राजस्थान के पूर्व विधायक हेतराम बेनीवाल का 94 वर्ष में निधन, क्षेत्र में शोक की लहर

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राजस्थान की राजनीति में जब भी ‘लाल झंडे’ और किसान संघर्षों के इतिहास को याद किया जाएगा, उसमें माकपा के कद्दावर नेता हेतराम बेनीवाल का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा। 94 वर्ष की आयु में सोमवार रात उनका निधन हो गया।

राजस्थान के पूर्व विधायक हेतराम बेनीवाल का 94 वर्ष में निधन, क्षेत्र में शोक की लहर

राजस्थान की राजनीति में जब भी ‘लाल झंडे’ और किसान संघर्षों के इतिहास को याद किया जाएगा, उसमें माकपा के कद्दावर नेता हेतराम बेनीवाल का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा। 94 वर्ष की आयु में सोमवार रात उनका निधन हो गया। उनका जाना केवल एक पूर्व विधायक का निधन नहीं, बल्कि प्रदेश में किसान आंदोलनों के एक जीवंत अध्याय का समापन माना जा रहा है।

13 अक्टूबर 1932 को जन्मे बेनीवाल ने उस दौर में वामपंथी विचारधारा को चुना, जब राजस्थान की राजनीति में रजवाड़ों और प्रभावशाली वर्गों का वर्चस्व था। उन्होंने 1967 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के टिकट पर संगरिया विधानसभा क्षेत्र से पहली बार चुनावी मैदान में कदम रखा। हालांकि शुरुआती चुनावों में उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने संगठन और जनसंघर्षों के जरिए अपनी अलग पहचान बना ली।

उन्हें वास्तविक राजनीतिक पहचान 1990-91 में मिली, जब वे संगरिया से विधायक निर्वाचित हुए। यद्यपि विधानसभा भंग होने के कारण उनका कार्यकाल करीब ढाई वर्ष ही रहा, लेकिन इन 30 महीनों में उन्होंने सदन के भीतर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई। पुराने विधायकों के मुताबिक, बेनीवाल की आवाज और तर्कशक्ति ऐसी थी कि सत्ता पक्ष भी उनकी बातों को गंभीरता से सुनने को विवश हो जाता था।

विधानसभा के एक चर्चित प्रसंग में भारी शोरगुल के बीच उन्होंने तत्कालीन अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा से दो टूक कहा था—“पहले इन्हें चुप कराइए, तब बोलूंगा।” इस पर अध्यक्ष ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था—“आप अपने स्वभाव में बोलिए, ये खुद चुप हो जाएंगे।” यह प्रसंग आज भी उनके बेबाक अंदाज का उदाहरण माना जाता है।

बेनीवाल की सबसे बड़ी ताकत उनकी बुलंद आवाज और सादगी थी। कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे हजारों की भीड़ को बिना माइक्रोफोन संबोधित कर लेते थे। उनकी भाषा तीखी, लेकिन मुद्दों पर केंद्रित होती थी। वे प्रशासनिक नीतियों की आलोचना करते समय तथ्यों और जनभावनाओं को साथ लेकर चलते थे।

किसान आंदोलनों में उनकी भूमिका निर्णायक रही। 2004 से 2006 के बीच चला घड़साना किसान आंदोलन, जिसमें सिंचाई पानी की मांग को लेकर व्यापक विरोध हुआ, उसमें बेनीवाल ने गांव-गांव जाकर किसानों को संगठित किया। वे शपथ सभाएं कराते थे और आंदोलन को अनुशासित व एकजुट बनाए रखते थे।

राजस्थान कैनाल क्षेत्र में जमीन आवंटन से जुड़े मुद्दे हों या जेसीटी मिल मजदूरों का संघर्ष—हर बड़े आंदोलन में वे अग्रिम पंक्ति में दिखाई दिए। भाखड़ा और गंगनहर के पानी के अधिकारों को लेकर उन्होंने कई बार जेल यात्राएं कीं और लाठीचार्ज का सामना किया। उनके साथियों का कहना है कि प्रशासन को पहले से अंदेशा रहता था कि यदि बेनीवाल ने प्रदर्शन का आह्वान किया, तो हजारों किसान सड़कों पर उतर आएंगे।

व्यक्तिगत जीवन में भी वे सादगी के प्रतीक रहे। पिछले वर्ष उनकी पत्नी चंद्रावली देवी का निधन हुआ था, जिसके बाद वे कुछ समय के लिए एकाकी हो गए थे। इसके बावजूद सार्वजनिक जीवन से उन्होंने दूरी नहीं बनाई। 94 वर्ष की आयु में भी वे पार्टी बैठकों और सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी करते रहे।

तीन दिन पहले हीमोग्लोबिन की कमी के चलते उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में निमोनिया संक्रमण ने उनकी स्थिति गंभीर कर दी और सोमवार रात उन्होंने अंतिम सांस ली।

मंगलवार को उनके पैतृक गांव 8 एलएनपी में अंतिम यात्रा निकाली जाएगी। माकपा और विभिन्न किसान संगठनों ने उन्हें ‘जनता का सिपाही’ बताते हुए श्रद्धांजलि दी है। प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने उनके निधन को किसान राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।

हेतराम बेनीवाल का जीवन इस बात का उदाहरण रहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद वैचारिक प्रतिबद्धता और जनसंपर्क के बल पर राजनीति में स्थायी छाप छोड़ी जा सकती है। उनके जाने के साथ राजस्थान की किसान राजनीति का एक बुलंद स्वर खामोश हो गया, लेकिन संघर्ष और संगठन की उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

Sachin Sharma

लेखक के बारे में

Sachin Sharma

सचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)
सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।

सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।

शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।

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