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देखिए झारखण्ड में मिथिला पेंटिंग

देखिए झारखण्ड में मिथिला पेंटिंग
झारखंड की राजधानी रांची के पास एक खूबसूरत सा झरना है जोन्हा। कुछ दिनों पहले इसके आसपास के नक्सल प्रभावित इलाके कोयनारडीह, पइका, गौतमधारा, जराटोली, अमरूद बगान लेप्सर, झूझीगाढ़, जिद्दू के लोगों के जिंदगी में कुछ नौजवानों की पहल से मिथिला (मधुबनी) पेंटिंग ठंडी हवा के झोंके की तरह से आई। फोटो: आनंद दत्ता
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जोन्हा से सटे चंदाडीह गांव के एक चबुतरे पर पिछले 28 सितंबर से मधुबनी पेंटिंग का वर्कशॉप चल रहा है। फोटो: आनंद दत्ता
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सभी को मधुबनी से आई शालिनी कर्ण और बीएचयू के अविनाश कर्ण पूरी तन्मयता से पेंटिंग सिखा रहे हैं। फोटो: आनंद दत्ता
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शालिनी के मुताबिक सरकार और नक्सली अपनी लड़ाई में लगे हुए हैं। परेशानी दोनों के बीच में रह रहे लोगों को है। इनके लिए कला क्रांति लाना जरूरी है। फोटो: आनंद दत्ता
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10 किमी साइकिल चलाकर आए निरंजन बेदिया बिना सांस लिए फटाफट पेंटिंग करने में जुट गए हैं। वह रोज साइकिल चलाकर कोयनारडीह से सीखने आते। फोटो: आनंद दत्ता
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कभी मजदूरी तो कभी जंगलों में जलावन काटने का काम करते हैं। डरे सहमे से दिख रहे निरंजन ने बताया कि कई बार खेती चौपट हो जाती है तो काम नहीं मिलता। फोटो: आनंद दत्ता
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जंगल से लकड़ी काटकर खाने का जुगाड़ हो जाता है। अब पेंटिंग से इस कमी को पूरा करने का भरसक कोशिश करेंगे। कभी सपने में भी नहीं सोचे थे कि इ काम भी करेंगे। फोटो: आनंद दत्ता
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सुनीता देवी कभी बेतरा में रखे एक साल के बच्चे को संभाल रही है तो कभी कूची को। वह हर दिन 9 बजे तक घर का सारा काम निबटा कर, मुर्गियों को खाना खिलाकर यहां पहुंच जाती है। फोटो: आनंद दत्ता
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28 साल की यह महिला नक्सली और सरकारी बंदूकों के बीच एक अलग दुनिया को ओर बढ़ रही है। फोटो: आनंद दत्ता
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इनकी तरह मइनी देवी, राजकिशोर उरांव, रथुआ बेदिया, बुधेश्वर महतो, दशमी कुमारी, सुकरमनी कुमारी, सीमा मुंडा, कांजो देवी, धर्मनाथ महतो, रजनी कच्छप जैसे कई लोग हैं। फोटो: आनंद दत्ता
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पिछले 12 साल से पेंटिंग कर रही शालिनी कर्ण के मुताबिक वह इनकी प्रतिभा से भौचक है। केवल 7 दिन में इसकी सफाई के साथ किसी को पेंटिंग सीखते नहीं देखा। यदि इनके साथ लगातार 6 महीना काम किया जाए को यह पूरी तरह तैयार हो जाएंगे। फोटो: आनंद दत्ता
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अविनाश कहते हैं कि यहां आने से पहले सोचा था कि सात दिन में बेसिक भी सिखा पाया तो बहुत होगा। क्योंकि किसी ने कभी ब्रश नहीं पकड़ा था। मधुबनी पेंटिंग के बारे में जानना तो दूर की बात। लेकिन जिस तरह से सभी ने रुचि दिखाई, वह बड़ी उम्मीद जगाती है। फोटो: आनंद दत्ता
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पेंटिंग की तरह इनके सपने भी रंगीन हैं। सीमा देवी कहती हैं कि वह अपनी पेंटिंग दुनिया को दिखाना चाहती हैं। साथ ही अपने ग्रुप के लोगों की पेंटिंग को भी। फोटो: आनंद दत्ता
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पूरे वर्कशॉप को कॉर्डिनेट कर रहे मंगेश झा ने बताया कि इनके इस मेहनत को होटवार के रामदयाल कलाभवन में एग्जिबिशन लगाने की कोशिश करेंगे। नाम रखा है पहला प्रयास। फोटो: आनंद दत्ता
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पूरा वर्कशॉप इमली के इस 100 साल से अधिक पुराने पेड़ के नीचे चला। अंतिम दिन सभी पेंटिंग को इस पेड़ पर लगा दिया गया।
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पहले दिन साड़ी पर बनी पेंटिंग दिखाकर लोगों को उत्साहित किया गया कि वह भी ऐसा बना सकते हैं।
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सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र रही सुनीता देवी। यह हर दिन बेतरा में अपने बच्चे को रखकर सीखने आती रहीं।
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