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भजनलाल सरकार 'आ बैल मुझे मार' नीति पर? गुर्जर आंदोलन का मुद्दा फिर गर्माया

राजस्थान में भजनलाल सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले गुर्जर आंदोलन के मुकदमे फिर खोल दिए है। आरोप है कि गुर्जर नेताओं की गिरफ्तारी का दबाव बनाया जा रहा है। समाज को कुचलने की मंशा नहीं रखे सरकार।

भजनलाल सरकार 'आ बैल मुझे मार' नीति पर? गुर्जर आंदोलन का मुद्दा फिर गर्माया
Prem Meenaलाइव हिंदुस्तान,जयपुरTue, 06 Feb 2024 08:08 AM
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राजस्थान में भजनलाल सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले गुर्जर आंदोलन के मुकदमे फिर खोल दिए है। आरोप है कि गुर्जर नेताओं की गिरफ्तारी का दबाव बनाया जा रहा है।  गुर्जर नेता हिम्मत सिंह ने कहा- राजस्थान में सरकार बदलते ही भाजपा सरकार ने अपना रंग दिखाना शुरू कर कर दिया है। सरकार गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमों को फिर खोलने का काम कर रही है। गुर्जर आंदोलन के नेताओं पर गिरफ्तारी का दबाव बनाया जा रहा है। समाज को कुचलने की मंशा नहीं रखे सरकार, घर-घर में कर्नल बैंसला तैयार होंगे। हिम्मत सिंह का आरोप है- राजस्थान गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति कोटा संभाग के अध्यक्ष सुरेश गुर्जर पर एक लंबित मामले में कोटा पुलिस ने दुर्भावनापूर्वक गिरफ्तारी वारंट जारी कराया है। अब पुलिस उनकी गिरफ्तारी का प्रयास रही है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि पर्ची वाली सरकार गुर्जर समाज से पंगा लेगी तो भारी पड़ेगा। यदि प्रदेश सरकार ने समझौते की पालना नहीं की तो राजस्थान का गुर्जर समाज चुप नहीं बैठेगा। समझौते के अनुसार जिन मुकदमों का पुलिस ने कोर्ट में चालान पेश कर दिया, उन मुकदमों को सरकार ने वापस लिया। जिनमें पुलिस ने चालान पेश नहीं किया उन सभी मुकदमों में 3 साल से ज्यादा पेंडिंग रहने पर एफआर लगा दी।
 

लोकसभा सीटों पर पड़ सकता है असर

बता दें राजस्थान में लोकसभा चुनाव की एक दर्जन ऐसी सीटें हैं जहां गुर्जर वोटर निर्णायक भूमिका में रहते आए है। ऐसे में सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले गुर्जर आंदोलन से जुड़े केस खोलकर कांग्रेस को बैठे बिठाए मुद्दा दे दिया है। बता दें वसुंधरा राजे सरकार के समय ही गुर्जरों पर गोलियां चलाई गई थी। जिसमें करी 72 गुर्जर मारे गए थे। यह मामला पूरी तरह से शांत हो गया था। गहलोत सरकार ने गुर्जरों पर लगे केस वापस ले लिए थे। लेकिन अब फिर आंदोलन से जुड़े केसों में गुर्जर समाज के युवाओं को गिरफ्तार किया जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस भजनलाल सरकार को घेर सकती है। बता दें राजस्थान में टोंक-सवाईमाधोपुर, दौसा, भरतपुर, करौली, धौलपुर,  अजमेर और कोटा में गुर्जर समाज चुनाव में हार-जीत की भूमिका निभाता रहा है। सियासी जानकारों का कहना है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर बीजेपी पर हमलावर हो सकती है। 

राजस्थान में गुर्जर आंदोलन की शुरुआत वर्ष 2006 से हुई थी

उल्लेखनीय है कि राजस्थान में गुर्जर आंदोलन की शुरुआत वर्ष 2006 से हुई। तब से लेकर अब तक कई बार बड़े आंदोलन हो चुके हैं। इस दौरान भाजपा व कांग्रेस की सरकारें रहीं, मगर किसी सरकार से गुर्जर आरक्षण आंदोलन की समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकला। वर्ष 2006 में एसटी में शामिल करने की मांग को लेकर पहली बार गुर्जर राजस्थान के हिंडौन में सड़कों व रेल पटरियों पर उतरे थे। गुर्जर आंदोलन 2006 के बाद तत्कालीन भाजपा सरकार महज एक कमेटी बना सकी, जिसका भी कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला।राजस्थान में गुर्जरों ने दूसरी बार 21 मई, 2007 को आंदोलन किया था। गुर्जर आंदोलन 2007 के लिए पीपलखेड़ा पाटोली को चुना गया था। यहां से होकर गुजरने वाले राजमार्ग को जाम कर दिया। इस आंदोलन के दौरान 28 लोगों की मौत हुई थी।  हालांकि, बाद में अलग कैटेगरी बनाकर एमबीसी के तहत गुर्जरों को आरक्षण दे दिया था। 
 

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