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हमारे हित और अमेरिका की भूमिका

शशांक पूर्व विदेश सचिव

भारत और अमेरिका के बीच हुई ‘टू प्लस टू वार्ता’ कई आशंकाओं को जन्म देने के बाद भी उम्मीद बंधाती है। अच्छी बात यह है कि अमेरिका ने इस वार्ता के माध्यम से हमें अपने सहयोगी का दर्जा दिया है। ‘क्वाड’ (चतुष्कोणीय गठबंधन का संक्षिप्त रूप) के सदस्यों के साथ अमेरिका ने टू प्लस टू वार्ता की अनोखी पहल शुरू की है, जिसके दो अन्य सदस्य देश ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ यह होता भी रहा है। मगर ये दोनों उसके सहयोगी देश हैं। इसीलिए यदि अब हमें यह दर्जा हासिल हुआ है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

भारत और अमेरिका में इस तरह की बातचीत जरूरी थी, ताकि दोनों देश एक-दूसरे के विचार और दृष्टिकोण जान सकें। कई बार यह देखा गया है कि भारत के हितों पर अमेरिका उस कदर मुखर नहीं हुआ, जितनी अपेक्षा थी। मसलन, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को लेकर ही वह इस्लामाबाद पर दबाव नहीं बना पा रहा है। अगर वह उस पर थोड़ा-बहुत दबाव बनाता भी है, तो वह अफगानिस्तान में आतंकी घटनाओं को लेकर होता है, उसमें भारत का पक्ष कमोबेश अनसुना ही रहता है। टू प्लस टू वार्ता में शामिल होने के लिए ही अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो पाकिस्तान होकर आए थे, जहां उन्होंने दबाव डालने की बजाय अपनी अपेक्षाएं बताईं। प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी देश का उसका दर्जा भी अब तक कायम है। इसका साफ अर्थ है कि पाकिस्तान अब भी अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण देश है, और खासतौर से अफगाानिस्तान मसले पर उसका एक प्रमुख सहयोगी बना हुआ है। इसी तरह, कई ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने विभाग की सलाह के इतर फैसले लिए और अपनी नीति की घोषणा ट्विटर पर की। लिहाजा यह जरूरी था कि अमेरिका में बन रहे इस नए सिस्टम को भारत समझे।

टू प्लस टू वार्ता में कई ऐसे फैसले हुए हैं, जो भारत के नजरिये से बेहतर माने जाएंगे। रणनीतिक रूप से अहम संचार, संगतता, सुरक्षा समझौता (कॉमकोसा, यानी कम्युनिकेशन, कॉम्पैटिबिलिटी ऐंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) इसमें सबसे महत्वपूर्ण है। अच्छी बात यह है कि इसमें भारत की चिंताओं को शामिल करके इसे ‘इंडिया स्पेसिफिक’ बनाया गया है। इसके तहत भारत को अपनी सेना के लिए अमेरिका से कुछ आधुनिक संचार प्रणाली मिलेगी। इसके अलावा, अमेरिका से जो भी रक्षा उपकरण भारत आएंगे, सिर्फ वही अमेरिकी प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल किए जाएंगे। भारत में मौजूद अन्य रक्षा उपकरणों पर ऐसी कोई बंदिश नहीं होगी। असल में, अमेरिका इस  समझौते के तहत सभी रक्षा उपकरणों को अपने प्लेटफॉर्म पर लाने का आग्रही रहा है। अगर ऐसा होता, तो हमें अपना पूरा रक्षा तंत्र अमेरिका के साथ साझा करना पड़ता। चूंकि हमने कई अन्य देशों से भी रक्षा समझौते किए हैं और उनसे सैन्य उपकरण खरीदें हैं, इसीलिए अमेरिकी बंदिश को मानने का अर्थ उन तमाम देशों की सुरक्षा तकनीकों की गोपनीयता को भंग करना होता। यह हमारे हित में  कतई नहीं था।  

दूसरी अच्छी बात यह हुई है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गुटों का नाम लिया गया है और मिलकर उनके खिलाफ कार्रवाई करने पर सहमति बनी है। आतंकवाद से लड़ने के लिए अमेरिका के साथ एक ग्रुप हमने पहले से बना रखा है। उम्मीद है कि अब यह और बेहतर तरीके से काम कर सकेगा। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि हाफिज सईद, मसूद अजहर या दाऊद इब्राहिम जैसे आतंकियों के खिलाफ तुरंत बड़ी कार्रवाई होगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि अमेरिका के अपने हित पाकिस्तान के साथ जुड़े हुए हैं। लिहाजा भारत को भी कुछ खास सावधानी बरतनी होगी। विशेषकर कश्मीर में जिस तरह के आतंकियों के हौसले बढ़े हैं, उसके खिलाफ अपने तईं उसे कड़ी कार्रवाई करनी ही होगी। 

इंडो-पैसिफिक के मसले पर भी भारत और अमेरिका के रिश्ते आगे बढ़ते हुए दिख रहे हैं। हालांकि यहां भी समझने की बात है कि अमेरिका का चीन के साथ एक जटिल रिश्ता है। लिहाजा भारत को पूरी तरह संभलकर आगे बढ़ना होगा। खासतौर से, कारोबार के मामले में दूसरे तमाम देशों से अच्छे रिश्ते बनाकर चलने में ही हमारी भलाई है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अमेरिका तमाम तरह के प्रतिबंध आयद करने की बात कहता रहता है। लिहाजा क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) पर संजीदगी से आगे बढ़ना हमारे हित में होगा। यह मुक्त व्यापार को लेकर एक ऐसा प्रस्तावित समझौता है, जो आसियान के सभी दस देशों के साथ ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों को भी एक साथ जोड़ता है। इसमें हम चीन के साथ बेशक सोच-समझकर आगे बढ़ें, पर दूसरे तमाम देशों के साथ हमें तेजी से कदम बढ़ना होगा। 

इसमें कोई दोराय नहीं है कि अमेरिका के साथ आगे बढ़ना हमारे हित में है। मगर हम उसके अधीनस्थ सहयोगी की भूमिका नहीं निभा सकते। अमेरिका जब अपने हितों के मद्देनजर पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए हुए है, तो हमें भी उसकी चिंता करते हुए ईरान और रूस के साथ अपने संबंधों की बलि नहीं देनी चाहिए। हालांकि जरूरी यह भी है कि हम तुर्की की तरह अमेरिका की सीधे-सीधे नाराजगी मोल न लें। गंभीर चिंतन के बाद उन मसलों पर आगे बढ़ें, जिसे लेकर ह्वाइट हाउस का रवैया सख्त है। अमेरिका में अब भी कई ऐसे लोग हैं, जो भारत के नजरिये का समर्थन करते हैं। ऐसे में, उम्मीद यही है कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव के बाद यदि वहां की कांग्रेस (संसद) की तस्वीर बदलती है, तो अमेरिका की नीतियां कहीं अधिक स्पष्ट रूप में हमारे सामने आ सकती हैं।

हमारा लक्ष्य दुनिया की तीन सबसे बड़ी ताकतों में शुमार होने का है। हमें इसी लक्ष्य के मद्देनजर अपनी नीतियां बनानी चाहिए। और इसमें जरूरी है कि हम एक व्यापक और समग्र सोच रखें। हमें चीन के साथ भी संबंध बेहतर बनाने होंगे और रूस के साथ बने रिश्ते की गरमाहट भी बरकरार रखनी है। अमेरिका का साझीदार बनने के लिए हम दूसरे देशों के साथ अपने रिश्ते खराब नहीं कर सकते। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:former Foreign Secretary Shashank article in Hindustan on 08 september