जयपुर की वो रात… जब बिना शोर खिसक गए 400 करोड़; एक साथ कैसे हो गई 400 कंपनियों में डिजिटल डकैती
जयपुर से बेनकाब हुआ 400 करोड़ रुपए का साइबर घोटाला सिर्फ ठगी नहीं, बल्कि “डिजिटल हाइजैकिंग” का ऐसा मॉडल है जिसने देशभर के एक्सपोर्ट सिस्टम की सुरक्षा पर सीधा हमला किया है।

जयपुर से बेनकाब हुआ 400 करोड़ रुपए का साइबर घोटाला सिर्फ ठगी नहीं, बल्कि “डिजिटल हाइजैकिंग” का ऐसा मॉडल है जिसने देशभर के एक्सपोर्ट सिस्टम की सुरक्षा पर सीधा हमला किया है। यह कहानी है उस गैंग की, जिसने बिना ऑफिस में घुसे, बिना ताला तोड़े—सैकड़ों कंपनियों की पहचान चुरा ली और सरकारी छूट को अपने खातों में बहा दिया।
स्टेप-1: पहचान की हत्या, फर्जी DSC से खेल की शुरुआत
इस गैंग ने सबसे पहले कंपनियों के डायरेक्टर्स की डिजिटल पहचान को निशाना बनाया। फर्जी आधार और पैन कार्ड के जरिए डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) तैयार किए गए। यही DSC असली डायरेक्टर की “डिजिटल चाबी” होती है—और इसी चाबी की डुप्लीकेट कॉपी बनाकर अपराधियों ने सिस्टम में एंट्री ली।
स्टेप-2: DGFT पोर्टल पर ‘डिजिटल कब्जा’
DSC मिलते ही आरोपियों ने DGFT पोर्टल पर लॉगिन किया और कंपनियों की प्रोफाइल बदलनी शुरू कर दी। ईमेल, मोबाइल नंबर और डायरेक्टर डिटेल्स सब कुछ बदल दिया गया। यह सिर्फ एडिट नहीं था यह था “डिजिटल टेकओवर”। अब कंपनी का असली मालिक बाहर और ठग अंदर थे।
स्टेप-3: ICEGATE पर नई पहचान, असली पैसे पर फर्जी हक
इसके बाद आरोपियों ने ICEGATE पोर्टल पर नई आईडी बनाई। यहीं से उन्होंने असली खेल खेला—निर्यातकों को मिलने वाली सरकारी छूट (RODTEP/ROSCTL स्क्रिप्स) को उनके खातों से निकालकर फर्जी खातों में ट्रांसफर करना।
यह पैसा सीधे कैश नहीं होता, बल्कि “ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप” के रूप में होता है—जिसे बाजार में बेचा जा सकता है या ड्यूटी भरने में इस्तेमाल किया जा सकता है।
स्टेप-4: दिल्ली में ‘स्क्रिप्स मार्केट’, काले को सफेद करने का रास्ता
जांच में सामने आया कि दिल्ली में बैठे एजेंट इन स्क्रिप्स को खरीदते थे। यहां से स्क्रिप्स को बेचकर पैसा लिया जाता और फिर उसे अलग-अलग बैंक खातों में घुमाकर ट्रेस मिटा दी जाती। म्यूल अकाउंट्स यानी ऐसे खाते जो सिर्फ पैसे घुमाने के लिए बनाए जाते हैं—इस पूरे नेटवर्क की रीढ़ थे।
स्टेप-5: दुबई से ऑपरेशन, भारत में वार
इस पूरे सिंडिकेट का सबसे खतरनाक पहलू—इसका इंटरनेशनल कनेक्शन। फर्जी DSC दुबई में डाउनलोड किए जाते थे, वहीं से लॉगिन कर ट्रांजैक्शन किए जाते थे। यानी अपराध भारत में हुआ, लेकिन “कंट्रोल रूम” विदेश में बैठा था जिससे जांच और भी जटिल हो गई।
एक सिग्नेचर = 93 लाख का नुकसान
पुलिस के मुताबिक, एक डिजिटल सिग्नेचर से ही 93 लाख रुपए तक की धोखाधड़ी की गई। अब तक 400 से ज्यादा फर्जी DSC बनाए जा चुके हैं और हर एक से औसतन 1 करोड़ का फ्रॉड संभव। यानी कुल नुकसान 400 करोड़ रुपए तक।
फर्जीवाड़े की हद: महिला के नाम पर पुरुष की फोटो
आरोपियों ने जांच एजेंसियों को गुमराह करने के लिए दस्तावेजों में भी चालाकी दिखाई।
महिला के नाम पर पुरुष की फोटो लगाकर पहचान को और जटिल बना दिया गया ताकि KYC सिस्टम भी धोखा खा जाए।
गिरफ्तारियां और गैंग का नेटवर्क
जयपुर पुलिस ने 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया है जोधपुर और पाली से। इनमें 4 आरोपी डिजिटल सिग्नेचर बनाने में एक्सपर्ट हैं। लेकिन असली तस्वीर इससे बड़ी है 13 से 15 लोगों का संगठित गैंग, जिसमें टेक्निकल एक्सपर्ट, डॉक्यूमेंट फर्जीवाड़ा करने वाले और फाइनेंशियल चैनल संभालने वाले शामिल हैं।
सबसे बड़ा सवाल: सिस्टम इतना कमजोर क्यों?
इस केस ने दो बड़े सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं
DGFT पोर्टल
ICEGATE सिस्टम
क्या KYC वेरिफिकेशन सिर्फ कागजों तक सीमित है?
क्या डिजिटल सिग्नेचर जारी करने वाली एजेंसियों की जांच पर्याप्त नहीं?
यह चोरी नहीं, ‘डिजिटल लूट’ है
जयपुर का यह मामला साफ बताता है अब अपराधी तिजोरी नहीं तोड़ते, सिस्टम हैक करते हैं।
वे बंदूक नहीं उठाते, बल्कि डेटा चुरा लेते हैं।
यह सिर्फ 400 करोड़ का घोटाला नहीं यह उस भरोसे पर हमला है, जिस पर पूरा डिजिटल इंडिया खड़ा है।
अगर अब भी सिस्टम नहीं सुधरा, तो अगला शिकार कोई भी कंपनी हो सकती है—और अगली रकम, शायद इससे भी बड़ी।
लेखक के बारे में
Sachin Sharmaसचिन शर्मा | वरिष्ठ पत्रकार (राजस्थान)
सचिन शर्मा राजस्थान के एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में राजस्थान सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डिजिटल जर्नलिज्म तक, सचिन ने समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हमेशा प्राथमिकता दी है।
सचिन शर्मा का पत्रकारिता करियर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शुरू हुआ, जहां उन्होंने जी राजस्थान में लगभग 3 वर्षों तक मेडिकल और एजुकेशन बीट पर रिपोर्टर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा नीतियों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर गहन और तथ्यपरक रिपोर्टिंग की। इसके बाद प्रिंट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय रहते हुए उन्होंने राजनीति, प्रशासन, सामाजिक सरोकार और जन आंदोलन जैसे विषयों पर भी व्यापक कवरेज किया।
शैक्षणिक रूप से, सचिन शर्मा ने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया है, जिससे उन्हें फाइनेंस और आर्थिक मामलों की मजबूत समझ मिली। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर पत्रकारिता की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दक्षता हासिल की। सचिन शर्मा तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और पाठकों के विश्वास को पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।
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