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Rahul Gandhi: राहुल के चुनावी अभियान में OBC हाईलाइट क्यों, समझिए राजस्थान का जातिय गणित

राजस्थान के रण में अंतिम चरण में प्रचार के लिए आए कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के चुनाव प्रचार अभियान में ओबीसी पर हाईलाइट है। सियासी जानकार अलग-अलग मायने निकाल रहे हैं।

Rahul Gandhi: राहुल के चुनावी अभियान में OBC हाईलाइट क्यों, समझिए राजस्थान का जातिय गणित
Prem Meenaलाइव हिंदुस्तान,जयपुरMon, 20 Nov 2023 08:15 AM
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राजस्थान के रण में अंतिम चरण में प्रचार के लिए आए कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के चुनाव प्रचार अभियान में ओबीसी पर हाईलाइट है। सियासी जानकार इसके अलग-अलग मायने निकाल रहे हैं। राजस्थान की असरदार और दमदार जाति जाट ओबीसी में आते है। दोनों ही दलों ने सबसे ज्यादा टिकट यदि ओबीसी में किसी जाति को दिए है वह जाट है। जाट राजस्थान की 80-90 सीटों पर प्रभावी है। विधानसभा चुनाव 2018 में 35 विधायक जाट समुदाय के ही बने थे। राहुल गांधी ने जाटलैंड शेखावाटी में अपना भाषण ओबीसी पर ही रखा। 

ओबीसी को सत्ता की कुंजी माना जाता है 

सियासी जानकारों का कहना है कि ओबीसी को राजस्थान में चुनाव में जीत तक पहुंचने की कुंजी के तौर पर देखा जाता है, यही वजह है राज्य की बड़ी आबादी जाट समुदाय पर राहुल गांधी की नजर है। देश के हर राज्य की तरह राजस्थान में भी सत्ता की चाबी जातियों के पास है। ओबीसी की दो प्रमुख जातियों जाट औऱ राजपूत पर राहुल गांधी का फोकस है। राजपूतों का झुकाव बीजेपी की तरफ माना जाता रहा है। जबकि जाट परंपरागत तौर पर कांग्रेस का वोट बैंक माना जात है। हालांकि, लोकसभा चुनाव में यह वोट बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो गया था। राहुल गांधी चाहते है कि जाट कांग्रेस की तरफ आए। हालांकि, राहुल गांधी अपनी सभाओं में किसी जाति विशेष का नाम नहीं ले रहे हैं। सिर्फ ओबीसी पर बात कर रहे हैं।

ओबीसी अफसरों का उठा रहे हैं मुद्दा 

राजस्थान की लगभग हर सभा में राहुल गांधी ओबीसी अफसरों का मुद्दा उठा रहे हैं। राहुल गांधी का कहना है कि सबको गलतफहमी है कि देश को संसद और विधायक चला रहे हैं।ऐसा नहीं है, देश को 90 अफसर चला रहे हैं।यह गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के सेक्रेटरी हैं. इनमें आदिवासी, पिछड़े और दलितों की संख्या महज 7 हैं। ऐसे में साफ है कि जातिगत जनगणना के आधार पर ही इन वर्गों को लाभ दिलाया जा सकता है। भारत के बच्चे एमपी, एमएलए नहीं, आईएएस बनना चाहते हैं, क्योंकि देश को सरकार के अफसर चलाते हैं। दलित, पिछड़ों और आदिवासियों की भागीदारी इसमें नहीं है। भारत सरकार का जारी होने वाला बजट भी यह चुनिंदा अधिकारी तय करते हैं। इसमें ओबीसी की भागीदारी न के बराबर है। इसके लिए हमने राजस्थान में जातिगत जनगणना के आदेश दिए हैं। 

निर्णायक भूमिका में ओबीसी 

उल्लेखनीय है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में जाटों ने भाजपा का समर्थन किया था तो वहीं 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा नाराजगी का खामियाजा उठाना पड़ा था। कांग्रेस की बंपर जीत हुई थी। अब एक बार फिर बड़ा सवाल यही है कि आखिर जाट किसका साथ देंगे? सियासी जानकारों का कहना है कि राहुल गांधी ओबीसी के बहाने जाटों का साधना चाहते हैं। कांग्रेस ने सबसे ज्यादा टिकट एससी-एसटी के बाद जाटों को ही दिए है। राजस्थान में जोधपुर, नागौर, पाली, बाड़मेर, जैसलमेर, सिरोही से लेकर शेखावाटी में चूरू, सीक,र झुंझुनू और बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, भरतपुर, धौलपुर तक में जाटों का खास प्रभाव है और यहां जीत या हार जाट कौम ही तय करती है। सियासी जानकारों का कहना है कि बीजेपी भी जाटों को साधने में पीछे नहीं है। भरतपुर में पीएम मोदी का भाषण जाटों पर ही रहा। 

राजस्थान में इन सीटों पर जाटों का दबदबा

चूरू की सादुलपुर, तारानगर, चूरू, सरदारशहर, रतनगढ़ और सुजानगढ़, सीकर के फतेहपुर लक्ष्मणगढ़, धोद, दातांरामगढ़, खंडेला, नीम का थाना और श्रीमाधोपुरझुंझुनू के पिलानी, उदयपुरवाटी, नवलगढ़, मंडावा, झुंझुनू, खेतड़ी और सूरजगढ़ में प्रभाव देखने को मिलेगा। जोधपुर की लोहावट, शेरगढ़, ओसियां, भोपालगढ़, सरदारपुरा, जोधपुर, सूरसागर, लूणी, बिलाड़ा,पाली की जैतारण, सोजत, बाली, पाली, मारवाड़ जंक्शन, सुमेरपुर,जालौर की आहोर, जालोर, भीनमल, रानीवाड़ा, सांचौर,नागौर की लाडनूं, डीडवाना, जायल, नागौर, खींवसर, मेड़ता, डेगाना, मकराना, परबतसर, बाड़मेर की शिव, बाड़मेर, बायतु, पचपदरा, सिवान, गुड़ामालानी, चौहटन,जैसलमेर की पोखरण, जैसलमेर,बीकानेर की खाजूवाला, बीकानेर पश्चिम, बीकानेर पूर्व, कोलायत लूणकरणसर, डूंगरगढ़, नोखा,श्रीगंगानगर की सादुलशहर, गंगानगर, करणपुर, सूरतगढ़, रायसिंहनगर, अनूपगढ़,हनुमानगढ़ की संगरिया, हनुमानगढ़, पीलीबंगा, लोहार और भदरा। इन सीटों पर जाटों का दबदबा माना जाता है। 

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