
18 साल बाद मिली राहत, राजस्थान हाईकोर्ट ने CRPF कांस्टेबल की बर्खास्तगी रद्द की, बहाली का आदेश
आदेश को रद्द करते हुए उसे दोबारा नौकरी में बहाल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने आदेश को रद्द करते हुए कहा कि मेडिकल परिस्थितियों से जुड़ी अनुपस्थिति को आधार बनाकर इतनी कठोर सजा देना न केवल असंगत था, बल्कि इसमें निष्पक्षता और मानवीय दृष्टिकोण की भी अनदेखी की गई।
राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक कांस्टेबल को 2002 में सेवा से हटाए जाने के आदेश को रद्द करते हुए उसे दोबारा नौकरी में बहाल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने आदेश को रद्द करते हुए कहा कि मेडिकल परिस्थितियों से जुड़ी अनुपस्थिति को आधार बनाकर इतनी कठोर सजा देना न केवल असंगत था, बल्कि इसमें निष्पक्षता और मानवीय दृष्टिकोण की भी अनदेखी की गई।
'चौंकाने वाली सजा'
इस मामले पर जस्टिस आनंद शर्मा ने हंस राज दोई की याचिका पर सुनवाई करते हुए 3 फरवरी को दिए फैसले में कहा कि एक ऐसे जवान, जिसका रिकॉर्ड बहादुरी, समर्पण और सराहना से भरा रहा हो, उसे कथित अनुशासनहीनता के आरोप में सेवा से हटाना चौंकाने वाली सजा है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अनुशासन लागू करने के नाम पर निष्पक्षता, तर्कसंगतता और मानवता की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने गिनाई खामियां
कोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में कई गंभीर खामियां थीं। बिना पर्याप्त सबूत के उनकी अनुपस्थिति को डेजर्शन यानी भगोड़ा घोषित करना अधिकारियों के गलत दृष्टिकोण को दर्शाता है। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में यह साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि उनकी अनुपस्थिति जानबूझकर और बिना वजह थी। जांच के दौरान उन्हें विभाग द्वारा इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों की प्रतियां भी नहीं दी गईं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत ऑडी अल्टरम पार्टम (दूसरे पक्ष को सुनने का अधिकार) का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपपत्र ही कानूनी रूप से कमजोर आधार पर तैयार किया गया था और जांच अधिकारी के निष्कर्ष अनुमान पर आधारित थे, न कि ठोस साक्ष्यों पर।
कोर्ट ने दोई के सेवा रिकॉर्ड पर भी ध्यान दिया, जिसमें उन्हें कई बार सराहना पत्र और नकद पुरस्कार भी मिले थे। वे 1995 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे और गुजरात दंगों के बाद तैनाती तथा भुज भूकंप के दौरान राहत कार्यों में भी शामिल रहे थे। कोर्ट ने माना कि कथित झगड़े की घटना उनके अनुपस्थित रहने के दौरान हुई थी और इसकी सूचना भी उन्होंने स्वयं वरिष्ठ अधिकारियों को दी थी। हाईकोर्ट ने 2002 से 2003 के बीच पारित सेवा समाप्ति से जुड़े सभी पांच आदेशों को रद्द करते हुए सीआरपीएफ को 60 दिनों के भीतर उन्हें सेवा में बहाल करने, सेवा निरंतरता और वरिष्ठता देने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि बीच की अवधि का वेतन नहीं मिलेगा और आर्थिक लाभ केवल सांकेतिक आधार पर दिए जाएंगे।

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