कोडवर्ड, डिजिटल कमांड और लोकल ऑपरेटिव,ऐसे चलता था राजस्थान में संगठित गैंग का पूरा नेटवर्क

Mar 04, 2026 06:49 pm ISTSachin Sharma लाइव हिन्दुस्तान
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19 जिलों में हुई पुलिस की समन्वित कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये संगठित गिरोह काम कैसे करते थे? शुरुआती जांच और पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी बताती है कि

कोडवर्ड, डिजिटल कमांड और लोकल ऑपरेटिव,ऐसे चलता था राजस्थान में संगठित गैंग का पूरा नेटवर्क

19 जिलों में हुई पुलिस की समन्वित कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये संगठित गिरोह काम कैसे करते थे? शुरुआती जांच और पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी बताती है कि यह नेटवर्क पारंपरिक अपराध से कहीं ज्यादा आधुनिक और संरचित तरीके से संचालित हो रहा था।

बाहर बैठा ‘कमांड’, अंदर एक्टिव ‘फील्ड यूनिट’

जांच में सामने आया है कि कई गैंग लीडर प्रदेश से बाहर या विदेश में बैठकर नेटवर्क को ऑपरेट कर रहे थे। स्थानीय स्तर पर 3 से 5 लोगों की छोटी-छोटी टीमें बनाई गई थीं, जिन्हें “टास्क बेस्ड काम” दिया जाता था।

इनका सीधा संपर्क सरगना से नहीं, बल्कि मिडिल-लेवल हैंडलर से होता था।

सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड चैट का इस्तेमाल

गैंग सदस्य सामान्य कॉल से बचते थे।

इंटरनेट कॉलिंग

एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप

फर्जी आईडी से सोशल मीडिया अकाउंट

इनके जरिए संपर्क किया जाता था। रंगदारी कॉल भी अक्सर इंटरनेट बेस्ड नंबर से की जाती थी, ताकि लोकेशन ट्रैक न हो सके।

“मल्टी-सोर्स इनकम मॉडल”

पुलिस के अनुसार गैंग का काम केवल रंगदारी तक सीमित नहीं था।

इनका स्ट्रक्चर कुछ इस तरह था:

1. रंगदारी और धमकी कॉल – लोकल व्यापारियों और ठेकेदारों को निशाना

2. हथियार सप्लाई – एक राज्य से खरीद, दूसरे में डिलीवरी

3. ड्रग्स ट्रांजिट – सीमावर्ती जिलों को कॉरिडोर की तरह इस्तेमाल

4. फाइनेंशियल मैनेजमेंट – फर्जी बैंक खातों और एटीएम कार्ड से लेनदेन

चूरू में बैंक कार्ड, पासबुक और नकदी की बरामदगी इसी फाइनेंशियल स्ट्रक्चर की ओर इशारा करती है।

हथियारों की ‘रोटेशन पॉलिसी’

सूत्रों का दावा है कि हथियार लंबे समय तक एक ही सदस्य के पास नहीं रखे जाते थे।

वारदात से पहले हथियार सप्लाई

घटना के बाद तुरंत शिफ्ट

अलग जिले में स्टोर

इस “रोटेशन पॉलिसी” के कारण पुलिस के लिए लिंक जोड़ना मुश्किल हो जाता था।

लोकल युवाओं की भर्ती

जांच में यह भी सामने आया कि बेरोजगार या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले युवाओं को सोशल मीडिया के जरिए जोड़ा जाता था।

पहले छोटे काम—जैसे पोस्टर लगाना, धमकी मैसेज पहुंचाना—फिर धीरे-धीरे बड़े अपराध में शामिल करना।

इसे गैंग के अंदर “टेस्टिंग फेज” कहा जाता था।

डोजियर से टूटा पैटर्न

इस बार पुलिस ने सिर्फ गिरफ्तारी पर नहीं रुकी।

428 गैंग सदस्यों के डोजियर तैयार कर उनके कॉल रिकॉर्ड, बैंक ट्रेल और डिजिटल एक्टिविटी की मैपिंग की गई।

यही वजह रही कि 19 जिलों में एक साथ दबिश देकर नेटवर्क को सरप्राइज किया गया ताकि सूचना लीक न हो और सदस्य भाग न सकें।

जांच से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह यह बताती है कि राजस्थान में संगठित अपराध अब पारंपरिक “स्थानीय बदमाश” मॉडल से आगे बढ़ चुका है।

यह डिजिटल कमांड, फाइनेंशियल मैनेजमेंट और मल्टी-स्टेट सप्लाई चेन वाला स्ट्रक्चर बन चुका था।

19 जिलों में हुई कार्रवाई दरअसल इसी मॉड्यूल को तोड़ने की कोशिश है—जहां अपराध अब छिपकर नहीं, बल्कि संगठित सिस्टम की तरह संचालित हो रहा था।

Sachin Sharma

लेखक के बारे में

Sachin Sharma

सचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)
सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।

सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।

शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।

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