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लोकसभा चुनाव : चुनाव दर चुनाव बदले लोकतंत्र के रंग, जानें कैसा रहा अब तक का सफर

हिटी, नई दिल्ली
elections in india
17वीं लोकसभा के लिए चुनावों के आखिरी चरण का शोर अब थम चुका है। रविवार को सातवें चरण में बची 59 सीटों पर भी मतदान हो जाएगा। देश की कमान एनडीए के हाथ में रहेगी या यूपीए गठबंधन फिर से सत्ता में काबिज हो पाएगा या फिर हमें इस बार तीसरे मोर्चे की सरकार देखने को मिलेगी, ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हमें 23 मई को ही मिल पाएगा। पर यहां तक पहुंचने के लिए देश ने 1951 से अब तक 16 लोकसभा चुनावों का सफर तय किया है। करीब 68 साल के लंबे सफर में कुछ ऐसे अहम पड़ाव भी रहे, जो देश के राजनीतिक इतिहास में हमेशा खास जगह रखेंगे। चुनाव दर चुनाव लोकतंत्र के बदलते रंग पर एक नजर...
1951-52 elections
1951-52 : लोकतंत्र का पहला पर्व पूरी दुनिया ने देखा आजादी मिलने के बाद 1950 में भारत गणतंत्र बन चुका था, लेकिन सभी की नजरें इस पर थी कि भारत लोकतांत्रिक देश कब बनेगा। 1951-52 में आखिरकार पहली बार लोकसभा चुनाव का आयोजन हुआ। इनके लिए महिला-पुरुष में भेदभाव बिना सभी वयस्कों को मताधिकार दिया गया। यह एक ऐसी उपलब्धि थी, जिसे दुनिया ने सराहा। 479 सीटें और 17.3 करोड़ मतदाता थे 45.7% मतदान हुआ और364 सीटें कांग्रेस पार्टी ने जीतीं पहले चुनाव में 14 राष्ट्रीय दल शामिल हुए। 1874 उम्मीदवार थे जिनमें 745 की जमानत जब्त हुई। कुल 68 चरणों में हुए मतदान में 10.45 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। 3.8 लाख रिम कागज का इस्तेमाल किया गया। विभिन्न पार्टी के मतपत्रों को अलग-अलग रंग दिया गया था ताकि अशिक्षित लोग भी वोट कर सकें रेडियो और फिल्मों के माध्यम से चुनाव आयोग ने मतदान के बारे में लोगों को समझाया जवाहर लाल नेहरू ने अपने प्रचार में सांप्रदायिकता को मुद्दा बनाया जबकि बाबा साहेब आंबेडकर ने नेहरू की नीतियों पर निशाना साधा
1977 elections
1977 : आपातकाल के बाद चुनाव में इंदिरा हारीं देश आपातकाल के दंश को झेल चुका था। 1977 में इंदिरा गांधी ने आम चुनाव कराने की घोषणा कर दी। जेल में बंद सभी राजनैतिक कैदी रिहा कर दिए गए। इंदिरा को उम्मीद थी कि देश की जनता से उन्हें पहले जैसा समर्थन मिलेगा, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। 32.11 करोड़ मतदाता। 60.49% मतदान। 345 सीटें तत्कालीन जनता पार्टी ने जीती। कांग्रेस के खाते में 189 सीटें गईं। 55 हजार से ज्यादा मतों से हारीं इंदिरा गांधी रायबरेली से। अमेठी सीट से संजय गांधी को भी शिकस्त मिली। 2439 कुल उम्मीदवार सियासी समर में कूदे थे, जिनमें 1224 निर्दलीय शामिल। 1356 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी 23.4 करोड़ रुपये खर्च हुए थे पूरे चुनाव पर। कांग्रेस के खिलाफ लामबंद विपक्ष ने आपातकाल और नसबंदी को बड़ा मुद्दा बनाया। लोगों को जनता पार्टी की दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली रैली में जाने से रोकने के लिए सरकार ने टीवी पर उस समय की हिट फिल्म ‘बॉबी’ का प्रसारण किया।
1984 elections
1984 : कांग्रेस को मिली ऐतिहासिक जीत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ समय बाद ही 1984 में देशभर में चुनाव कराए गए। हालांकि पंजाब और असम में 1985 में मतदान हुए। प्रधानमंत्री की हत्या से पूरे देश में शोक की लहर थी और कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। लोकसभा चुनावों के इतिहास में पहली बार किसी दल ने 400 से ज्यादा सीटें जीतीं। 514 सीटें। 63.56% मतदान। 37.95 करोड़ मतदाता। कांग्रेस को 414 सीटों पर जीत मिली लोकसभा चुनाव के इतिहास में पहली बार किसी दल को 400 से ज्यादा सीटें हासिल हुई थीं। दो सीटें जीती थीं पहली बार चुनाव लड़ रही भाजपा ने। 3894 निर्दलीयों समेत 5492 कुल उम्मीदवार चुनाव मैदान ने किस्मत आजमाई थी, 4382 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी, इनमें 3830 निर्दलीय शामिल। मेगास्टार अमिताभ बच्चन कांग्रेस के टिकट पर इलाहाबाद से चुनाव मैदान में उतरे थे। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा को करारी शिकस्त दी थी। (नोट : बाकी 27 सीटों पर 1985 में चुनाव हुआ)
1989 elections
1989 : राजीव सर्वाधिक सीटें लेकर भी विपक्ष में बैठे साल 1989 में नौंवी लोकसभा के लिए चुनाव भी काफी रोचक रहे। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन सरकार बनाने के बजाय विपक्ष में बैठी और विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के 10वें प्रधानमंत्री बने। यही वह दौर था जब भारत में गठबंधन की सरकार बनने की शुरुआत हुई। 49.89 करोड़ मतदाता। 61.95% मतदान। 197 सीटें कांग्रेस, 143 जनता दल और 85 भाजपा को मिलीं। एनटी रामाराव के नेतृत्व में जनता दल, टीडीपी, द्रमुक, असम गण परिषद जैसे दलों को शामिल कर नेशनल फ्रंट का गठन किया गया। वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। 6160 कुल उम्मीदवारों ने लड़ा चुनाव, इनमें 3713 निर्दलीय शामिल। 5003 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। राजीव गांधी ने पहली बार प्रचार में विज्ञापन जगत के पेशेवरों का सहारा लिया।
1999 elections
1999 : पहली बार एनडीए ने चलाई पांच साल सरकार 1984 में पहली बार चुनाव लड़ने वाली भाजपा को महज 2 सीटें मिली थीं। इसके बाद पहले 13 दिन फिर 13 महीने की सरकार चलाने के बाद 1999 में एनडीए ने तीसरी बार सरकार बनाई, जो पांच साल चली। अटल विहारी बाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा समेत 15 दल एकजुट हुए और देश में स्थिरता का दौर देखने को मिला। 543 सीटें, 61.95 करोड़ मतदाता। 59.99% मतदान। 182 सीटें भाजपा और 114 सीटें कांग्रेस को। 4648 प्रत्याशियों ने भाग्य आजमाया, इनमें से 3400 की जमानत जब्त हुई। 169 दल चुनाव में शामिल हुए। 947.68 करोड़ रुपये खर्च हुए थे इस चुनाव में। मतपत्रों के साथ होने वाला आखिरी लोकसभा चुनाव था यह। 1998 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला था, उनकी नागरिकता को एनडीए ने बड़ा मुद्दा बनाया।
2014 elections
2014 : भाजपा को पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल हुआ अर्से तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में कदम रखा। मोदी लहर में पहली बार भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। भाजपा ने अकेले पूर्ण बहुमत पाने के बाद केंद्र में सहयोगी दलों के साथ मिलकर एनडीए सरकार बनाई। मोदी लहर इस कदर हावी थी कि पिछली दो बार की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी महज 44 सीटों पर सिमट गई। 543 सीटें। 81.45 करोड़ वोटर। 66.40% मतदान। 282 सीटें भाजपा को, कांग्रेस 44 सीटों पर सिमटी। 8251 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे थे, 7000 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी, जिनमें 525 महिलाएं शामिल। 464 दलों ने चुनाव में भाग लिया, लोकसभा चुनाव में पहली बार नोटा का प्रयोग हुआ, 22268 वोट नोटा को गए। 10 चरणों में हुए चुनाव पर 3426 करोड़ खर्च आया।, ‘अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे के शाथ भाजपा पूरे चुनाव में भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस पर हमलावर रही।
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  • Web Title:lok sabha elections know how elections changed from 1951 to 2014 and the journey all about