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मवेशियों पर कहर, जो जहां गिरा, वहीं मर गया, भारत-पाक सीमा से सटे गांवों में बदतर हालात

भीषण गर्मी और लू से भारत-पाक सीमा से सटे गांवों में हालात बेहद खराब हो गए हैं। भीषण गर्मी की मार के साथ पानी-चारे की कमी के कारण गायों समेत सैकड़ों मवेशी मारे जा चुके हैं। पढ़ें यह ग्राउंड रिपोर्ट...

मवेशियों पर कहर, जो जहां गिरा, वहीं मर गया, भारत-पाक सीमा से सटे गांवों में बदतर हालात
Krishna Singhमुकेश मथरानी,बाड़मेरTue, 25 Jun 2024 06:25 PM
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भीषण गर्मी के कारण भारत-पाक सीमा से सटे गांवों में हालात बेहद खराब हो गए हैं। खासकर मवेशियों की हालत बेहद दयनीय है। भीषण गर्मी की मार के साथ पानी-चारे की कमी के कारण गायों समेत सैकड़ों मवेशी मर चुके हैं। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पानी-चारे के लिए दर-दर भटक रहे मवेशियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। भयावह सूखे के कारण 70 फीसदी से ज्यादा फसलें बर्बाद हो चुकी हैं। हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि मवेशियों की मौत की वजह कोई बीमारी भी हो सकती है।

एक ओर अधिकारी प्रभावित क्षेत्रों में राहत पहुंचाने के लिए पशु कैंप खोलने का दावा कर रहे हैं। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि जमीनी स्तर पर सरकार की ओर से कोई राहत कार्य नहीं चलाया जा रहा है। लोगों का कहना है कि मवेशियों को बचाने के लिए कोई सरकारी पशु कैंप या चारा डिपो नहीं है। नतीजतन गांवों में चारे और पानी की किल्लत के कारण मवेशी मर रहे हैं। सीमावर्ती गांवों मुनाबाव, साजनानी, बाड़मेर का पार, रोहिड़ी, सुंदरा, चिडानिया, गदरा, पूनिया, समद का पार, बिजावल, लोहड़े का पार और धागरी में 200 से अधिक मवेशियों की मौत हो चुकी है।

बताया जाता है कि सबसे अधिक 40 मवेशियों की मौत रोहिड़ी गांव में हुई है। भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित तामलोर गांव के सरपंच हिंदू सिंह तामलोर ने बड़ी संख्या में मवेशियों के मारे जाने की पुष्टि की। बाड़मेर जिला सरपंच संघ के अध्यक्ष तामलोर ने कहा कि क्षेत्र में पानी और चारे का संकट है। इससे मवेशी मर रहे हैं। सरकार की ओर से कोई राहत शिविर चालू नहीं है। अधिकारियों ने महज दो दिन पहले शिविर को मंजूरी दी है लेकिन इसे चालू होने में समय लगेगा। 

तामलोर ने कहा कि यदि चुनाव आचार संहिता खत्म होते ही शिविरों को मंजूरी दी गई होती तो इस भयावह स्थिति को टाला जा सकता था। राजस्थान सरकार को इस पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। सरकार बिना देरी के राहत कार्य चलाए। वहीं पशुपालक हरिसिंह सोढ़ा कहते हैं कि गायों और मवेशियों पर भीषण गर्मी और लू कहर बरपा रही है। तालाब और जलस्रोत सूख गए हैं। अब तक बारिश नहीं हुई है। अपनी आंखों के सामने तिल-तिल कर मवेशियों को मरता देख आंखों में आंसू आ जाते हैं, लेकिन हम लाचार हैं। 

रोहिड़ी गांव के किसानों का कहना है कि भीषण गर्मी के बीच पानी और चारे की कमी के चलते रोजाना औसतन पांच मवेशी मर रहे हैं। बता दें कि भारत-पाक सीमा से सटे सुंदरा और चिडानिया के आसपास के गांवों और बस्तियों में लोगों की आमदनी का मुख्य जरिया पशुपालन है। बालू के टीलों के बीच बस्तियां दूर-दूर तक फैली हैं। इन गांवों में सरकारी जलस्रोत नहीं हैं। ऐसे में लोग पशुओं को बचाने के लिए कुओं की मदद ले रहे हैं। हालात इस कदर भयावह हैं कि सूखे से चारे की किल्लत हो गई है। 

सीमा पर बसा आखिरी गांव रोहिड़ी है। रोहिड़ी गांव में एक हजार से ज्यादा पशु हैं। सबसे ज्यादा मवेशियों की मौत भी इसी गांव में हुई है। गांव में सरकारी नलकूप है, लेकिन चारा नहीं होने से भूख से 40 से ज्यादा मवेशी मारे गए हैं। लोगों का कहना है कि ऐसा हर साल होता है। सरकार का कोई नुमाइंदा हमारी बात नहीं सुनता। मवेशियों को अपनी आंखों के सामने तड़पता देख आंसू आ जाते हैं लेकिन हमारी मदद करने वाला कोई नहीं है। भीषण गर्मी भले ही बीत गई है लेकिन चारे के अभाव में मवेशी अभी भी मर रहे हैं।

बाड़मेर के अतिरिक्त जिला कलेक्टर राजेंद्र सिंह ने कहा कि पंचायतों से आई मांग के आधार पर अब तक 65 पशु शिविरों को मंजूरी दी है। इनमें से 15 चालू हैं। बाकी भी जल्द चालू हो जाएंगे। राजेंद्र सिंह ने भी बड़ी संख्या में मवेशियों के मारे जाने की पुष्टि की। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मवेशियों की मौत चारे और पानी की कमी के कारण नहीं हुई है। मौतों की वजह बीमारियां भी हैं। हम स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। जरूरत के मुताबिक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएंगी। 

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