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रूस के साथ दोस्ती का बढ़ता दायरा

शशांक  पूर्व विदेश सचिव

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा कई मामलों में महत्वपूर्ण साबित हुई। बेशक यह शीर्ष स्तर पर सालाना होने वाली मुलाकात की ही एक कड़ी थी, मगर वक्त और समझौते ने इस दौरे को अहम बना दिया। एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम पाने का करार इस यात्रा की खास उपलब्धि है। यह सिस्टम निश्चय ही हमारी सुरक्षा-व्यवस्था को एक नया आयाम देगा। मगर यह दौरा चीन-पाकिस्तान जैसे देशों के लिए एक आईना भी था कि रूस-भारत का आपसी रिश्ता किसी द्वंद्व का शिकार नहीं है। 

दरअसल, हाल के दिनों में सामरिक क्षेत्रों में ऐसी बातें तैरने लगी थीं कि रूस एक ‘जूनियर पार्टनर’ के रूप में चीन के साथ आगे बढ़ रहा है। जाहिरा तौर पर यह नई दोस्ती पाकिस्तान को मदद पहुंचाने वाली साबित होती। इस्लामाबाद तो मॉस्को का एक विश्वस्त सहयोगी बनना चाहता ही है। उसकी मंशा अफगानिस्तान व मध्य-पूर्व में एक उपयोगी पक्षकार बनने की भी है। मगर पुतिन ने नई दिल्ली आकर इन तमाम कयासों पर विराम लगा दिया। उन्होंने यह भी संकेत दे दिया कि नई दिल्ली-मॉस्को के द्विपक्षीय रिश्ते अब नई ऊंचाई छूने जा रहे हैं। इन सबसे आपसी संबंधों में खटास की बात निराधार साबित हुई।

रूस हमारे लिए काफी अहमियत रखता है। वह हमारा ‘टाइम टेस्टेड’ यानी एक जांचा-परखा दोस्त है। इस दोस्ती को गंवाने का कोई सवाल ही नहीं है। अमेरिका की मंशा बेशक यह है कि हम दूसरे देशों के साथ अपने पुराने तमाम रिश्तों को तोड़कर वाशिंगटन के साथ नई राह पर आगे बढ़ें। मगर भारत शायद ही अमेरिका से मित्रता बढ़ाने के लिए अपने भरोसेमंद दोस्तों को खोना चाहेगा। मगर यहां यह कहना भी गलत होगा कि भारत ने अमेरिका को पूरी तरह दरकिनार करके रूस के साथ समझौते किए हैं। एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम को लेकर अमेरिका की आपत्ति अपनी जगह सही हो सकती है, क्योंकि उसके अनुसार, ऐसा कोई तंत्र उसकी सुरक्षा-व्यवस्था में सेंध लगा सकता है। मगर भारत एक जिम्मेदार देश है। हम मध्य मार्ग के हिमायती रहे हैं। शायद इसीलिए यह उम्मीद जताई जा रही है कि वाशिंगटन उस काटसा (काउंर्टंरग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंगशंस ऐक्ट) से नई दिल्ली को राहत दे सकता है, जो उसने दुश्मन देशों को प्रतिबंधों के जरिए दंडित करने के लिए बना रखा है।
अमेरिकी आपत्तियों को पूरी तरह नजरअंदाज करना हमारे हित में है भी नहीं। रूस के साथ हमारे रिश्ते जरूर आगे बढ़ने चाहिए, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों की पहचान हमें खुद करनी होगी। हमें यह तय करना होगा कि हम एक सीमा से ज्यादा अमेरिका की नाराजगी मोल न लें। ऐसे वक्त में, जब 2030 तक भारत की संभावना दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की है, तब अमेरिका से रिश्ते बिगाड़ना हमारी आर्थिक तरक्की की राह बाधित कर सकता है। तब तक तो हमें बिल्कुल ऐसा कोई संकेत नहीं देना चाहिए, जब तक कि अमेरिका खुद यह फैसला नहीं करता कि वह रूस के साथ पुराने संबंध निभा रहे देशों के साथ कितनी दूर तक आगे जाएगा? इन देशों में भारत के साथ इंडोनेशिया, वियतनाम भी शामिल हैं। हमारी कोशिश ऐसे तमाम देशों से संबंध निभाने की होनी चाहिए, जिनके साथ हमारे ‘स्ट्रैटेजिक रिलेशन’ हैं और जो बुरे वक्त में हमारे साथ खड़े रहे हैं।

पुतिन की इस यात्रा से चीन और पाकिस्तान को यकीनन सबक मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति के साथ एक खास तरह के रणनीतिक रिश्ते बनाए हैं। इसमें पुराने संबंधों को नई ऊंचाई तक ले जाने की गंभीर कोशिश की गई है। यही वजह है कि पुतिन ने इस यात्रा में भारत की चिंताओं पर पूरा ध्यान दिया। अगर रूस ने चीन को एस-400 मिसाइल सिस्टम दिया है, तो यह भी सच है कि बीजिंग से कहीं अधिक तेजी से वह यह सिस्टम हमें देने को तैयार हुआ है। मॉस्को ने स्पष्ट किया कि वह चीन का पिछलग्गू नहीं है, बल्कि सोच-संभलकर चीन और भारत, दोनों के साथ अपने रिश्ते बढ़ाना चाहता है। अब गेंद चीन के पाले में है। अगर उसे रूस के साथ आगे बढ़ना है, तो पाकिस्तान पर दबाव बनाना होगा। उसे आतंकवाद के खिलाफ भी काम करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि पाकिस्तान की जमीन पर पलने वाली आतंकी जमातें भारत व अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों को अस्थिर करने की कोशिश न करें।

यह उस इरादे का इजहार है, जिसे पहले रूसी शहर सोचि और अब नई दिल्ली में मोदी और पुतिन ने मिलकर मजबूती दी है। रूस नई तकनीक के हस्तांतरण को लेकर कभी हमें निराश नहीं करता। इस बार भी उसने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। भारत ने भी परमाणु ऊर्जा, रेलवे, हीरा आयात जैसे तमाम आर्थिक मोर्चों पर रूस का भरोसा बरकरार रखा है। यही वजह है कि रूस ने ‘नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर’ पर भी साथ-साथ आगे बढ़ने को लेकर अपनी रजामंदी दी है। ईरान, अजरबैजान और रूस से गुजरने वाला यह परिवहन गलियारा भारत और फारस के देशों के लिए पूर्वी यूरोप और मध्य एशियाई देशों का दरवाजा खोलेगा। एक तरह से यह हमें इन तमाम देशों के बीच ले जाएगा। इस गलियारे को लेकर रूस से हमारी पहले भी बातचीत हुई थी, मगर अब इसमें गति आएगी। इसके अलावा, ‘गगनयान मिशन’ में भी रूस का साथ हमें मिलेगा। यह भारत का मानव-अंतरिक्ष मिशन है और इसकी सफलता हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम को विश्व फलक पर कई मायनों में श्रेष्ठ बनाएगी।

अभी तक यही माना जाता था कि रूस के साथ हमारे रिश्ते रक्षा, तेल या अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में ही हैं। मगर अब यह रिश्ता व्यापक होने लगा है। साल 2017 में हमारा आपसी कारोबार 17 फीसदी बढ़ा है। दोतरफा निवेश का ‘30 अरब डॉलर’ का लक्ष्य भी पूरा कर लिया गया है और अब 50 अरब डॉलर के दोतरफा निवेश को पाने का लक्ष्य है। अब उन तमाम मसलों पर भी साथ-साथ आगे बढ़ने की बात कही गई है, जो दोनों देशों के लिए समान रूप से चिंता का कारण बन सकते हैं। इसमें आतंकवाद स्वाभाविक तौर पर एक बड़ा मसला है। शांति और स्थिरता के लिए यह जरूरी भी है कि रूस-भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक देश साथ-साथ आगे बढ़ें। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:former Foreign Secretary Shashank article in Hindustan on 08 october