जोधपुर की 'बेटी' ने तोड़ीं बाल विवाह की बेड़ियां; 12 साल में हुई थी शादी, अब कोर्ट ने दी आजादी!
राजस्थान के जोधपुर में बालिका वधू बनाई गई एक महिला ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर अब अपनी आजादी वापस पा ली है। उसने एक दशक पुराने शादी के उस बंधन को तोड़ दिया जो उस वक्त बंधा था जब वह महज 12 साल की थी।

राजस्थान के जोधपुर में बालिका वधू बनाई गई एक महिला ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर अब अपनी आजादी वापस पा ली है। उसने एक दशक पुराने शादी के उस बंधन को तोड़ दिया जो उस वक्त बंधा था जब वह महज 12 साल की थी।
फैमिली कोर्ट के जज वरुण तलवार ने गुरुवार को खुशबू (बदला हुआ नाम) की 2016 में हुई इस शादी को 'बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006' के तहत अमान्य घोषित करते हुए रद्द कर दिया। जज ने अपने फैसले में कहा कि बाल विवाह बच्चों के वर्तमान और भविष्य दोनों ही बर्बाद कर देता है। इसे खत्म करने के लिए पूरे समाज को मिलकर कदम उठाने की जरूरत है।
समाज के दबाव में हुई थी शादी
बिश्नोई समाज से आने वाली खुशबू ने कहा कि जब वह स्कूल जाती थी, तब उसे अपने आस-पास हो रही घटनाओं की ज्यादा समझ नहीं थी। उस वक्त समाज के बड़े-बुज़ुर्ग ही शादी का इंतजाम करने में मुख्य भूमिका निभाते थे। उसने बताया कि अधिकतर फैसले रीति-रिवाजों के आधार पर लिए जाते थे, जिनमें उसके माता-पिता की राय की गुंजाइश बहुत कम रह जाती थी। जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, उसे इस शादी के असल मायने समझ में आए; उसे अहसास हुआ कि वह एक ऐसे रिश्ते में बांध दिया गया है जिसे न तो उसने खुद चुना था और ना ही वह उसे पूरी तरह समझ पाई थी।
हिम्मत जुटाकर रिश्ते से बाहर निकलने की ठानी
इस रिश्ते में कुछ साल बाद तब एक अहम मोड़ आया, जब उसके ससुरालवालों का उस पर वैवाहिक जीवन शुरू करने का दबाव बढ़ने लगा। कई तरह की परेशानियां उठाने के बावजूद उसने इस रिश्ते से बाहर निकलने की ठान ली। अपने इरादे पर अडिग रहते हुए उसने पुलिस से संपर्क किया और फिर उसकी मुलाकात 'सारथी ट्रस्ट' की सोशल वर्कर कृति भारती से हुई। महिला ने बताया, “शुरू में तो वो हिचकिचाए, लेकिन मेरा पक्का इरादा देखकर और मेरी बड़ी बहन के समझाने पर, जिसकी खुद बचपन में ही शादी हो गई थी, वो मान गए।”
18 महीने पहले लगाई थी शादी रद्द करने की अर्जी
कृति भारती की मदद से खुशबू ने करीब 18 महीने पहले फैमिली कोर्ट में एक अर्जी दायर कर अपनी शादी रद्द करने की गुहार लगाई थी। मुकदमे की सुनवाई के दौरान महिला कोर्ट में वो सभी दस्तावेज पेश किए जिनसे शादी के समय उसकी उम्र साबित होती थी। इसके साथ ही उसने यह भी कहा कि यह शादी उनकी सहमति के बिना की गई थी। हालांकि, महिला के ससुराल वालों ने दावा किया कि शादी तब हुई थी जब लड़का-लड़की दोनों बालिग हो चुके थे, लेकिन वे यह केस हार गए।
वर पक्ष को शादी रद्द करने के लिए मनाना था मुश्किल
कृति भारती ने कहा कि वर पक्ष को शादी रद्द करने के लिए मनाना आसान नहीं था। उन्होंने कहा, "दुल्हन पर अपने अधिकार को इतनी आसानी से कौन छोड़ना चाहेगा? यह हमारे रीति-रिवाज और अहंकार, दोनों में ही गहराई से बसा हुआ है और ऐसे मामलों को अपने हाथ में लेने का मतलब है अपमान और दुर्व्यवहार।"
फैसले ने और महिलाओं के लिए भी राह खोली
उन्होंने बताया कि खुशबू का मामला कुछ ऐसी रीतियों की भूमिका पर प्रकाश डालता है, जो बाल विवाह को बढ़ावा देती हैं—एक ऐसी कुप्रथा जो कानूनी रोक के बावजूद आज भी बनी हुई है। ऐसा करके उसने अपने जैसी उन तमाम महिलाओं के लिए भी राह खोल दी, जिनका बचपन बाल विवाह जैसी कुप्रथा की भेंट चढ़ गया था।
क्या है मौसर प्रथा
कृति भारती ने बताया कि यह समारोह 'मौसर' (मृत्युभोज) नामक एक रीति-रिवाज से जुड़ा था, जो परिवार में किसी की मृत्यु के बाद किया जाता है। इस रीति-रिवाज का एक हिस्सा यह है कि एक सामूहिक आयोजन में कई बच्चों का विवाह करा दिया जाता है।
एक्टिविस्ट बताते हैं कि ऐसे मौकों पर अक्सर कानून के बजाय परंपरा को प्राथमिकता दी जाती है। परिवार इस डर से इसका विरोध नहीं करते कि कहीं उनका सामाजिक बहिष्कार न कर दिया जाए।
दोबारा शुरू की पढ़ाई
इस बीच, 7वीं क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ चुकी खुशबू ने अब दोबारा से अपनी पढ़ाई शुरू कर दी है और ओपन स्कूलिंग के जरिये अपनी माध्यमिक परीक्षाओं की तैयारी कर रही है। उसने कहा कि "यह मेरी बड़ी बहन की भी इच्छा है कि मैं अपनी पढ़ाई पूरी करूं और अपने पैरों पर खड़ी हो सकूं।"


