महिला बनकर करते थे रेकी, पक्षियों की आवाज में देते थे सिग्नल; उदयपुर पुलिस ने दबोची शातिर गैंग
आमतौर पर चोरी के मामलों में अपराधी तकनीक का सहारा लेते हैं, लेकिन उदयपुर के कुराबड़ थाना इलाके में सामने आया यह मामला पारंपरिक सोच से बिल्कुल उलट है। यहां एक ऐसा गिरोह पकड़ा गया है, जिसने हाई-टेक पुलिसिंग को मात देने के लिए लो-टेक लेकिन बेहद चालाक तरीका अपनाया।

आमतौर पर चोरी के मामलों में अपराधी तकनीक का सहारा लेते हैं, लेकिन उदयपुर के कुराबड़ थाना इलाके में सामने आया यह मामला पारंपरिक सोच से बिल्कुल उलट है। यहां एक ऐसा गिरोह पकड़ा गया है, जिसने हाई-टेक पुलिसिंग को मात देने के लिए लो-टेक लेकिन बेहद चालाक तरीका अपनाया। महिलाओं का भेष, बिना मोबाइल के नेटवर्क और पक्षियों की आवाज में संवाद—यह सब मिलकर एक ऐसी क्राइम स्टोरी बनाते हैं, जो किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती।
ज्वेलरी शॉप बनी टारगेट, 80 लाख की चांदी पार
मामले की शुरुआत मोहित ज्वेलर्स में हुई बड़ी चोरी से हुई, जहां से करीब 80 लाख रुपए की चांदी पार कर ली गई। शुरुआती जांच में पुलिस के हाथ कोई ठोस सुराग नहीं लगा। न सीसीटीवी में स्पष्ट पहचान, न मोबाइल लोकेशन ऐसे में यह केस पुलिस के लिए चुनौती बन गया। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, वैसे-वैसे इस गिरोह के काम करने का तरीका सामने आता गया।
महिलाओं का भेष: शक से बचने की मास्टर चाल
पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी वारदात के समय महिलाओं का भेष धारण करते थे। रात के अंधेरे में साड़ी या सलवार-सूट पहनकर वे कॉलोनियों में इस तरह घूमते थे कि किसी को जरा भी शक नहीं होता था। स्थानीय लोग उन्हें सामान्य महिला समझकर नजरअंदाज कर देते थे। यही इनकी सबसे बड़ी सुरक्षा कवच थी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह तरीका “सोशल इंजीनियरिंग” का हिस्सा माना जा सकता है, जहां अपराधी समाज की सामान्य धारणाओं का फायदा उठाकर खुद को छुपाते हैं।
नो मोबाइल, नो ट्रेस: पुलिस के लिए बड़ी चुनौती
इस गिरोह की सबसे खास बात यह रही कि ये मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं करते थे। आज के डिजिटल युग में जहां हर अपराधी की लोकेशन, कॉल डिटेल और डिजिटल फुटप्रिंट से सुराग मिल जाता है, वहीं इस गैंग ने पूरी तरह “ऑफ-ग्रिड” रहकर काम किया।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, मोबाइल न रखने से इनकी ट्रैकिंग लगभग असंभव हो गई थी। यही वजह रही कि लंबे समय तक यह गिरोह पुलिस की पकड़ से बाहर रहा।
पक्षियों की आवाज से कम्युनिकेशन: अनोखा नेटवर्क
गिरोह के सदस्य आपस में संवाद के लिए पक्षियों की आवाज का इस्तेमाल करते थे। अलग-अलग आवाजें अलग-अलग संकेत देती थीं जैसे खतरा, रास्ता साफ, या ऑपरेशन पूरा होने का इशारा। यह तरीका न केवल अनोखा था, बल्कि पूरी तरह सुरक्षित भी, क्योंकि इसमें कोई डिजिटल या लिखित सबूत नहीं बनता।
क्राइम एक्सपर्ट मानते हैं कि यह “प्रिमिटिव कम्युनिकेशन सिस्टम” होते हुए भी बेहद प्रभावी है, खासकर तब जब पुलिस तकनीकी निगरानी पर निर्भर हो।
पुराने अपराधी, संगठित नेटवर्क
गिरफ्तार आरोपियों—शिवलाल उर्फ शिवा कंजर, कालूलाल कंजर और महेंद्र कंजर—का आपराधिक रिकॉर्ड भी सामने आया है। ये सभी चित्तौड़गढ़ क्षेत्र के निवासी हैं और इनके खिलाफ पहले से कई चोरी के मामले दर्ज हैं। इससे साफ होता है कि यह कोई नया गैंग नहीं, बल्कि लंबे समय से सक्रिय एक संगठित नेटवर्क है, जिसने समय के साथ अपने तरीके को और अधिक परिष्कृत किया।
लंबी निगरानी के बाद पुलिस को सफलता
जिला पुलिस अधीक्षक डॉ. अमृता दूहन के निर्देशन में और डीएसपी गोपाल चंदेल की टीम ने इस केस को सुलझाने के लिए लगातार निगरानी और तकनीकी विश्लेषण का सहारा लिया। आखिरकार पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया और उनके कब्जे से करीब 30 किलो 800 ग्राम चांदी बरामद की।
यह कार्रवाई बताती है कि पारंपरिक और आधुनिक पुलिसिंग का संयोजन ही ऐसे जटिल मामलों में सफलता दिला सकता है।
क्राइम ट्रेंड की चेतावनी
यह मामला केवल एक चोरी का खुलासा नहीं, बल्कि बदलते अपराध ट्रेंड की भी चेतावनी है। अपराधी अब तकनीक से बचने के लिए पुराने और असामान्य तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में पुलिस और समाज दोनों को सतर्क रहने की जरूरत है।
फिलहाल पुलिस आरोपियों से पूछताछ कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस गैंग ने और किन-किन इलाकों में वारदात को अंजाम दिया है। लेकिन इतना तय है कि इस बार अपराधियों की चालाकी उनके ही खिलाफ साबित हुई और उनका “अनदेखा” तरीका ही उन्हें सलाखों तक ले आया।
लेखक के बारे में
Sachin Sharmaसचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)
सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।
सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।
शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।
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