राजस्थान से हुई पहल को MP-छत्तीसगढ़ ने अपनाया, पर यहीं टूट गई उम्मीदों की वह डोर
कभी राजस्थान प्रदेश भाजपा कार्यालय में हर रोज़ फरियादियों की आवाज़ें गूंजती थीं, मंत्री और विधायक सीधे जनता के बीच बैठते थे, और हर कोई उम्मीद लेकर आता था मेरी भी सुनवाई होगी!

कभी राजस्थान प्रदेश भाजपा कार्यालय में हर रोज़ फरियादियों की आवाज़ें गूंजती थीं, मंत्री और विधायक सीधे जनता के बीच बैठते थे, और हर कोई उम्मीद लेकर आता था मेरी भी सुनवाई होगी!
वक़्त बदला, सरकार बदली, और वो रौनक जैसे किसी कोने में सिमट गई। अब वही जनसुनवाई मॉडल, जो राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार की पहचान था, आज मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वो फार्मूला अपनाया जा चुका है और राजस्थान में फिर से उसी परंपरा के पुनर्जीवन की मांग तेज हो गई है।
प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर वह सवाल उठ रहा है क्या भाजपा अपने पुराने संवाद मॉडल को दोहराएगी?
क्या प्रदेश कार्यालय में फिर से मंत्री, विधायक और पदाधिकारी आम लोगों के बीच बैठेंगे?
या फिर यह परंपरा सिर्फ दूसरे राज्यों में ही राजस्थान के प्रयोग की मिसाल बनकर रह जाएगी?
जनता इंतज़ार में है…
प्रदेश भाजपा कार्यालय कभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों की चहल-पहल से गुलजार रहता था। लेकिन आज वहां शांति है ऐसी शांति जो सवाल बन गई है। भले ही मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने मुख्यमंत्री निवास पर जनसुनवाई की परंपरा कायम रखी है जहां हर पंद्रह दिन में 500 से अधिक लोग अपनी बात लेकर पहुंचते हैं पर संगठन स्तर पर संवाद की कमी अब खुलकर दिख रही है।
भाजपा के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं जब मंत्री, विधायक और पदाधिकारी जनता के बीच बैठते थे, तब भाजपा सिर्फ सत्ता नहीं, एक परिवार लगती थी।
प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने भी इस बात को माना है कि जनसुनवाई की परंपरा को फिर से शुरू करने की ज़रूरत है।
2013 से 2018 तक वसुंधरा राजे के शासनकाल में भाजपा कार्यालय खुद एक जनता दरबार था। सोमवार से शुक्रवार तक दो मंत्री, एक विधायक और दो वरिष्ठ पदाधिकारी बैठते थे।
लोग बिना झिझक अपनी समस्या रखते, मंत्री वहीं से फोन उठाकर अफसरों को निर्देश देते, और कई मुद्दों का निपटारा उसी दिन हो जाता था।
यह मॉडल इतना असरदार था कि गहलोत सरकार ने भी कांग्रेस दफ्तर में इसे अपनाया।
लेकिन 2018 के बाद जैसे ही सत्ता का समीकरण बदला, यह परंपरा भी धीरे-धीरे खत्म हो गई।
अब वही राजस्थान मॉडल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नई ऊर्जा के साथ चल रहा है।
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सहयोग केंद्र की शुरुआत की है जहां रोज़ाना मंत्री, विधायक और संगठन पदाधिकारी बैठते हैं। शिकायतें ऑनलाइन दर्ज होती हैं, समाधान की मॉनिटरिंग होती है, और हर केस की ट्रैकिंग तक होती है।
छत्तीसगढ़ में मंत्रियों से मुलाकात के दौरान कई बार कार्यकर्ताओं को भीड़ लग जाती है। इसे देखते हुए मंत्री से मुलाकात के पहले पंजीयन की भी व्यवस्था की जाएगी। भाजपा कार्यकर्ता दोपहर 1 से 2 बजे के बीच मुलाकात के लिए अपना पंजीयन करा सकते हैं। पंजीयन के बाद कार्यकर्ताओं को टोकन दिया जाएगा। मंत्री दोपहर 2 से 5 बजे तक कार्यालय में बैठेने और टोकन के हिसाब से कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे।
वहीं मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहनलाल यादव ने जनता दरबार को संस्थागत ढांचा बना दिया है। हर मंत्री हफ्ते में दो दिन राजधानी में जनता से मिलता है और अपने जिले में हर पखवाड़े जनसुनवाई करता है।
इससे पार्टी-सरकार के बीच संवाद मज़बूत हुआ है, और कार्यकर्ताओं में भरोसा लौटा है। मध्य प्रदेश सरकार ने सभी प्रभारी मंत्रियों को किलो से दूर नहीं रहने के निर्देश दिए थे और कहा था कि जानता के बीच जाए और जनता दरबार लगाकर गुड गवर्नेंस का मेसेज दे।
राजस्थान में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अपने स्तर पर जनसुनवाई प्रबंधन सेल बनाया है।
हर शिकायत की मॉनिटरिंग सीधे सीएम कार्यालय से होती है। औसतन 500 से ज्यादा नागरिक सीएम से मिलते हैं, और मुख्यमंत्री मौके पर ही अधिकारियों को आदेश देते हैं।
लेकिन सवाल अब संगठन के स्तर पर है जहां कार्यालय के कमरे बंद हैं, और कार्यकर्ता बाहर इंतज़ार में खड़े हैं।
दिलचस्प यह है कि जब भाजपा विपक्ष में थी, तब भी जनसुनवाई की परंपरा कायम थी।
पूर्व प्रदेशाध्यक्ष मदन लाल सैनी रोज़ाना कार्यकर्ताओं से मिलते थे। डॉ. सतीश पूनियां दफ्तर के गार्डन में बैठकर लोगों से सीधे संवाद करते थे।
तब किसी को यह एहसास नहीं था कि यह परंपरा आने वाले समय में इतनी दुर्लभ हो जाएगी।
भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ खुद मानते हैं कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तरह राजस्थान में भी संगठन स्तर पर जनसुनवाई को फिर से शुरू करने की ज़रूरत है। वे कहते हैं हमारी भी वही सरकारें हैं, वही विचारधारा है। जल्द ही राजस्थान में भी कार्यकर्ताओं की सुनवाई का नया अध्याय शुरू होगा। जनता और कार्यकर्ताओं दोनों की आवाज़ को अब अनसुना नहीं किया जाएगा।
लेखक के बारे में
Sachin Sharmaसचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)
सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।
सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।
शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।
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