सिर्फ इसलिए नहीं बसाई कि विदेशी भूमि से अपने देश की सेवा करने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उसकी कुछ भरपाई हो सके, बल्कि उन्होंने यूरोपीय सैनिकों के दिल बहलाने की तमाम सुविधाएं उनमें उपलब्ध कराईं। छावनी स्टेशन में ब्रिटिश अधिकारियों को बेशक अपना घर बनाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया गया था। मगर हां, वे बंगला खरीद सकते थे या अपने खर्चे पर उसकी मरम्मत करवा सकते थे। सिविलियन यानी असैन्य कर्मियों को इस शर्त के साथ बंगला बनाने की अनुमति थी कि वे उन्हें उचित किराये पर अधिकारियों को देंगे। यह भी माना जाता था कि छावनी क्षेत्र में कोई बंगला या क्वार्टर किसी ऐसे शख्स को कतई नहीं बेचा या किराये पर दिया जा सकता है, जो ब्रिटिश आर्मी से ताल्लुक न रखता हो। रही बात जमीन पर मालिकाना हक की, तो ऐसी मजबूत धारणा थी कि सेना के कब्जे वाली सभी जमीन ब्रिटिश सरकार की है, जिसे उसने जीतकर या फिर खरीदकर हासिल किया है और उनका सेना के अतिरिक्त कोई दूसरा सामाजिक समुदाय उपयोग नहीं कर सकता।

शिमला, मसूरी, रानीखेत, लैंसडाउन, चकराता, दार्जिलिंग, कोडाइकनाल जैसी ऊंची पहाड़ियों पर तमाम सुविधाओं से लैस कैंटोनमेंट्स बनाए गए, जबकि नीचे ढलान पर स्थानीय आबादी की बसावट रखी गई, जहां सुविधाएं नाममात्र की होती थीं। यह मूल निवासी को कमतर बताने का एक मनोवैज्ञानिक तरीका भी था। मेरा मानना है कि आज भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। 71 साल पहले अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने के बाद 17.57 लाख एकड़ रक्षा भूमि यानी ‘डिफेंस लैंड’ है। इनमें से 53,146 एकड़ में देश के 62 कैंटोनमेंट बने हुए हैं। आज इन छावनियों की आबादी में कई गुना वृद्धि हुई है, क्योंकि कुछ लोगों को अपने खर्च पर घर बनाने की इजाजत दी गई, और लाइसेंस व लीज भी बांटे गए। आज 2,724 ओल्ड ग्रांट बंगले मौजूद हैं, लेकिन उनमें रहने वालों पर बेदखली का खतरा बना हुआ है। इस संदर्भ में सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों में कई मामले दायर किए गए हैं।

अधिकांश कैंटोनमेंट में ‘गोरे साहब’ बाजार को लाल कुर्ती, ब्रिटिश इंडिया बाजार, सदर बाजार, जरूरी बाजार, खरी बाजार, तोपखाना आदि के नाम से पुकारते थे। ये नाम आज भी कायम हैं। तब सभी भूमि ब्रिटिश सरकार की संपत्ति थी और ‘एक महीने की नोटिस पर और अधिकृत भवन के लिए मुआवजे के भुगतान पर’ फिर से वापस ली जा सकती थी। 62 छावनियों के बदनसीब निवासी आज भी इसी स्थिति में जी रहे हैं। यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारत में औपनिवेशिक संस्कृति इन 62 छावनियों में बदस्तूर कायम है। यहां के निवासी आज भी 12 सितंबर, 1836 के गवर्नर जनरल्स ऑर्डर्स (जीजीओ) जैसे पुराने ब्रिटिशकालीन कानूनों और नियमों द्वारा शासित होते हैं। 11 ब्रिटिश कानून अब भी इन पर आयद हैं। 

साल 1954 में संसद में पेश प्रस्ताव संख्या 141 पर सभी ने सहमति जताई थी कि तमाम कैंटोनमेंट खत्म कर दिए जाएं। संविधान में जब 73वां संशोधन हुआ, तो स्थानीय शासन की सभी इकाइयों के साथ ही कैंटोनमेंट में भी पंचायती राज की वकालत की गई। मगर छावनी इलाकों में अब तक इसका पालन नहीं कराया जा सका है। जब से कैंटोनमेंट एक प्रतिष्ठान के रूप में अस्तित्व में आया है, तब से सैन्य अधिकारी खुद स्थानीय सैन्य प्राधिकरणों (एलएमए) द्वारा जारी नियमों व आदेशों के अनुसार साफ-सफाई जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी करते रहे हैं। यह आज भी जारी है।  

यह उचित वक्त है कि इन तमाम कैंटोनमेंट में रहने वाले करीब 21 लाख लोगों को सम्मान के साथ रहने और देश के दूसरे नागरिकों की तरह जीवन और संपत्ति का अधिकार  दिया जाए। तभी हमारे संविधान में जिस स्वराज की बात कही गई है, वह सही अर्थों में यहां रहने वाले महसूस कर सकेंगे। इसके अलावा, जरूरी यह भी है कि हर कैंटोनमेंट क्षेत्र की समस्याओं को जांचने, अन्यायपूर्ण ब्रिटिश अधिनियमों की समीक्षा करने और सार्वजनिक हित में जमीन की जरूरत व अतिरिक्त भूमि के निपटान की नए सिरे से समीक्षा के लिए एक आयोग या अधिकार-प्राप्त कमेटी बनाई जाए। सवाल यह है कि क्या ऐसा हो सकेगा? (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Retired Lieutenant General Mohan Bhandari article in Hindustan on 13 september