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क्या टैटू हटाने का निशान भी बन सकता है सशस्त्र बलों में अयोग्यता का आधार? हाई कोर्ट का अहम फैसला

राजस्थान हाई कोर्ट ने टैटू हटाने से बने निशान को लेकर सीएपीएफ और असम राइफल्स में नियुक्ति के मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र द्वारा जारी दिशानिर्देश कुछ मामलों में अपवाद है।

क्या टैटू हटाने का निशान भी बन सकता है सशस्त्र बलों में अयोग्यता का आधार? हाई कोर्ट का अहम फैसला
Subodh Mishraलाइव हिन्दुस्तान,जयपुरThu, 16 May 2024 12:44 PM
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राजस्थान उच्च न्यायालय ने अपने हाल के एक फैसले में कहा है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) और असम राइफल्स के किसी उम्मीदवार को टैटू हटाने से बने निशान के एकमात्र आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश मणिंद्र मोहन श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति मुन्नूरी लक्ष्मण की खंडपीठ ने यह भी कहा कि केवल टैटू का अस्तित्व ही अयोग्यता का आधार नहीं हो सकता है। चिकित्सा मानकों पर जांच के लिए यह देखना भी जरूरी है कि शरीर के किस भाग पर इसे अंकित किया गया है। 

टैटू के निशान और चोट के निशान के लिए अलग पैमाना नहीं
बार एंड बेंच के एक रिपोर्ट के अनुसार हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ इसलिए कि टैटू हटाने का निशान दाहिनी बांह के अंदरूनी हिस्से पर है, इसे चिकित्सा अयोग्यता का मामला नहीं माना जा सकता है। साथ ही कहा कि टैटू के निशान और किसी अन्य कारण से जैसे चोट आदि के निशान का अलग-अलग पैमाना नहीं हो सकता है। एकल न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अधिकारियों को एक उम्मीदवार को उसके दाहिने हाथ की बांह और दाहिने हाथ के पिछले हिस्से पर टैटू हटाने का निशान होने के बावजूद उसे कांस्टेबल (सामान्य ड्यूटी) के रूप में नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था।

केंद्र द्वारा जारी दिशानिर्देश कुछ मामलों में अपवाद
खंडपीठ के समक्ष केंद्र की दलील थी कि टैटू के निशान मेडिकल अयोग्यता के लक्षण हैं और एकल न्यायाधीश उम्मीदवार को अयोग्य घोषित करने के मेडिकल बोर्ड के फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। कोर्ट ने इस विषय पर गृह मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों की जांच की। कोर्ट ने पाया कि टैटू के निशान को न केवल अरुचिकर माना जाता है, बल्कि इसे बलों की अच्छाई और अनुशासन से विमुख करने वाला भी माना जाता है। हालांकि न्यायालय ने कहा कि टैटू का निशान रखने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र द्वारा जारी दिशानिर्देश कुछ मामलों में अपवाद है।

सलामी देने वाले अंग पर स्वीकार्य नहीं
अभ्यर्थी की ओर से कोर्ट में पेश हुए अधिवक्ता एनआर बुडानिया ने कहा कि धार्मिक प्रतीक या आकृति और नाम को दर्शाने वाले टैटू की अनुमति दी जानी है। भारतीय सेना में अपनाई जाने वाली प्रथा के अनुरूप सीआरपीएफ में इसकी अनुमति दी जा रही है। प्रावधानों में ही यह तथ्य स्पष्ट रूप से बताया गया है कि टैटू के निशान रखने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हालांकि ऐसे प्रावधान हैं जो टैटू के स्थान और आकार से संबंधित हैं और उम्मीदवार को चिकित्सकीय रूप से अयोग्य बना सकते हैं। लेकिन, शरीर के पारंपरिक स्थानों जैसे बायीं बांह के अंदरूनी हिस्से पर टैटू बनवाना स्वीकार्य है, जो सलामी देने वाला अंग नहीं है। 

टैटू के निशान के आधार पर अयोग्य घोषित करना भेदभाव होगा
कोर्ट ने अभ्यर्थी की ओर से पेश वकील का तर्क सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि टैटू का निशान केवल कुछ स्थितियों में चिकित्सा अयोग्यता का आधार है। अन्य सभी मामलों में यह किसी उम्मीदवार को चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित करने का आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि टैटू का निशान पहले ही हटा दिया गया है और कोई निशान रह गया है, तो यह अयोग्यता के दायरे में नहीं आएगा। कोर्ट ने कहा कि दाहिनी बांह के अंदरूनी हिस्से पर चोट के निशान के आधार पर चिकित्सा अयोग्यता का कोई आधार न होने के कारण, हटाए गए टैटू के निशान के आधार पर एक उम्मीदवार को अयोग्य घोषित करना शत्रुतापूर्ण भेदभाव का परिणाम होगा। इस तरह का भेदभाव इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करते हुए असंवैधानिक बना देगा। कोर्ट एकल न्यायाधीश के फैसले से सहमत हुआ और कहा कि वर्तमान मामले में उम्मीदवारी की अस्वीकृति को सही ढंग से रद्द कर दिया गया है। इस केस में केंद्र सरकार की ओर से डिप्टी सॉलिसिटर जनरल मुकेश राजपुरोहित ने प्रतिनिधित्व किया।

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