राजस्थान में पत्नी पर भूत-प्रेत का साया समझ बैठा पति; पत्नी-बच्चों की हत्या कर दी
पुलिस जांच और परिजनों से पूछताछ में सामने आया कि पुष्पा पिछले दो-तीन साल से मानसिक बीमारी से जूझ रही थी। उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती थी और वह कई बार असामान्य व्यवहार करने लगती थी। परिवार ने इलाज कराने के बजाय उसे भूत-प्रेत का साया मान लिया।

राजस्थान के फलोदी जिले के फतेहगढ़ गांव में एक कृषि फार्म पर एक ही परिवार के चार लोगों की मौत का मामला अब धीरे-धीरे खुल रहा है। पुलिस की शुरुआती जांच में जो तस्वीर सामने आई है, वह सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि अंधविश्वास, मानसिक बीमारी और लगातार बढ़ते मानसिक तनाव की दर्दनाक कहानी भी है। एक ऐसा परिवार, जो कुछ दिन पहले तक सामान्य जिंदगी जी रहा था, अब पूरी तरह खत्म हो चुका है।
मृतक गेनाराम (35) मूल रूप से पाली जिले के रोहट क्षेत्र के बिठू गांव का रहने वाला था। वह पिछले करीब चार साल से फतेहगढ़ क्षेत्र के एक कृषि फार्म पर मजदूरी और खेती का काम करता था। उसके साथ पत्नी पुष्पा (32), 13 वर्षीय बेटी खुशबू और 10 वर्षीय बेटा किशन भी वहीं रहते थे। 30 जून की सुबह जब खेत पर बने मकान का दरवाजा नहीं खुला तो लोगों को अनहोनी का अंदेशा हुआ। अंदर का दृश्य देखकर हर कोई सन्न रह गया। मां और दोनों बच्चों के शव चारपाइयों पर पड़े थे, जबकि गेनाराम का शव बरामदे में फंदे से लटका मिला।
मानसिक बीमारी को समझने के बजाय अंधविश्वास का सहारा
पुलिस जांच और परिजनों से पूछताछ में सामने आया कि पुष्पा पिछले दो-तीन साल से मानसिक बीमारी से जूझ रही थी। उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती थी और वह कई बार असामान्य व्यवहार करने लगती थी। परिवार ने इलाज कराने के बजाय उसे भूत-प्रेत का साया मान लिया। उसे अलग-अलग भोपाओं और तांत्रिकों के पास ले जाया गया। देचू इलाके में भी झाड़-फूंक करवाई गई, जहां दावा किया गया कि पूर्णिमा के दिन पूजा-पाठ के बाद उसके ऊपर से कथित साया हट जाएगा। लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।
29 जून को गेनाराम पत्नी को लेकर अपने गांव बिठू पहुंचा, जहां थान पर पूजा-अर्चना करवाई गई। रात को वह पत्नी के साथ वापस फतेहगढ़ लौट आया। रास्ते में ही पुष्पा फिर असामान्य हरकतें करने लगी। गेनाराम के साथ आए रिश्तेदार उसे घर छोड़कर वापस चले गए। इसके बाद उस घर में क्या हुआ, इसकी कहानी अब पुलिस घटनास्थल और साक्ष्यों के आधार पर जोड़ रही है।
पत्नी की हालत देख बेकाबू हुआ गेनाराम
पुलिस का मानना है कि उसी रात गेनाराम मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका था। लगातार पूजा-पाठ और झाड़-फूंक के बाद भी पत्नी की हालत में सुधार नहीं होने से वह बेहद परेशान था। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि पत्नी के माथे पर चोट के निशान मिले हैं। आशंका है कि असामान्य व्यवहार के दौरान उसने खुद ही दीवार पर सिर मारा होगा। गेनाराम ने उसे संभालने और चारपाई पर सुलाने की कोशिश की, लेकिन जब वह काबू में नहीं आई तो उसने गुस्से और आवेश में उसका गला दबाकर हत्या कर दी।
पकड़े जाने के डर से मासूम बच्चों को भी मार डाला
जांच में यह भी सामने आया कि पत्नी की चारपाई के पास ही बेटी खुशबू और बेटा किशन मृत मिले। दोनों के गले पर दबाव के निशान थे। पुलिस का मानना है कि पति-पत्नी के बीच हुए शोर से दोनों बच्चे जाग गए होंगे। पत्नी की हत्या के बाद गेनाराम को अपने अपराध का एहसास हुआ और उसे लगा कि अब वह कानून से नहीं बच पाएगा। इसी डर में उसने दोनों मासूम बच्चों का भी गला घोंट दिया ताकि कोई प्रत्यक्ष गवाह न बचे।
अपराधबोध में खुद भी खत्म कर ली जिंदगी
तीनों की हत्या के बाद गेनाराम बरामदे में गया और पंखे के हुक पर फंदा बनाकर आत्महत्या कर ली। घटनास्थल से पूजा-पाठ का सामान और उसकी जेब से मौली का धागा भी मिला है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि घटना से पहले धार्मिक अनुष्ठान किए गए थे। पुलिस का मानना है कि तीन हत्याओं के बाद अपराधबोध और डर ने उसे इतना घेर लिया कि उसने भी अपनी जान दे दी।
परिजनों ने जताई दूसरी आशंका
हालांकि गेनाराम के परिजन पुलिस की इस शुरुआती थ्योरी से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि अकेला व्यक्ति तीन लोगों की गला दबाकर हत्या आसानी से नहीं कर सकता। परिजनों का अंदेशा है कि गेनाराम ने पहले पत्नी और बच्चों को खाने में कोई नशीला या जहरीला पदार्थ दिया होगा, फिर उनकी हत्या की होगी। पुलिस ने इस पहलू को भी जांच में शामिल किया है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा फॉरेंसिक जांच का इंतजार किया जा रहा है।
तनाव, अंधविश्वास और एक परिवार का अंत
देचू थाना प्रभारी विक्रमसिंह सांग के अनुसार प्रारंभिक जांच में किसी भी शव पर ऐसी बाहरी चोट नहीं मिली है जिससे सीधे मौत होना माना जाए। फिलहाल सबसे मजबूत संभावना गला दबाकर हत्या और उसके बाद आत्महत्या की ही है। उन्होंने बताया कि पत्नी की मानसिक स्थिति खराब होने के कारण गेनाराम लंबे समय से तनाव में था। मामले की हर पहलू से जांच जारी है।
यह घटना केवल एक परिवार की मौत की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी बताती है कि मानसिक बीमारी को समय रहते चिकित्सकीय उपचार के बजाय अंधविश्वास और झाड़-फूंक से जोड़ना कितना घातक साबित हो सकता है। एक बीमारी का इलाज तलाशते-तलाशते पूरा परिवार हमेशा के लिए खत्म हो गया।


