
राजस्थान में स्वास्थ्य विभाग के दावों पर सवाल, दिसंबर में सामने आए 1.7 लाख नए टीबी केस
राजस्थान की भजनलाल सरकार ने प्रशासनिक व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ व प्रभावी बनाने के उद्देश्य से ब्यूरोक्रेसी में व्यापक स्तर पर फेरबदल किया है। इस क्रम में प्रदेश के सभी 41 जिलों के प्रभारी सचिवों की अदला-बदली कर दी गई है।
राज्य में वर्ष 2025 तक क्षय रोग (टीबी) को समाप्त करने का स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका है। दिसंबर माह में चलाए गए विशेष अभियान के दौरान बड़ी संख्या में नए टीबी मरीज सामने आए हैं। 7 दिसंबर से 30 दिसंबर तक चले इस अभियान में कुल 1,76,063 नए टीबी मामलों की पहचान की गई, जिसने विभाग के दावों और रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इन नए मामलों में से 1,09,523 मरीज संवेदनशील (वulnerable) आबादी से जुड़े थे, जबकि 65,356 मामले अन्य जनसंख्या समूहों में पाए गए। अधिकारियों का कहना है कि सभी चिन्हित मरीजों को तुरंत उपचार से जोड़ा जाएगा, ताकि संक्रमण की आगे की श्रृंखला को रोका जा सके।
गैर-संवेदनशील आबादी में अधिक पॉजिटिविटी दर
अभियान के दौरान एक अहम तथ्य सामने आया है। विभाग के अनुसार, अन्य (गैर-संवेदनशील) जनसंख्या समूहों में टीबी पॉजिटिविटी दर 3% रही, जबकि संवेदनशील आबादी में यह केवल 1% दर्ज की गई। अधिकारियों ने बताया कि ये ऐसे “छिपे हुए मामले” थे, जिनकी पहले पहचान नहीं हो पाई थी।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा,
“ये वे मरीज थे जिनमें बीमारी मौजूद थी, लेकिन वे जांच के दायरे में नहीं आ सके थे। इस अभियान का उद्देश्य ऐसे ही छिपे मामलों को सामने लाना था।”
जयपुर और अलवर की स्थिति चिंताजनक
जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो जयपुर में सबसे अधिक मामले सामने आए। जयपुर में संवेदनशील आबादी में 12,416 और अन्य जनसंख्या समूहों में 13,708 नए टीबी मरीज मिले। जयपुर में जहां संवेदनशील वर्ग में पॉजिटिविटी दर 1% रही, वहीं गैर-संवेदनशील आबादी में यह 5% तक पहुंच गई।
वहीं अलवर जिले में स्थिति और भी गंभीर पाई गई। यहां गैर-संवेदनशील जनसंख्या में 7% पॉजिटिविटी दर दर्ज की गई, जबकि संवेदनशील आबादी में यह दर 1% रही। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह दर्शाता है कि टीबी केवल सीमित वर्गों की बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि सामान्य आबादी में भी तेजी से फैल रही है।
1.8 करोड़ लोगों की हुई स्क्रीनिंग
स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि दिसंबर माह में कुल 1.8 करोड़ लोगों की टीबी जांच की गई। इनमें से 1.6 करोड़ लोग संवेदनशील आबादी से थे। इस अभियान के तहत घर-घर जाकर स्क्रीनिंग की गई, जिससे बड़ी संख्या में मरीजों की पहचान संभव हो सकी।
वरिष्ठ अधिकारी ने बताया इस अभियान का मुख्य उद्देश्य टीबी के छिपे मामलों की जल्द पहचान करना और समय पर इलाज उपलब्ध कराना था। इससे संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है।”
किन वर्गों को माना गया संवेदनशील
अभियान के तहत जिन लोगों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया, उनमें एचआईवी/एड्स से पीड़ित व्यक्ति, मधुमेह रोगी, 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग, कुपोषित व्यक्ति, धूम्रपान या शराब का सेवन करने वाले, प्रवासी श्रमिक, जनजातीय समुदाय, पूर्व टीबी मरीज, साथ ही खनन व निर्माण स्थलों, जेलों और शहरी झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग शामिल थे।
अधिकारियों ने कहा कि संवेदनशील आबादी में टीबी की पहचान बेहद जरूरी है, क्योंकि इन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जो लोग टीबी से संक्रमित हैं लेकिन अभी बीमार नहीं हैं, वे संक्रमण नहीं फैलाते।
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि ऐसे विशेष अभियानों से टीबी के प्रसार पर नियंत्रण पाया जा सकता है। एक अधिकारी ने कहा,
“जिला स्तर की टीमों की निरंतर सक्रियता और जनता की भागीदारी से अधिकतम मरीजों की समय पर पहचान संभव हो रही है। इससे संक्रमण की श्रृंखला को प्रभावी रूप से तोड़ा जा सकेगा।”
विशेषज्ञों के अनुसार, टीबी एक संक्रामक रोग है, जो हवा के माध्यम से फैलता है। जब फेफड़ों की टीबी से पीड़ित व्यक्ति खांसता, छींकता या थूकता है, तो बैक्टीरिया हवा में फैल जाते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति को संक्रमित होने के लिए केवल कुछ ही कीटाणुओं को सांस के जरिए अंदर लेना पर्याप्त होता है।
स्वास्थ्य विभाग ने आमजन से अपील की है कि लंबे समय तक खांसी, बुखार, वजन घटने या कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें और तुरंत जांच कराएं, ताकि टीबी को समय रहते रोका जा सके।

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Sachin Sharmaलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




