
मां को खुद स्ट्रेचर पर खींचकर निकाला,SMS अस्पताल में हादसे के बाद बेटों की बेबसी
जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल की रात की गंध अभी भी कई लोगों के नथुनों में बस गई है — जलते प्लास्टिक, दवाई और धुएं की मिश्रित गंध। परिजनों के लिए यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि जिंदगी की सबसे दर्दनाक याद है।
जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल की रात की गंध अभी भी कई लोगों के नथुनों में बस गई है — जलते प्लास्टिक, दवाई और धुएं की मिश्रित गंध। परिजनों के लिए यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि जिंदगी की सबसे दर्दनाक याद है। अस्पताल की दीवारों के पीछे कई कहानियाँ हैं -एक बेटे की जो अपनी मां को आग से खींचकर बाहर लाया, एक बहन की जो अपने भाई की आवाज सुनने को तरस गई, और एक पिता की जो अपने जवान बेटे को आखिरी बार देख भी नहीं पाया।

भरतपुर के रहने वाले शेरू रात के गवाह हैं। “मैं अपनी मां के पास बैठा था। करीब 11 बजे देखा कि छत से हल्का धुआं निकल रहा है। मैंने नर्स को बताया, लेकिन बोली — ‘कुछ नहीं है, मशीन गर्म हो रही होगी।’ बीस मिनट बाद सब कुछ धुंधला हो गया। वार्ड बॉय भाग गए। हम वहीं फंस गए,” शेरू कहते हैं। उनका गला रुँध जाता है, “मैंने अपनी मां को स्ट्रेचर पर खींचकर बाहर निकाला। धुएं में कुछ दिख नहीं रहा था, सांस रुक रही थी। जब तक नीचे पहुंचे, मां बेहोश थी।”
अस्पताल के बाहर खड़ी कुषमा देवी की बेटी बेसुध हालत में फर्श पर बैठी थी। उसे यह भी नहीं बताया गया कि उसकी मां बची है या नहीं। “डॉक्टर अंदर नहीं जाने दे रहे, कोई जवाब नहीं दे रहा,” वह रोते हुए कहती है, “अगर पहले ध्यान देते, तो हमारी मां आज जिंदा होती।”
हादसे के बाद ट्रॉमा सेंटर के बाहर की तस्वीरें किसी युद्धक्षेत्र जैसी थीं। स्ट्रेचर पर लेटे मरीज, बेहोश अटेंडेंट, और अफरा-तफरी में रोते-बिलखते परिजन। कुछ मरीजों को बेड समेत सड़क पर रखा गया, कुछ को प्लास्टिक की शीट से ढक दिया गया। चारों ओर सायरन की आवाज और लोगों की चीखें थीं।
फायरमैन अवधेश पांडे बताते हैं, “हम जब पहुंचे तो पूरा वार्ड धुएं से भरा था। अंदर कुछ नहीं दिख रहा था। हमने खिड़की के कांच तोड़कर पानी डाला। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल स्टाफ ने शुरुआत में स्थिति को हल्के में लिया। “हमने धुआं देखा, स्टाफ को बताया, लेकिन वो बोले कि ये मामूली बात है। 20 मिनट बाद जब चिंगारियां दिखीं, तब सब भागने लगे,” एक और मरीज के बेटे ने कहा।
डॉक्टरों की टीम भी बेबस थी। ट्रॉमा सेंटर के नोडल ऑफिसर डॉ. अनुराग धाकड़ के मुताबिक, “हमारे पास अपने अग्निशमन उपकरण थे, हमने तुरंत इस्तेमाल भी किए। लेकिन जहरीली गैस इतनी तेजी से फैली कि कोई अंदर नहीं जा पा रहा था। आईसीयू की सीलिंग और कांच का स्ट्रक्चर धुआं रोक रहा था। जो अंदर गए, उन्हें खुद मास्क के बावजूद बाहर आना पड़ा।”
आठ परिवारों की दुनिया उजड़ गई। किसी ने अपनी मां खोई, किसी ने भाई, किसी ने बेटे को।
सीकर के पिंटू की पत्नी ने कहा, “सुबह तक बात हुई थी। उन्होंने कहा था कि अब तबियत ठीक लग रही है। कुछ घंटों बाद फोन आया — ‘मरीज नहीं रहे।’ कैसे नहीं रहे? कोई जवाब नहीं।”
हादसे के बाद राज्य सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन अस्पताल के गलियारों में अब भी वही सन्नाटा है। दीवारों पर धुएं के निशान हैं, पर असली घाव उन परिवारों के दिलों में हैं जिनके अपने अब नहीं लौटेंगे।
शेरू कहते हैं, “जब आंखें बंद करता हूं तो धुआं दिखता है। मां खांस रही हैं, मैं उन्हें खींच रहा हूं, और वार्ड में आग की लपटें हैं।”
यह सिर्फ एक अस्पताल की लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की वो चुप्पी है जिसने आठ जिंदगियां निगल लीं। आग बुझ गई, लेकिन उस रात का धुआं आज भी हर उस परिवार की सांस में बाकी है — जो वहां मौजूद था, और जिसने अपनी दुनिया खो दी।

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Sachin Sharmaलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


