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समाज और सेना के बदलते रिश्ते

former Lieutenant General mohan bhandari

हाल के दिनों में अपने यहां नागरिक और सेना के आपसी संबंधों ने काफी अधिक ध्यान खींचा है। कई लोगों की, (खासकर सेना के भीतर) यह राय है कि करीब 12 वर्ष पहले वेतन आयोग पर उठे विवाद ने आम लोगों और सैनिकों के बीच जो एक अविश्वास पैदा किया, वह आज भी कायम है। बीते वर्षों में आश्चर्यजनक रूप से ऐसे कई मामले सामने आते रहे, जिनके अदालत में जाने से चिंताजनक स्थिति बन आई। 300 से अधिक सैन्य अधिकारियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करना अभूतपूर्व कदम ही नहीं, बल्कि यह एक संकेत भी है कि देश की शासन-प्रणाली और सेना के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। एक वक्त सेना प्रमुख के हाथों सम्मानित हो चुके मेजर नितिन लीतुल गोगोई अब ‘कोर्ट ऑफ इन्क्वॉयरी’ में दोषी करार दिए गए हैं। उधर 76 वर्षके कर्नल वीपीएस चौहान को झूठे आरोप में नोएडा की जेल में भेज दिया गया था।

ये तमाम घटनाएं साफ-साफ बताती हैं कि केंद्र व राज्य की सियासत का दबाव और नेताओं-नौकरशाहों में सेना की उपेक्षा व अनादर का भाव लगातार बढ़ रहा है और अब यह एक ट्रेंड का रूप ले चुका है। जब सैनिकों को घेर लिया जाता है और कई जिंदगियां खतरे में आ जाती हैं, तब मानवाधिकारों से समझौता करना पड़ता है, क्योंकि यह जाहिर तौर पर आत्मरक्षा का मामला है। दुखद बात यह है कि कोई भी सैनिकों के मानवाधिकारों की नहीं सोचता। खासकर जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत के राजनेता और अब न्यायपालिका भी सेना की नीयत पर सवाल उठाने लगी है। जो लोग सेना के तथाकथित ‘नैतिक पतन’ का विलाप करते हैं, दरअसल सशस्त्र बलों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में उनकी समझ सतही है। उनमें से ज्यादातर को राष्ट्रीय सुरक्षा की नाममात्र की जानकारी है। मेरा स्पष्ट मानना है कि तमाम दुश्वारियों के बाद भी कश्मीर और पूर्वोत्तर में भारतीय सेना दम-खम के साथ बनी हुई है, जबकि वहीं राजनीतिक संस्थानों के आचार-विचार और संस्कृति में तेज गिरावट आई है। यही वजह है कि अधिकतर लोगों का राजनीति से भरोसा उठा है या फिर काफी कम हुआ है।

पिछले कुछ वर्षों में चिंता करने लायक जो दूसरा मसला उभरा है, वह है राजनेताओं और नौकरशाहों द्वारा सेना पर नियंत्रण की कोशिश करना। यहां तक कि सामान्य प्रशासकीय कार्यों में भी उनका हस्तक्षेप बढ़ रहा है, जो कतई उचित नहीं। यदि राजनेता और नौकरशाह सैन्य मामलों के जानकार हों, तो फिर यह दखल नहीं अखरता। लिहाजा उन्हें इन मामलों से परिचित कराने की जरूरत है। अगर दखल की यह प्रवृत्ति नहीं नियंत्रित की गई, तो सेना के पेशेवर ‘एथिक्स’ को नुकसान पहुंच सकता है। यह बताने की जरूरत नहीं कि अपने मोर्चे पर सैनिक कितने अनुशासित होकर अपना फर्ज निभाते हैं। मगर विशुद्ध गैर-राजनीतिक जवान इन सब वजहों से आज भ्रमित और परेशान हो उठे हैं। 

इसलिए यह वक्ती जरूरत है कि सेना, राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाहों के बीच आपसी संवाद बढ़ाया जाए। हकीकत यह है कि आज राजनेता, सेना और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के बीच संवाद की कमी है। और यह देश के लिए ठीक नहीं है। भारत में नागरिक-सेना संबंधों की विशिष्ट प्रकृति की व्याख्या ‘संवादहीनता’ के रूप में की जाती है, जो कि संरचनात्मक रूप से समस्यामूलक है और यह नागरिकों व सेना के बीच मतभेदके हालात बनाती है। इस समस्या का बीज आजादी के तुरंत बाद के वर्षों में ही दिख गया था। और यह बीज दरअसल भारतीय लोकतंत्र की महानतम उपलब्धियों में से एक- सेना पर नागरिक सरकार के नियंत्रण- का ही बाई-प्रोडक्ट है।

सेना की दक्षता और नैतिकता को जानने के लिए यह आवश्यक है कि इस तथ्य को संज्ञान में रखा जाए कि हमारा सैन्य बल एक निर्धारित परिस्थिति में काम करता है। और इस परिस्थिति में वे कारक भी शामिल हैं, जो बाहरी हैं और सैन्य बलों के दायरे के बाहर हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सेना के जवान समाज की कुंठाओं और हताशा से अछूते हैं। इनका कार्य-संस्कृति पर साफ-साफ असर दिखता है। आज हर जगह, हर स्तर पर करियर और निजी हितों को अहमियत मिलने लगी है और लोग ज्यादा से ज्यादा भौतिकता के आग्रही हो गए हैं और धन संग्रह में जुटे हैं। संगठनों और सेना से अपेक्षाएं कई गुना बढ़ रही हैं और इनमें कोई भी कमी निराशा को गहरा सकती है और उनमें अनैतिक कार्य की प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे सकती है। 

सबसे बडे़ बलिदान के मोर्चे पर भारतीय सेना ने हमेशा सर्वश्रेष्ठ नैतिक आचरण का प्रदर्शन किया है। जाहिर है, ऐसे त्याग की प्रेरणा उन्हें तनख्वाह और सुविधाओं से नहीं मिलती, बल्कि निर्भीक अनुशासन से उन्हें मिलती है। केरल की बाढ़ में नागरिक प्रशासन की मदद में भारतीय सेना जिस प्रतिबद्धता और समर्पण भाव से जुटी है, वह अपने आप में एक नजीर है। यह है हमारी सेना की महानता। उसके नैतिक आचरण और उनकी कार्य-संस्कृति का अनुकरण पूरी दुनिया के वरदीधारी करते हैं।

लेकिन युद्ध काल को छोड़ बाकी दिनों में भारतीय फौजियों के प्रति समाज में बढ़ते अनादर को देख एक फौजी यही सोचता है कि वह किसी गलत मुकाम पर तो नहीं है। यह निहायत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हमारे समाज और नागरिकों में सैनिकों की नौकरी की चुनौतियों और उनसे जुड़े तथ्यों के बारे में जागरूकता का अभाव है।  यहां चाणक्य को याद कीजिए। उन्होंने अपने राजा से कहा था- ‘सैनिकों को अपने लिए कुछ मांगने की स्थिति कभी नहीं आने देना चाहिए। राजन्, उनकी आवश्यकताओं को देखना आपका दायित्व है। जिस दिन किसी सैनिक को आपको यह याद दिलानी पड़े कि उसका कुछ बकाया आपके पास है, तो वह आपके शासन के दुर्भाग्य के आरंभ का दिन होगा। इसलिए, उनकी आवश्यकताओं पर आप ध्यान दीजिए।’

एक सैनिक को सम्मान और मान्यता देने की जरूरत है। उन्हें यह दीजिए। वे आपसे और कुछ नहीं चाहते। उनसे आप बस यही कहिए, ‘शाबाश मेरे जांबाज! हमें आप पर गर्व है।’
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:former Lieutenant General mohan bhandari article in Hindustan on 1st of september