मेरे बेशर्म और बेईमान मित्र हैं डोटासरा,मिड-डे मील घोटाले पर मदन दिलावर का बड़ा आरोप
राजस्थान की राजनीति इन दिनों किसी रणभूमि से कम नहीं। यहां तलवारें नहीं, शब्द चलते हैं और जब शब्द चलें तो असर भी गहरा होता है। शिक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अब सियासत इस कदर गरमा गई है कि मर्यादाओं की रेखा धुंधली पड़ती दिख रही है।

राजस्थान की राजनीति इन दिनों किसी रणभूमि से कम नहीं। यहां तलवारें नहीं, शब्द चलते हैं और जब शब्द चलें तो असर भी गहरा होता है। शिक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अब सियासत इस कदर गरमा गई है कि मर्यादाओं की रेखा धुंधली पड़ती दिख रही है। ताजा मामला शिक्षा मंत्री मदन दिलावर और पूर्व शिक्षा मंत्री व पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा के बीच जुबानी जंग का है, जिसने सूबे की राजनीति में भूचाल ला दिया है।
एक जनसभा के मंच से मदन दिलावर ने जो कहा, वह सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि खुला सियासी ऐलान था। दिलावर ने डोटासरा को अपना “मित्र” बताया लेकिन ऐसा मित्र जिसे वे “बेशर्म” और “बेईमान” कहने से भी नहीं चूके। राजस्थान की सियासत में मित्रता और दुश्मनी के रिश्ते यूं भी बड़े अजीब होते हैं, लेकिन इस बार बात शब्दों से आगे निकलती दिख रही है।
मिड-डे मील बना सियासी बारूद
दिलावर का हमला केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सीधे-सीधे 2,000 करोड़ रुपये के मिड-डे मील घोटाले का जिक्र करते हुए दावा किया कि डोटासरा के कार्यकाल में हुए इस कथित घोटाले की जांच अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। मंत्री का कहना है कि इस मामले में कई लोग पहले ही जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं और “बड़ा नाम” भी जल्द कानून के शिकंजे में आ सकता है।
मिड-डे मील योजना जिसका मकसद सरकारी स्कूलों के बच्चों को पोषण देना था अब आरोपों के बोझ तले दबी नजर आ रही है। दिलावर के मुताबिक, पिछली सरकार के दौरान कागजों में बच्चों की संख्या बढ़ाकर भुगतान उठाया गया, जमीनी हकीकत में बच्चों की थाली में घटिया भोजन परोसा गया और सप्लाई से लेकर निविदाओं तक ‘चहेतों’ को फायदा पहुंचाया गया। यानी जिन बच्चों के भविष्य को मजबूत करना था, वही योजना कथित तौर पर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई।
ग्रामीण राजस्थान और ‘साइलेंट अटैक’
इस पूरे सियासी घमासान को अगर राजस्थान के गांव-ढाणियों से जोड़कर देखें, तो तस्वीर और भी चौंकाने वाली लगती है। जैसे ग्रामीण इलाकों में मिर्गी का साइलेंट अटैक बिना शोर के लोगों की जिंदगी को प्रभावित करता है, वैसे ही यह कथित घोटाला भी वर्षों तक चुपचाप सिस्टम के भीतर पनपता रहा। कागजों में सब ठीक, लेकिन हकीकत में बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर गहरा असर यही वह “साइलेंट अटैक” है, जिसकी परतें अब आंकड़ों और जांच के जरिए खुलने लगी हैं।
एजेंसियों का शिकंजा, सियासत का ताप
फिलहाल जांच एजेंसियां सक्रिय हैं। हाल के महीनों में कई अधिकारियों, सप्लायरों और बिचौलियों से पूछताछ हो चुकी है। दिलावर के बयान ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि आने वाले दिनों में एसीबी या अन्य एजेंसियों का शिकंजा और कस सकता है। यही वजह है कि कांग्रेस खेमे में इस बयान के बाद जबरदस्त उबाल देखा जा रहा है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह सब राजनीतिक बदले की कार्रवाई है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई” बता रहा है। राजस्थान की राजनीति में यह टकराव नया नहीं है, लेकिन इस बार मुद्दा बच्चों के भोजन और शिक्षा से जुड़ा है इसलिए संवेदनशीलता और ज्यादा बढ़ जाती है।
आगे क्या?
अब सबकी निगाहें गोविंद सिंह डोटासरा के जवाब पर टिकी हैं। क्या वे इस “अनोखे मित्र” के आरोपों का सियासी अंदाज में जवाब देंगे या कानूनी मोर्चे पर पलटवार करेंगे? एक बात तय है राजस्थान की सियासत में यह लड़ाई अभी थमने वाली नहीं।
लेखक के बारे में
Sachin Sharmaसचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)
सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।
सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।
शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।
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