जयपुर में एक शहर-एक मेयर से बदलेगा समीकरण; BJP को फायदा, दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर
2016 में निगम बनने के बाद से यहां भाजपा का मेयर रहा है। केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और प्रभारी मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के सामने भाजपा का गढ़ बचाने की चुनौती होगी। कांग्रेस को दिवंगत नेता रामेश्वर डूडी की कमी खलेगी, हालांकि उनकी पत्नी विधायक सुशीला डूडी पार्टी के लिए सक्रिय रहेंगी।

राजस्थान में 10 नगर निगमों के मेयर पद के लिए आरक्षण लॉटरी जारी होने के साथ ही आगामी निकाय चुनाव की तस्वीर साफ हो गई है। जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर में मेयर का पद अनारक्षित रखा गया है, जबकि अजमेर, भरतपुर, अलवर, भीलवाड़ा और पाली में अनारक्षित महिला मेयर चुनी जाएंगी। कोटा में मेयर पद ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हुआ है।
खास बात यह है कि अलवर, भीलवाड़ा और पाली में निगम बनने के बाद पहली बार मेयर का चुनाव होगा और तीनों ही जगह पहली मेयर महिला होगी। वहीं जयपुर, जोधपुर और कोटा में पहले दो-दो निगम थे, जिन्हें अब एक कर दिया गया है। माना जा रहा है कि एक निगम की व्यवस्था का राजनीतिक फायदा भाजपा को मिल सकता है।
कुल मिलाकर सत्ता में होने, शहरी क्षेत्रों में मजबूत संगठन और कई जिलों में अनुकूल विधानसभा समीकरण के कारण भाजपा को कांग्रेस पर बढ़त मिलती दिख रही है। हालांकि टिकट वितरण और स्थानीय गुटबाजी दोनों दलों के लिए चुनौती होगी।
CM भजनलाल और दीया कुमारी के लिए प्रतिष्ठा का चुनाव
जयपुर में मेयर पद अनारक्षित ओपन है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों के पास उम्मीदवार चयन के लिए बड़ा दायरा रहेगा। एक निगम होने का फायदा भाजपा को मिलने की संभावना है। पुराने शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों में कांग्रेस की पकड़ मजबूत मानी जाती है, जबकि बाहरी और नए विकसित इलाकों में भाजपा को बढ़त मिलती रही है।
सरकार ने पिछली सरकार की दो निगमों की व्यवस्था खत्म कर जयपुर को फिर एक निगम बनाया है। अब इस फैसले को सफल साबित करने का दबाव भाजपा पर रहेगा।
जयपुर चुनाव मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और डिप्टी सीएम दीया कुमारी के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल होगा। प्रभारी मंत्री जोगाराम पटेल और सांसद मंजू शर्मा की भूमिका भी अहम रहेगी। कांग्रेस की ओर से अमीन कागजी, रफीक खान और प्रताप सिंह खाचरियावास जैसे नेताओं की परीक्षा होगी। पिछले चुनाव में दो निगम होने के कारण एक-एक मेयर भाजपा और कांग्रेस के बने थे।
BJP के गढ़ में महिला मेयर की परीक्षा
अजमेर में मेयर पद अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित हुआ है। किसी भी वर्ग की महिला यहां से चुनाव लड़ सकती है। भाजपा के लिए यह सीट फिलहाल मजबूत मानी जाती है। पिछले दो निकाय चुनाव भाजपा ने जीते हैं।
विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, प्रभारी मंत्री दीया कुमारी और केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी के लिए चुनाव अहम होगा। अजमेर में ओबीसी, एससी-एसटी, ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, मुस्लिम, सिंधी और क्रिश्चियन वोटर चुनावी समीकरण प्रभावित करते हैं।
मेघवाल और खींवसर की प्रतिष्ठा दांव पर
बीकानेर में मेयर पद अनारक्षित ओपन है। भाजपा और कांग्रेस किसी भी वर्ग से महिला या पुरुष प्रत्याशी उतार सकती हैं। पुष्करणा ब्राह्मण और वैश्य समाज के साथ जाट, कुम्हार, सुथार और बिश्नोई समाज का भी प्रभाव है।
2016 में निगम बनने के बाद से यहां भाजपा का मेयर रहा है। केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और प्रभारी मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के सामने भाजपा का गढ़ बचाने की चुनौती होगी। कांग्रेस को दिवंगत नेता रामेश्वर डूडी की कमी खलेगी, हालांकि उनकी पत्नी विधायक सुशीला डूडी पार्टी के लिए सक्रिय रहेंगी।
उदयपुर: भाजपा की हैट्रिक के बाद कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
उदयपुर में भी मेयर पद अनारक्षित ओपन है। नए परिसीमन में बाहरी इलाकों के 10 वार्ड बढ़े हैं, जहां एससी-एसटी वोटर बड़ी संख्या में हैं। शहर के अंदर ब्राह्मण समाज भाजपा का मजबूत वोट बैंक माना जाता है।
निगम बनने के बाद तीनों चुनाव भाजपा ने जीते हैं। इस बार भी गुलाबचंद कटारिया के समर्थक नेटवर्क का पार्टी को फायदा मिल सकता है। मंत्री बाबूलाल खराड़ी और प्रभारी मंत्री हेमंत मीणा के सामने चुनावी रणनीति संभालने की जिम्मेदारी होगी। विधानसभा चुनाव में उदयपुर की 8 में से 7 सीट भाजपा ने जीती थीं।
भरतपुर: CM के गृह जिले में कांग्रेस-भाजपा आमने-सामने
भरतपुर में अनारक्षित महिला मेयर चुनी जाएगी। जाट और जाटव समाज यहां अहम वोट बैंक हैं, जबकि ब्राह्मण, वैश्य और गुर्जर सहित अन्य ओबीसी वर्ग भी चुनाव को प्रभावित करते हैं।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले में यह चुनाव खास होगा। गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम और प्रभारी मंत्री सुरेश रावत की प्रतिष्ठा भी जुड़ी है। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा से मेयर पद छीन लिया था। लोकसभा चुनाव में संजना जाटव की जीत के बाद कांग्रेस का मनोबल मजबूत है। पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह के लिए भी यह चुनाव अहम रहेगा।
अलवर: पहली बार महिला मेयर, भाजपा की अंदरूनी खींचतान पर नजर
अलवर में पहली बार मेयर का चुनाव होगा और पद अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित है। यहां किसी एक जाति का पूर्ण वर्चस्व नहीं होने से दोनों दलों को सभी वर्गों को साधने वाला चेहरा चुनना होगा।
मंत्री संजय शर्मा के धरने के बाद भाजपा की स्थानीय राजनीति में खींचतान सामने आई थी। प्रभारी मंत्री किरोड़ी लाल मीणा की नाराजगी की चर्चाओं के बीच कांग्रेस इसे अपने लिए अवसर मान रही है। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के लिए भी चुनाव प्रतिष्ठा का विषय होगा। वहीं नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली कांग्रेस का मोर्चा संभालेंगे।
भीलवाड़ा: भाजपा मजबूत, कांग्रेस के सामने चुनौती
भीलवाड़ा में पहली बार मेयर चुना जाएगा और यह पद अनारक्षित महिला के लिए है। जैन, अग्रवाल और माहेश्वरी सहित व्यापारिक वर्गों का यहां प्रभाव है। कई इलाकों में ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, कुमावत और माली मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
पिछले लगातार तीन चुनावों में भाजपा ने सभापति पद जीता है। विधानसभा चुनाव में भी भाजपा का दबदबा रहा। ऐसे में प्रभारी मंत्री और डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा के लिए यह चुनाव अनुकूल माना जा रहा है।
पाली: पहली महिला मेयर के लिए भाजपा-कांग्रेस में मुकाबला
पाली में भी पहली बार मेयर का चुनाव होगा और पद अनारक्षित महिला के लिए रखा गया है। ब्राह्मण, राजपूत, जाट, जैन, मेघवाल और सीरवी समाज के साथ माली और घांची जैसे ओबीसी वर्ग भी अहम हैं।
पिछले पांच निकाय चुनावों में तीन बार भाजपा और दो बार कांग्रेस ने सभापति पद जीता है। इसलिए यहां मुकाबला दूसरे नए निगमों की तुलना में ज्यादा कड़ा हो सकता है। प्रभारी मंत्री झाबर सिंह खर्रा, मंत्री जोराराम कुमावत और सांसद पीपी चौधरी के सामने भाजपा का प्रदर्शन बेहतर रखने की चुनौती होगी।
कोटा में ओबीसी महिला, जोधपुर में गहलोत-शेखावत की प्रतिष्ठा
कोटा में मेयर पद ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हुआ है। वहीं जोधपुर में पद अनारक्षित ओपन है। जोधपुर का चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की राजनीतिक प्रतिष्ठा से जुड़ा माना जा रहा है।
कुल मिलाकर 10 निगमों की आरक्षण तस्वीर ने चुनावी मुकाबले के लिए मंच तैयार कर दिया है। भाजपा के सामने सत्ता और संगठन की ताकत को वोट में बदलने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस के पास स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार चयन और भाजपा की अंदरूनी खींचतान को भुनाने का मौका रहेगा। अब असली मुकाबला टिकट वितरण के बाद शुरू होगा।


