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अजमेर की इस्लामिक इमारत को लेकर नया दावा, जैन साधु बोले- यहां पहले एक मन्दिर था

भारतीय पुरातत्व विभाग की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार 'अढाई दिन का झोपड़ा'स्मारक एक मस्जिद है, जिसका निर्माण दिल्ली के पहले सुल्तान कुतुबुद्दीन एबक ने सन् 1199 में करवाया था।

अजमेर की इस्लामिक इमारत को लेकर नया दावा, जैन साधु बोले- यहां पहले एक मन्दिर था
Sourabh JainPTI,अजमेरTue, 07 May 2024 07:08 PM
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मध्यकाल में बनी देश की कई मस्जिदों में मंदिर होने के दावों के बीच राजस्थान के अजमेर में स्थित 'अढाई दिन का झोपड़ा' को लेकर भी ऐसा ही एक दावा सामने आया है। मंगलवार को विश्व हिंदू परिषद के नेताओं के साथ कुछ जैन साधु इस ASI (भारतीय पुरातत्व विभाग) द्वारा संरक्षित मस्जिद में पहुंचे और उन्होंने दावा करते हुए कहा कि यह इमारत पहले एक संस्कृत स्कूल था और स्कूल से पहले वहां एक जैन मन्दिर मौजूद था। 

जैन संत सुनील सागर महाराज के नेतृत्व में फव्वारा चौक से दरगाह बाजार होते हुए इस स्मारक तक पहुंचे थे। इस बारे में जानकारी देते हुए अजमेर नगर निगम के उप-महापौर नीरज जैन ने कहा कि जैन संत का मानना है कि वहां संस्कृत विद्यालय से पहले वहां एक जैन मंदिर था। 

उप-महापौर ने कहा कि 'कुछ वक्त पहले हमने यह मांग की थी कि स्मारक का पुनर्विकास किया जाना चाहिए और इसके पुराने गौरव को बहाल किया जाना चाहिए। स्मारक में एक स्टोर रूम भी है, जिसमें यहां (अढाई दिन का झोपड़ा) से प्राप्त मूर्तियां रखी हुई हैं।'

भारतीय पुरातत्व विभाग की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार यह स्मारक एक मस्जिद है, जिसका निर्माण दिल्ली सल्तनत के पहले सुल्तान कुतुबुद्दीन एबक ने सन् 1199 में करवाया था। और यह दिल्ली के कुतुबमीनार परिसर में बनी एक मस्जिद के समकालीन है, जिसे क़ुव्वल-उल-इस्लाम (इस्लाम की ताकत) मस्जिद के नाम से जाना जाता है। 

वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, 'अढाई दिन का झोपड़ा' परिसर के बरामदे में बड़ी संख्या में मंदिरों की टूटी हुई मूर्तियां पड़ी हुई हैं, जो 11वीं-12वीं शताब्दी के दौरान इसके आसपास एक हिंदू मंदिर के अस्तित्व को दर्शाती हैं। कहा जाता है कि मस्जिद का निर्माण मंदिरों के टूटे हुए हिस्सों से किया गया था।

वेबसाइट के मुताबिक मंदिरों के खंडित अवशेषों से बनी मस्जिद को 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' के नाम से जाना जाता है। इस जगह का यह नाम होने के पीछे भी अलग-अलग कहानियां हैं। कई लोगों का कहना है कि यहां ढाई दिनों तक मेला लगता था, इसलिए इसका नाम यह रखा गया। साथ ही एक कहानी यह भी है कि यहां स्थित मन्दिर को कुतुबुद्दीन ऐबक ने ढाई दिन में तुड़वा दिया था, इसलिए इसका नाम यह पड़ गया।