
जोधपुर में राम की जगह क्यों होती है रावण आराधना? रावण वंशजों की अनोखी परंपरा जानकर आप रह जाएंगे दंग
संक्षेप: जोधपुर में इस बार दशहरा सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि एक अनोखी परंपरा का साक्षी भी बनेगा। जहां पूरे शहर में रावण के दहन की धूम है, वहीं कुछ लोग इस दिन शोक मनाएंगे।
जोधपुर में इस बार दशहरा सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि एक अनोखी परंपरा का साक्षी भी बनेगा। जहां पूरे शहर में रावण के दहन की धूम है, वहीं कुछ लोग इस दिन शोक मनाएंगे। जी हाँ, जोधपुर में रहने वाले श्रीमाली समाज के गोधा गौत्र के लोग, जिन्हें रावण के वंशज माना जाता है, दशहरे के दिन जश्न के बजाय स्मृति और श्रद्धा के साथ अपने पूर्वजों को याद करेंगे।

यह परिवार हजारों साल पहले श्रीलंका से भारत आया था। उनके पूर्वजों ने रावण की शादी जोधपुर में मंदोदरी से करवाई थी। शादी के बाद रावण और मंदोदरी पुष्पक विमान से श्रीलंका लौट गए, लेकिन उनके वंशज वहीं रुके और जोधपुर में बस गए। इस परिवार ने आज भी अपनी परंपराओं को निभाना नहीं छोड़ा।
जोधपुर के किला रोड स्थित अमरनाथ महादेव मंदिर में पुजारी कमलेश दवे रावण के वंशजों की परंपराओं के संरक्षक हैं। उन्होंने बताया कि रावण की पूजा इस मंदिर में इसीलिए होती है क्योंकि रावण सिर्फ एक दानव नहीं बल्कि अद्भुत विद्वान और बलिष्ठ व्यक्तित्व थे। उन्होंने ज्योतिष और गणित के गूढ़ रहस्यों को समझा, वेदों से लेकर ग्रहों तक का ज्ञान रखा और संगीत में भी निपुण थे।
दशमी के दिन इस परिवार की परंपरा अलग है। रावण दहन के समय वे शोक मनाते हैं। पहले शिवलिंग की पूजा होती है, उसके बाद रावण के गुणों और उनके ज्ञान की पूजा की जाती है। तर्पण का आयोजन किया जाता है और ब्राह्मण भोजन कराना भी अनिवार्य है। इस दिन परिवार जनेऊ बदलता है और शाम को स्नान कर परंपरा का पालन करता है। दहन की प्रक्रिया को वे नहीं देखते, लेकिन अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा अडिग रहती है।
मंदोदरी का जन्मस्थान मंडोर को रावण का पहला ससुराल माना जाता है। ‘मंड’ का अर्थ उदर होता है और यहीं से उनका वंश जोधपुर में फैला। पंडित ओदिच्च्य बताते हैं कि रावण द्रविड़ ब्राह्मण संप्रदाय से थे और ज्योतिष के बड़े जानकार थे। त्रेता युग में उन्होंने सहस्त्र वर्षों तक तप कर कई सिद्धियां हासिल की थीं। यही कारण है कि उनके वंशज आज भी उनके गुणों की पूजा करते हैं।
मंदिर में दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। वंदना शर्मा बताती हैं कि वे कई सालों से परिवार सहित दर्शन के लिए आती हैं। कुलदीप शर्मा, जो ब्रह्मपुरी के निवासी हैं, कहते हैं कि नवरात्रि के बाद वे भगवान शिव के भक्त के रूप में रावण की पूजा करते हैं।
भारत में रावण के मंदिर चुनिंदा जगहों पर ही पाए जाते हैं, लेकिन राजस्थान में पहला रावण मंदिर जोधपुर में ही है। यह मंदिर न सिर्फ इतिहास और संस्कृति का प्रतीक है, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे रावण के गुणों और ज्ञान का सम्मान आज भी जीवित है।
तो इस विजयादशमी, जब पूरा देश रावण दहन में उल्लासित होगा, जोधपुर के रावण वंशज अपनी अनोखी परंपरा के साथ श्रद्धा, शोक और सम्मान के भाव से अपने पूर्वज की याद में डूबे रहेंगे। यह कहानी सिर्फ परंपरा की नहीं, बल्कि उन मूल्यों की भी है जो समय और समाज की धारा में बहते हुए भी कभी नहीं खोए।

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Sachin Sharmaलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




