जांच करवानी है? पहले HOD ढूंढिए; SMS अस्पताल में एक साइन के लिए रोज़ मशक्कत करते मरीज

लाइव हिन्दुस्तान, जयपुर
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एसएमएस अस्पताल की ओपीडी में मरीजों का इलाज रेजिडेंट, असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर करते हैं। डॉक्टर मरीज की स्थिति देखकर एमआरआई, सीईसीटी, कैंसर मार्कर्स, एलर्जी पैनल और अन्य महंगी जांचें लिख देते हैं।

जांच करवानी है? पहले HOD ढूंढिए; SMS अस्पताल में एक साइन के लिए रोज़ मशक्कत करते मरीज

जयपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एसएमएस में इलाज के लिए पहुंचने वाले हजारों मरीजों की परेशानी बीमारी से ज्यादा एक साइन बन गया है। डॉक्टर जांच लिख देता है, मरीज बिल काउंटर तक पहुंच जाता है, लेकिन अगर जांच की कीमत दो हजार रुपए से ज्यादा है तो उसे पहले विभागाध्यक्ष (HOD) या यूनिट हेड की तलाश करनी पड़ती है। एक हस्ताक्षर के बिना न बिल बनता है और न ही जांच हो पाती है।

यही वजह है कि हर दिन कई मरीज अस्पताल और मेडिकल कॉलेज के अलग-अलग विभागों के चक्कर काटते नजर आते हैं। कोई HOD के कमरे के बाहर इंतजार करता है तो कोई यह पूछता फिरता है कि डॉक्टर कहां मिलेंगे। कई बार घंटों की मशक्कत के बाद भी हस्ताक्षर नहीं मिलते और मरीज मायूस होकर लौट जाता है।

अब इस परेशानी को खत्म करने की कवायद शुरू हो गई है। एसएमएस अस्पताल प्रशासन ने राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजकर मांग की है कि दो हजार रुपए से अधिक कीमत वाली जांचों को मंजूरी देने का अधिकार एसोसिएट प्रोफेसर और उनसे वरिष्ठ डॉक्टरों को भी दिया जाए। अस्पताल का मानना है कि इससे मरीजों का समय बचेगा और इलाज में देरी नहीं होगी।

जांच लिखी, लेकिन मंजूरी में फंस गया इलाज

एसएमएस अस्पताल की ओपीडी में मरीजों का इलाज रेजिडेंट, असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर करते हैं। डॉक्टर मरीज की स्थिति देखकर एमआरआई, सीईसीटी, कैंसर मार्कर्स, एलर्जी पैनल और अन्य महंगी जांचें लिख देते हैं। लेकिन जांच की कीमत दो हजार रुपए से अधिक होते ही मरीज की पर्ची आगे नहीं बढ़ती।

बिल काउंटर पर मरीज को बताया जाता है कि पहले यूनिट हेड या विभागाध्यक्ष के हस्ताक्षर करवाकर आइए। इसके बाद मरीज इलाज छोड़कर साइन की तलाश में निकल पड़ता है।

सबसे ज्यादा मार गरीब मरीजों पर

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा असर उन मरीजों पर पड़ता है जो गांवों और दूर-दराज के इलाकों से जयपुर आते हैं। अस्पताल की व्यवस्था से अनजान मरीज घंटों लाइन में लगने के बाद जब बिल नहीं बनवा पाते तो उनकी परेशानी और बढ़ जाती है।

कई बार विभागाध्यक्ष किसी मीटिंग, ऑपरेशन या अन्य प्रशासनिक कार्य में व्यस्त होते हैं। ऐसे में मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। कुछ मामलों में दो-दो दिन तक मंजूरी नहीं मिलती, जिससे मजबूर होकर मरीज निजी लैब में महंगी जांच करवाने के लिए विवश हो जाते हैं।

जब इलाज वही कर रहे हैं तो अधिकार क्यों नहीं?

अस्पताल प्रशासन का तर्क है कि मरीज का इलाज, ऑपरेशन और वार्ड की पूरी जिम्मेदारी रेजिडेंट, असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर ही संभालते हैं। ऐसे में यदि यही डॉक्टर इलाज की जिम्मेदारी उठा रहे हैं तो महंगी जांचों को मंजूरी देने का अधिकार भी इन्हें मिलना चाहिए।

इसी आधार पर अस्पताल अधीक्षक डॉ. मृणाल जोशी ने प्रमुख शासन सचिव गायत्री राठौड़ को पत्र लिखकर नियमों में बदलाव की मांग की है। प्रस्ताव में कहा गया है कि मौजूदा व्यवस्था से मरीजों को अनावश्यक परेशानी हो रही है और अस्पताल की कार्यप्रणाली भी प्रभावित हो रही है।

चार साल पुराने नियम में बदलाव की मांग

जून 2022 में राज्य सरकार ने आदेश जारी कर दो हजार रुपए तक की जांच लिखने का अधिकार इलाज करने वाले डॉक्टर को दिया था। दो से पांच हजार रुपए तक की जांच के लिए यूनिट हेड की मंजूरी और पांच हजार रुपए से अधिक की जांच के लिए विभागाध्यक्ष, अस्पताल अधीक्षक या समिति की अनुशंसा अनिवार्य कर दी गई थी।

अब अस्पताल प्रशासन का मानना है कि समय के साथ इस व्यवस्था में बदलाव जरूरी हो गया है। यदि सरकार प्रस्ताव को मंजूरी देती है तो एसएमएस अस्पताल में हर दिन एक साइन के लिए भटकने वाले हजारों मरीजों को बड़ी राहत मिल सकती है।

Sachin Sharma

लेखक के बारे में

Sachin Sharma

सचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)
सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।

सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।

शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।

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