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Hindi News राजस्थानवसुंधरा राजे ने पासा फेंका और जसवंत सिंह की पलट गई बाजी, चुनाव हार गए वाजपेयी के 'हनुमान'

वसुंधरा राजे ने पासा फेंका और जसवंत सिंह की पलट गई बाजी, चुनाव हार गए वाजपेयी के 'हनुमान'

राजस्थान की राजनीति में पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह जसोल और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच के रिश्ते काफी तल्ख रहे है। दोनों परिवारों के बीच जारी तनातनी आज भी कायम है।

वसुंधरा राजे ने पासा फेंका और जसवंत सिंह की पलट गई बाजी, चुनाव हार गए वाजपेयी के 'हनुमान'
Prem Meenaलाइव हिंदुस्तान,जयपुरSat, 11 Feb 2023 12:35 PM
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राजस्थान की राजनीति में पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह जसोल और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच के रिश्ते काफी तल्ख रहे है। दोनों परिवारों के बीच जारी तनातनी के बीच वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से काफी पहले जसवंत ने घोषणा कर दी कि यह उनका अंतिम चुनाव होगा। ऐसे में वे अपने खुद के संसदीय क्षेत्र बाड़मेर-जैसलमेर से चुनाल लड़ेंगे। चुनाव से ऐन पहले वसुंधरा ने पासा फेंका और जसवंत की बाजी पलट चुकी थी। कांग्रेस के सांसद कर्नल सोनाराम चौधरी को वसुंधरा भाजपा में ले आई और आलाकमान से जिद कर उन्हें टिकट दिला दिया। जसवंत खाली हाथ रह गए। उन्होंने इस पीठ में छूरा भोंकने के समान बताया। इसके साथ ही उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। देश के सबसे चर्चित चुनाव में से एक इस संसदीय क्षेत्र से जसवंत को हार का सामना करना पड़ा। इसके कुछ माह पश्चात न केवल जसवंत बल्कि दोनों परिवार के रिश्ते भी कौमा में चले गए।

बेटा नहीं भूला पिता के साथ विश्वासघात

सियासी जानकारों का कहना है कि रिश्तों में तल्खी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भाजपा से विधायक होने के बावजूद वसुंधरा राजे ने जसवंत के बेटे मानवेन्द्र को कभी तव्वजो नहीं दी। न ही उन्हें मंत्री पद दिया। पार्टी में हाशिये पर चल रहे मानवेन्द्र ने गत विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का हाथ थाम लिया। इसके बाद वे वसुंधरा राजे के गढ़ माने जाने वाले झालरापाटन ने उनके खिलाफ चुनाव मैदान में जा डटे। हालांकि वे चुनाव हार गए। लेकिन दोनों परिवारों के रिश्तों को लगा ग्रहण छंटने का नाम ही नहीं ले रहा है।कभी वसुंधरा राजे की मां से मिले वरदहस्त के दम पर जसवंत सिंह ने पार्टी में तेजी से तरक्की की सीढ़ियां चढ़ी। जसवंत सिंह ने वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री बनवाने में अहम भूमिका निभाई। वहीं अपने गृह नगर बाड़मेर से अपना अंतिम चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके जसवंत का टिकट वसुंधरा ने कटवा कर जसवंत की राजनीति का पटाक्षेप ही कर दिया। दोनों परिवारों के बीच जारी यह राजनीतिक अदावत इतनी बढ़ गई कि जसवंत के बेटे मानवेन्द्र गत विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे के गढ़ झालावाड़ में उनके खिलाफ जा खड़े हुए। मानवेंद्र सिंह समय-समय पर वसुंधरा राजे को चुनौती देते रहे हैं। हालांकि, पिछले साल भाजपा की एक मीटिंग ने वसुंधरा राजे ने जसवंत सिंह को याद कर सियासत के सयानों को चौंका दिया था। 

वसुंधरा की मां ने जसवंत सिंह को आगे बढ़ाया 

सियासी जानकारों का कहना है कि जोधपुर के पूर्व महाराजा गजसिंह के सलाहकार की भूमिका निभा रहे जसवंत सिंह जसोल को राजमाता कृष्णाकुमारी के कहने पर भैरोसिंह शेखावत राजनीति में लेकर आए। पार्टी की आंतरिक राजनीति में जसवंत सिंह को राजमाता विजयाराजे सिंधिया का वरदहस्त मिला। विजयाराजे से उन्हें पार्टी में भरपूर सहयोग दिया। जसवंत सिंह उनके सहयोग से पार्टी की पहली पंक्ति के नेताओं में शुमार हो गए। अपने कुशल व्यवहार के दम पर जसवंत सिंह ने शीघ्र ही अटल बिहारी वाजपेयी का विश्वास हासिल कर लिया। इसके बाद का इतिहास है कि वे कैसे केन्द्र में महत्वपूर्ण पदों पर रहे।

जसवंत ने चुकाया अहसान

वर्ष 2003 में राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता भैरोसिंह शेखावत उपराष्ट्रपति बन चुके थे। ऐसे में पार्टी नए नेता की तलाश में थी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रदेश में पार्टी के कई वरिष्ठ नेता कतार में थे, लेकिन जसवंत ने राजमाता के अहसानों को याद रखा और तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी को इस बात के लिए तैयार किया कि वसुंधरा राजे जैसी तेजतर्रार युवा नेता पर दांव खेला जाए। जबकि शेखावत इसके लिए राजी नहीं थे। आखिरकार जसवंत ने सभी को साध लिया और वसुंधरा राजे के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया और पार्टी जोरदार जीत हासिल की। वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री बनते ही दोनों परिवारों के बीच रिश्तों में कड़वाहट आना शुरू हो गई। वसुंधरा ने जसवंत सिंह को तव्वजों प्रदान करना बंद कर दिया।