40 साल, 4 सरकारें… फिर भी जमीन नहीं; जयपुर में भटक रहे पाक से आए हिंदू शरणार्थी

Sachin Sharma हिन्दुस्तान टाइम्स
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1981 में जब पाकिस्तान में बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर सैकड़ों हिंदू परिवारों ने अपना वतन छोड़ा था, तब उन्हें उम्मीद थी कि भारत में उन्हें सिर्फ शरण ही नहीं, बल्कि सम्मान और स्थायित्व भी मिलेगा।

40 साल, 4 सरकारें… फिर भी जमीन नहीं; जयपुर में भटक रहे पाक से आए हिंदू शरणार्थी

1981 में जब पाकिस्तान में बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर सैकड़ों हिंदू परिवारों ने अपना वतन छोड़ा था, तब उन्हें उम्मीद थी कि भारत में उन्हें सिर्फ शरण ही नहीं, बल्कि सम्मान और स्थायित्व भी मिलेगा। लेकिन चार दशक बीत जाने के बाद भी इन परिवारों का सबसे बड़ा सपना अपनी जमीन आज भी अधूरा है।

ये परिवार पहले राजस्थान के श्रीगंगानगर में बसे, फिर दिल्ली होते हुए अंततः जयपुर में आकर ठहर गए। समय के साथ हालात बदले, सरकारें बदलीं, नीतियां बनीं, लेकिन इन परिवारों की जिंदगी में स्थायित्व अब तक नहीं आ पाया।

साल 2001 में भारत सरकार ने इन्हें भारतीय नागरिकता दी। नागरिकता मिलने के बाद नियमों के तहत इन विस्थापितों को जमीन आवंटित किया जाना था, क्योंकि वे पाकिस्तान में अपनी पूरी संपत्ति छोड़कर आए थे। विशेष रूप से इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र में पुनर्वास की योजनाएं बनाई गईं, लेकिन जमीनी हकीकत इन कागजी वादों से बिल्कुल अलग है।

फाइलों में फंसी जिंदगी, जमीन अब भी दूर

जानकारी के मुताबिक, जैसलमेर के नाचना क्षेत्र में इन परिवारों को जमीन देने के लिए राज्य सरकार के एक मंत्री ने पत्र भी लिखा था। लेकिन यह पत्र भी सरकारी दफ्तरों की फाइलों में कहीं दबकर रह गया। आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

इन परिवारों का कहना है कि वे वर्षों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं कभी कलेक्टर कार्यालय, कभी राजस्व विभाग, तो कभी नेताओं के दरवाजे पर नतीजा शून्य।

भाजपा दफ्तर पहुंचे, खाली हाथ लौटे

अपनी मांगों को लेकर हाल ही में ये परिवार जयपुर स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे। उम्मीद थी कि कोई उनकी सुनवाई करेगा, लेकिन वहां कोई जिम्मेदार पदाधिकारी नहीं मिला। निराश होकर सभी परिवार वापस लौट गए।

एक पीड़ित ने कहा, हम हर बार उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती है। हमें सिर्फ आश्वासन मिलता है, समाधान नहीं।

न किराए का घर, न अपनी जमीन

सबसे गंभीर समस्या यह है कि इन परिवारों को आज किराए पर मकान तक नहीं मिल रहा। पहचान और दस्तावेज होने के बावजूद उन्हें शक की नजर से देखा जाता है। कई परिवार झुग्गियों या अस्थायी ठिकानों में रहने को मजबूर हैं।

महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी इनके लिए संघर्ष बन गया है।

न वहां के रहे, न यहां के

इन परिवारों का दर्द सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है। वे कहते हैं हम पाकिस्तान लौट नहीं सकते और भारत में हमें अब तक पूरी तरह अपनाया नहीं गया।

सरकार की नीतियों में ‘हिंदू शरणार्थियों के पुनर्वास’ की बात जरूर होती है, लेकिन इन परिवारों का आरोप है कि जमीनी स्तर पर उनका कोई क्रियान्वयन नहीं हो रहा।

सरकार से आखिरी उम्मीद

पीड़ित परिवारों ने सरकार से अपील की है कि उनके मामले को प्राथमिकता के आधार पर देखा जाए और जल्द से जल्द जमीन आवंटन की प्रक्रिया पूरी की जाए। उनका कहना है कि अब उनके पास इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

अगर अब भी हमें जमीन नहीं मिली, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां भी इसी संघर्ष में जिंदगी गुजारेंगी, एक बुजुर्ग ने कहा।

चार दशक पहले जो लोग सुरक्षा और सम्मान की तलाश में भारत आए थे, आज वही लोग अपने ही देश में पहचान और अधिकार के लिए जूझ रहे हैं। सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है, जो उन्होंने इस देश पर किया था।

Sachin Sharma

लेखक के बारे में

Sachin Sharma

सचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)
सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।

सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।

शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।

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