DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

महाराजा से निवेशकों की तौबा के बाद

ओपिनियन

रणनीतिक विनिवेश के तहत केंद्र सरकार द्वारा अपनी 76 फीसदी हिस्सेदारी बेचने और 25 हजार करोड़ रुपये की कर्ज-माफी की गारंटी देने के बावजूद एअर इंडिया को कोई खरीदार नहीं मिला। सरकार इस बारे में कहीं ज्यादा आशान्वित थी और मानकर चल रही थी कि कई बड़े खरीदार इसमें रुचि दिखाएंगे। मगर उसकी उम्मीदों को धक्का लगा है। आखिर एअर इंडिया को नया मालिक क्यों नहीं मिल सका? क्या इसकी अकूत परिसंपत्तियां भी निवेशकों को नहीं लुभा पाईं? सवाल यह भी है कि अब क्या एअर इंडिया को उसके अपने हाल पर छोड़ दिया जाएगा या उसे घाटे से उबारने के कुछ ठोस प्रयास किए जाएंगे?

किसी भी सार्वजनिक कंपनी में कई पहलुओं को देखकर निवेश किए जाते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक होता है। एअर इंडिया इसी मोर्चे पर पिछड़ती दिखी। उस पर अभी करीब 54 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। सरकार द्वारा कर्ज-माफी के बाद भी लगभग 29 हजार करोड़ रुपये की देनदारी बनती। इसके अलावा, हर सक्रिय संगठन पर कुछ छिपी देनदारी भी होती है, जो एअर इंडिया पर भी होगी। अंदाजन यह राशि 10-15 हजार करोड़ रुपये होनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि जो कंपनी इसे खरीदती, उसे लगभग 40-45 हजार करोड़ रुपये बतौर कर्ज चुकाने होते।
निवेशक निवेश करने से पहले कंपनी की कीमत, उसके संचालन का खर्च और ग्रोथ को भी आंकता है। एअर इंडिया के मामले में भी निवेशकों ने आकलन किया होगा कि इसके मौजूदा संचालन घाटे को पाटने में कितना वक्त लगेगा और कितने अतिरिक्त संसाधनों की उन्हें जरूरत होगी? यूनियन-एग्रीमेंट्स यानी विभिन्न कर्मचारी संघों के साथ हुए समझौते और कर्मियों की उत्पादकता को बढ़ाना भी एक पक्ष रहा होगा। चूंकि विमानन उद्योग में प्रतिस्पद्र्धा लगातार बढ़ रही है, लिहाजा नए रूट खोलने, संचालन-क्षेत्र के विस्तार, नए विमानों की आवक और रजिस्ट्रेशन आदि के खर्च भी निवेशकों ने आंके ही होंगे। इन सबको जोड़ लें, तो एअर इंडिया को उबारने में किसी भी कंपनी को कम से कम तीन-चार साल का समय लगेगा और इन वर्षों में अतिरिक्त 25-30 हजार करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। यह कोई मामूली रकम नहीं है।

सरकार ने विनिवेश की एक शर्त इसे किसी दूसरी कंपनी में विलय न करने की भी रखी थी। अगर यह अनुमति मिल जाती, तो निवेशक को टैक्स में लाभ तो मिलता ही, कुछ अन्य फायदे भी होते। एक बात यह भी कि यह एनडीए सरकार का आखिरी साल है, और चुनावी वर्ष में कोई भी निवेशक इतने बड़े निवेश से प्राय: कतराता है। क्योंकि आशंका यह होती है कि आने वाली सरकार कहीं विनिवेश की पूरी प्रक्रिया पर ही जांच न बिठा दे, जिसमें बेवजह का वक्त जाया होता है। लिहाजा कोई निवेशक क्यों ‘आफत’ मोल लेना चाहता! 

एअर इंडिया को नया खरीदार तब तक नहीं मिलेगा, जब तक उसकी संचालन क्षमता नहीं सुधर जाती। और अगर उसकी संचालन क्षमता सुधर जाती है, तो फिर उसे बेचने की जरूरत ही नहीं है। यानी अब सरकार को ही इसे अपनी जिम्मेदारी के तौर पर संवारना होगा। इसके स्वर्णिम इतिहास, कूटनीतिक व सामरिक योगदान और महत्व को देखें, तो सरकार को इसे उबारने की इच्छाशक्ति दिखानी ही चाहिए। 
आखिर ऐसा क्या किया जाए कि सफेद हाथी बनता जा रहा महाराजा अपना गौरव फिर हासिल कर सके? मेरा मानना है कि कुछ नीतिगत फैसले लिए जाने की दरकार है। अगर विमानन क्षेत्र के किसी जानकार को इसका सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) बनाकर उसे काम करने की पूरी आजादी दे दी जाए, तब भी इसकी सेहत काफी सुधर सकती है। अभी तो लगातार प्रयोग ही किए जा रहे हैं। पिछले तीन साल में तीन बार इसके चेयरमैन ही बदले गए। ‘कन्फ्यूज्ड अकाउंटिबिलिटी’ (जिम्मेदारी को लेकर भ्रम का माहौल) की स्थिति है यह। जाहिर है, जब तक नेतृत्व को आजादी नहीं दी जाएगी और इसे व्यावसायिक इकाई के रूप में चलने नहीं दिया जाएगा, हालात नहीं बदलेंगे।

दिक्कत यह भी है कि हाल के वर्षों में मुख्य कार्यकारी अधिकारियों ने इसके संचालन को सुधारने के कोई ठोस प्रयास नहीं किए। उनकी नियुक्ति भी बमुश्किल आठ-दस महीनों के लिए हुई, जिस कारण उनका कार्यकाल एअर इंडिया को समझने में ही बीत गया होगा। हालांकि यह शिकायत सिर्फ एअर इंडिया की नहीं है। देश के कमोबेश सभी सार्वजनिक उपक्रमों में लाखों करोड़ रुपये का निवेश तो है, पर सरकार की उदासीनता के कारण उनकी हालत खस्ता है। अगर सार्वजनिक उपक्रम को लेकर कोई समग्र नीति बनती है, तो उसका फायदा एअर इंडिया को भी जरूर होगा।
सवाल इसकी क्षमता पर भी उठाए जाते हैं और दावा किया जाता है कि यदि इसे निजी हाथों में सौंप दिया जाए, तो यह कहीं बेहतर काम कर पाएगी? मैं इससे सहमत नहीं हूं।

अव्वल तो अपने देश में निजी कंपनियों का जो हाल है, वह बैंकों के डूबे कर्ज यानी एनपीए को देखकर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है, फिर विदेशी कंपनियों के हाथों में इसे सौंपने का अर्थ होगा, अपने राष्ट्रीय हितों का नुकसान करना। इसलिए राष्ट्रीय नेतृत्व को बतौर चुनौती एअर इंडिया में आमूलचूल बदलाव करना चाहिए। उसे इसका सिस्टम सुधारना होगा। कर्मियों की उत्पादकता बढ़ानी होगी। कंपनी में नया जोश भरना होगा। अगर एअर इंडिया के कर्मचारी निजी विमानन कंपनी में शामिल होने के बाद अच्छा काम करते हैं, तो उनकी क्षमता का इस्तेमाल यहां क्यों नहीं हो सकता? इस टीम की काबिलियत किसी से छिपी नहीं है। उन्हें सिर्फ दिशा देने की जरूरत है। एअर इंडिया एक ‘इंटीग्रेटेड’ संगठन भी है। यानी इसके पास संचालन का विशाल नेटवर्क तो है ही, इंजीनिर्यंरग, संचालन व पायलट ट्रेनिंग का एक समग्र इंफ्रास्ट्रक्चर भी है। इस हद तक की क्षमता किसी दूसरी विमानन कंपनियों के पास नहीं है।

स्पष्ट है, कर्ज-माफी इसकी मुश्किलों का हल नहीं। जरूरत नीतिगत बदलाव की है। पिछले 30 वर्षों में एअर इंडिया की उत्पादकता लगातार घटी है। सरकार को यही क्षरण रोकना होगा। इसे काबिल नेतृत्व देने की जरूरत है। तभी महाराजा पुराना रुतबा हासिल कर सकेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:opinion hindustan column on 7 june