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राजस्थान में इतिहास का खजाना, इस हाथी का है सदियों पुराना रिश्ता!

राजस्थान वैसे तो इतिहास का खजाना है. यहां जितना खंगालों उतना ही देखने और सुनने को मिलता है. लेकिन, आज हम आपको ऐसी कहानी से रूबरू करवाएंगे जो अब तक आपने शायद ही पढ़ी हो. आप ऐसी ऐतिहासिक कहानी से...

 राजस्थान में इतिहास का खजाना, इस हाथी का है सदियों पुराना रिश्ता!
एजेंसी,जयपुर।Tue, 21 Jul 2020 02:37 PM
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राजस्थान वैसे तो इतिहास का खजाना है. यहां जितना खंगालों उतना ही देखने और सुनने को मिलता है. लेकिन, आज हम आपको ऐसी कहानी से रूबरू करवाएंगे जो अब तक आपने शायद ही पढ़ी हो. आप ऐसी ऐतिहासिक कहानी से रूबरू होकर अचंभित हो जाएंगे.

दरअसल, राजस्थान के टोंक जिले के उनियारा उपखंड के खेड़ा गांव में एक ऐसा ही इतिहास का खजाना है, जिससे आज आप रूबरू होंगे. पत्थर की एक चट्टान से बना अद्भुत हाथी, दूर से अगर आप देखेंगे तो पूरी तरह से वास्तविक लगेगा और जब पास जाएंंगे तो सामान्य से भी विशाल दिखने वाला यह हाथी पत्थर की एक चट्टान पर देख आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे.

इसके पास ही स्थित एक तलाई सी दिखने वाली पानी की बावली है जो आज तक किसी भी भयंकर अकाल में नहीं सूखी. हाथी के ठीक सामने 64 थालियों के साथ हवन वैदिका बनी हुई है, जो किसी भी सामान्य व्यक्ति के साथ ही एक इतिहासकार के लिए पहेली सी दिखती है.  

इससे जुड़ी कुछ किंवदंती भी हैं. कहा जाता है कि यहां सदियों पहले पांडव अज्ञात वास के दौरान वनवास बिताने आए थे. यह भी कि पांचाली यानी द्रोपदी बिना गणेश भगवान की पूजा किए अन्न ग्रहण नहीं करती थी. तब ही पांडवों ने एक ही रात में पत्थर की विशाल चट्टान पर गणेश भगवान की प्रतिमा स्वरूप हाथी का निर्माण किया. इसके साथ पास में भीम ने अपने घुटने से जमीन में पानी के लिए तलाई खोदी. कहते हैं कि इस तलाई की गहराई पाताल तक है. और यह आज तक कभी नहीं सूखी. 

वहीं एक किवंदती यह भी है कि इस हाथी में पाडंवों ने अपनी सुरक्षा के लिए प्राण भी डाल दिए थे. और यह हाथी करीब 14 कोस के इलाके में रातभर पहरा दिया करता था. जब यह गांवों की बस्ती के पास से गुजरता तो इसकी पीठ पर लगी घंटियो की तेज आवाज से लोग भयभीत होने लगते. बाद में यह हाथी स्थिर हो गया. और आज भी यहीं खड़ा हुआ है.

कहानी यह भी है कि मुगल काल में इस हाथी के चमत्कारों की कहानियां प्रचलित होने.पर इसे यहां से ले जाने का प्रयास भी किया गया. जब सैनिकों ने इसे पैरों से तोड़ने का प्रयास किया तो खून की धारा निकलने से भयभित सैनिक यहां से भाग गए. उसके बाद कभी पलटकर नहीं लौटे. 

बता दें कि आज भी क्षेत्र के लोग इसे गणेश भगवान की प्रतिमा स्वरूप मानकर पूजा करते हैं. और अपनी मन्नत मांगते हैं. यहां राजस्थान की प्रसिद्ध भोग सवामणी का भी आयोजन होता है. इसके साथ ही यहां एक और किवदंती यह है कि इस हाथी की नाभी को कोई भी व्यक्ति पैरों में चप्पल, जूते पहनकर नहीं छूता. ऐसा करने पर उसे करंट के झटके जैसा अनुभव होता है. वहीं दोहराने पर उसके शरीर को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि सालों पहले भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे अपने संरक्षण में ले लिया है. लेकिन, अब तक इसके जीर्णोद्धार का प्रयास नहीं किया गया. इसके मुख्य द्वार सहित सुरक्षा दीवारें पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं. लगातार हर बार चुनावों में नेता इसके जीर्णोद्धार के वादे करते है. लेकिन अब तक कोई भी सरकार इसकी सूरत नहीं बदल पाई.