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सौतेली मां की है सरकारी नौकरी, कोर्ट ने कहा- इस आधार पर बेटी की नियुक्ति को नहीं रोक सकते

राजस्थान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील को अस्वीकार कर दिया कि सौतेली मां के सरकारी नौकरी में होने के कारण एक बेसहारा और अनाथ युवती को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती है।

सौतेली मां की है सरकारी नौकरी, कोर्ट ने कहा- इस आधार पर बेटी की नियुक्ति को नहीं रोक सकते
Subodh Mishraलाइव हिन्दुस्तान,जयपुरFri, 24 May 2024 06:05 PM
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राजस्थान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील को अस्वीकार कर दिया कि सौतेली मां के सरकारी में होने से एक बेसहारा और अनाथ युवती को अनुकंपा पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती। जस्टिस अरुण मोंगा की एकलपीठ ने कहा कि अनाथ याचिकाकर्ता ने अपने अस्तित्व के लिए आजीविका की तलाश के लिए कोर्ट का रुख किया है। इसलिए जरूरी है कि उसके पिता के निधन के बाद उसे अनुकंपा का लाभ दिया जाए। अनुकंपा नीति का इरादा परिवार के कमाने वाले की मौत पर जीवित रहने का अवसर प्रदान करना है ताकि उनके सामने वित्तीय संकट न आए।

लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस मोंगा ने याचिकाकर्ता की परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि सौतेली माता का याचिकाकर्ता के प्रति कोई कानूनी दायित्व नहीं है। सौतेली माता को सरकारी नौकरी इस शर्त के साथ नहीं दी गई थी कि उसके पिता के निधन के बाद उसे याचिकाकर्ता की मदद करनी होगी। इसके अलावा याचिकाकर्ता न तो अपनी सौतेली माता की देखरेख में है और न ही उसके साथ रहती है। यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता के पिता के निधन के बाद सौतेली माता जीवन में आगे बढ़ गई है।

जोधपुर जिले के पीपाड़ सिटी निवासी 19 वर्षीय अनुसूचित जाति वर्ग की दलित युवती गुनगुन की ओर से वकील रजाक खान हैदर ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया कि महज दो वर्ष की आयु में जन्म देने वाली मां और फिर 18 वर्ष की आयु में पिता को खोने के बाद दलित युवती सदमा झेल रही है। विशेष परिस्थितियों के बावजूद राज्य सरकार के माध्यमिक शिक्षा विभाग द्वारा नियमों की संकीर्ण व्याख्या कर उसके अनुकंपा पर नौकरी देने का आवेदन खारिज कर दिया है।

माध्यमिक शिक्षा विभाग में वरिष्ठ अध्यापक के पद पर कार्यरत याचिकाकर्ता के पिता ने वर्ष 2006 में पत्नी की असामयिक मौत होने पर वर्ष 2008 में राजकीय सेवा में कार्यरत महिला से पुनर्विवाह किया था। वर्ष 2022 में सेवाकाल के दौरान याचिकाकर्ता के पिता की भी असामयिक मौत होने पर वह अनाथ और बेसहारा हो गई। ऐसे में उसने माध्यमिक शिक्षा विभाग में अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया, जिसे विभाग ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि याचिकाकर्ता की सौतेली माता के राजकीय सेवा में होने से उसे अनुकंपा पर नियुक्ति नहीं मिल सकती है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मनीष व्यास और रजाक खान हैदर ने तर्क दिया कि राजस्थान मृत सरकारी कर्मचारियों के आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति नियम, 1996 का उद्देश्य राज्य कर्मचारी के असामयिक निधन पर उनके आश्रितों में से किसी एक को राजकीय सेवा में नियोजित कर मृतक के सभी पारिवारिक सदस्यों को आर्थिक सहायता प्रदान करना है।

हालांकि नियम-5 के अनुसार ऐसा नियोजन उन मामलों में लागू नहीं होता है, जहां पति, पत्नी, पुत्र या अविवाहित पुत्री पहले से राजकीय सेवा में नियोजित हों। लेकिन याचिकाकर्ता की सौतेली माता ने याचिकाकर्ता को न तो दत्तक ग्रहण किया है और न ही वह उसका भरण-पोषण करने के लिए तत्पर है। वह अपने पुत्र के साथ स्वतंत्र जीवन जी रही हैं। ऐसे में याचिकाकर्ता के लिए जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है। विशेष परिस्थितयों वाले इस प्रकरण में अनुकंपा नियुक्ति नियम, 1996 के समग्र उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए नियम-5 की उदार व्याख्या किए जाने की आवश्यकता है। सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने दो माह में नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया।