नौतपा में बारिश-ओलों से कमजोर होगा मानसून? 6 साल के आंकड़ों समझिए पूरी तस्वीर
नौतपा में इस बार मौसम ने कई रंग दिखाए। पहले राजस्थान भीषण गर्मी और 48 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचे तापमान से झुलसा, फिर अचानक आंधी, बारिश और ओलों ने राहत दे दी।

राजस्थान में इस बार नौतपा का मिजाज पूरी तरह बदला हुआ नजर आया। आमतौर पर नौतपा को भीषण गर्मी और लू के दौर के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार शुरुआत में जहां तापमान 48 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया, वहीं 30 मई के बाद प्रदेश के कई हिस्सों में आंधी, बारिश और ओलावृष्टि का दौर शुरू हो गया। मौसम में आए इस बड़े बदलाव के बाद लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई कि क्या नौतपा के दौरान हुई बारिश मानसून को कमजोर कर सकती है।
इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए पिछले छह वर्षों के नौतपा और मानसून के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। साथ ही मौसम विभाग के विशेषज्ञों से भी राय ली गई। विशेषज्ञों का कहना है कि नौतपा और मानसून के बीच सीधे संबंध का कोई वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है।
नौतपा और मानसून को जोड़ने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं
मौसम विभाग के निदेशक डॉ. राधेश्याम शर्मा के अनुसार राजस्थान में लंबे समय से यह धारणा रही है कि नौतपा के दौरान तेज गर्मी पड़े तो मानसून अच्छा रहता है और यदि इस दौरान बारिश हो जाए तो मानसून कमजोर पड़ सकता है। हालांकि वैज्ञानिक दृष्टि से इस बात की पुष्टि करने वाली कोई शोध या अध्ययन उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने बताया कि नौतपा और वेस्टर्न डिस्टर्बेंस जैसी गतिविधियां स्थानीय स्तर की मौसमी घटनाएं हैं, जबकि मानसून एक विशाल वैश्विक मौसम प्रणाली है, जो पूरे दक्षिण एशिया को प्रभावित करती है। इसलिए इन स्थानीय घटनाओं का मानसून पर प्रत्यक्ष प्रभाव साबित नहीं हुआ है।
पिछले वर्षों के आंकड़े भी तोड़ते हैं मिथक
विशेषज्ञों के अनुसार यदि हाल के वर्षों के आंकड़ों को देखें तो यह धारणा और कमजोर पड़ जाती है। वर्ष 2023 और 2025 में नौतपा के दौरान अच्छी बारिश दर्ज की गई थी और नौतपा का प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा था। इसके बावजूद दोनों वर्षों में राजस्थान में रिकॉर्ड या सामान्य से अधिक मानसूनी बारिश हुई।
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल नौतपा में हुई बारिश के आधार पर मानसून की स्थिति का अनुमान लगाना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं है।
इस बार ज्यादा सक्रिय रहे वेस्टर्न डिस्टर्बेंस
मई और जून के शुरुआती दिनों में लगातार सक्रिय रहे वेस्टर्न डिस्टर्बेंस भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। सामान्य तौर पर गर्मियों में इनकी संख्या कम हो जाती है, लेकिन इस बार मई में चार वेस्टर्न डिस्टर्बेंस सक्रिय रहे और जून की शुरुआत में भी एक नया सिस्टम प्रभावी हुआ।
डॉ. शर्मा के अनुसार वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का मुख्य असर तापमान और स्थानीय मौसम पर पड़ता है। इनके कारण बारिश और आंधी की गतिविधियां बढ़ सकती हैं, लेकिन इनका मानसून की कुल बारिश पर सीधा प्रभाव नहीं माना जाता।
राजस्थान में बढ़ रहे हैं बारिश के दिन
मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में राजस्थान में मानसून के दौरान बारिश के दिनों की संख्या बढ़ी है। वर्ष 2009 के बाद प्रदेश में लगातार सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई है। विशेष रूप से 2024 और 2025 में रिकॉर्ड बारिश देखने को मिली।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश में न केवल वर्षा की मात्रा बढ़ी है, बल्कि बारिश की तीव्रता भी बढ़ रही है। पिछले कुछ वर्षों में मानसून के दौरान औसतन 50 से 60 दिन बारिश दर्ज की जा रही है।
आखिर मानसून को क्या प्रभावित करता है?
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मानसून की ताकत का आकलन लंबी अवधि के जलवायु संकेतकों के आधार पर किया जाता है। इनमें प्रशांत महासागर में बनने वाले अल-नीनो और ला-नीना तथा हिंद महासागर के तापमान से जुड़े कारक सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
डॉ. शर्मा ने बताया कि इस वर्ष प्रशांत महासागर में अल-नीनो जैसी परिस्थितियां बनने की संभावना जताई जा रही है। आमतौर पर यह स्थिति मानसून को कमजोर करने वाली मानी जाती है और इसी आधार पर इस बार सामान्य से कुछ कम बारिश का अनुमान लगाया गया है।
हालांकि मौसम विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि हर मानसून अपने साथ अलग पैटर्न लेकर आता है। ऐसे में केवल नौतपा के दौरान हुई बारिश या गर्मी के आधार पर पूरे मानसून का आकलन करना सही नहीं होगा। फिलहाल वैज्ञानिक आंकड़े यही बताते हैं कि नौतपा और मानसून के बीच सीधे संबंध का कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है।
लेखक के बारे में
Sachin Sharmaसचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)
सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।
सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।
शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।
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