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डायबिटीज की गिरफ्त में तो नहीं आ रहा आपका बच्चा, क्लिक कर जानिए क्या हैं लक्षण और कैसे करें देखभाल

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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बच्चों में डायबिटीज की समस्या इधर कुछ वर्षों में गंभीर रूप में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, टाइप 1 डायबिटीज के 75 प्रतिशत से ज्यादा मामले 18 साल से कम के लोगों में पाए जाते हैं। जो बच्चे मोटे हैं, उनमें टाइप 2 डायबिटीज आम है। आखिर क्या है यह समस्या और इसे कैसे नियंत्रित कर सकते हैं, जानकारी देता आलेख बच्चों में होने वाली डायबिटीज की समस्या को पहले ‘जुवेनाइल डायबिटीज’ कहा था। यह टाइप 1 डायबिटीज है। यह तब होता है, जब पैंक्रियाज इन्सुलिन बनाने में नाकाम रहते हैं। इससे ग्लूकोज के मेटाबोलाइज होने की प्रक्रिया पूरी नहीं होती है और यह रक्त कोशिकाओं में गए बगैर खून में जमा हो जाता है, जो खतरनाक हो सकता है। टाइप 2 डायबिटीज तब होता है, जब पैंक्रियाज ठीक से काम नहीं करता है और इससे इन्सुलिन का बनना कम होता है। नतीजतन खून के प्रवाह में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है। टाइप 2 डायबिटीज के लिए युवाओं में मोटापे के अलावा जो अन्य जोखिम कारण हैं, वे हैं डायबिटीज का पारिवारिक इतिहास, निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति आदि।
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कैसी हो देखभाल : स्वास्थ्य की देखभाल से संबंधित रणनीति परिवार की सक्रियता, मनोवैज्ञानिक परिपक्वता आदि के अनुसार होनी चाहिए। अपनी देखभाल की मरीज की योग्यता, स्कूल के माहौल में उसका ख्याल कितनी अच्छी तरह रखा जाता है, आदि अनेक बातें हैं, जो इसके उपचार के लिए सही रास्ता चुनने में मदद करती हैं।
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बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज के आम लक्षण : ’ प्यास और भूख बढ़ना ’ बार-बार पेशाब आना ’ अचानक वजन कम होना और थकान महसूस होना ’ सांसों में फल जैसी महक रहना ’ चिड़चिड़ापन रहना ’ धुंधला दिखना ’ कटने या जख्म को ठीक होने में जरूरत से ज्यादा समय लगना।
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टाइप 2 डायबिटीज के लक्षण : टाइप 1 डायबिटीज के सभी लक्षण होते हैं, खासतौर से रात में बार-बार पेशाब आना, त्वचा पर गहरे निशान दिखना।
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डायबिटीज का उपचार : डायबिटीज का प्रबंधन व्यायाम, पोषक भोजन और दवाओं के उपयुक्त सेवन से किया जा सकता है। यह भी जरूरी है कि इन बातों को गंभीरता से लिया जाए। बीमारी का पता चलने पर दी जाने वाली मनोवैज्ञानिक और डॉक्टरी सहायता से बच्चे की समस्या पर काबू पाने में काफी सफलता मिलती है।
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सेल्फ मैनेजमेंट प्रोग्राम का सहारा लें : डायबिटीज सेल्फ मैनेजमेंट एजुकेशन एंड सपोर्ट (डीएसएमईएस) उपचार का आधार है। वयस्क की निगरानी और खुद से की जाने वाली देखभाल में संतुलन आवश्यक है। मरीज और उसके परिवार को डायबिटीज के स्वप्रबंध के बारे में बताया जाना चाहिए। इसमें डॉक्टर से पहली मुलाकात शामिल है। रणनीति का मूल्यांकन हर बार करना चाहिए। ग्लूकोज लेवल की खुद से निगरानी करनी चाहिए।
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मनोवैज्ञानिक मामलों से निपटें: उन मनोवैज्ञानिक मामलों और पारिवारिक तनावों का डॉक्टरी आकलन होना चाहिए, जो डायबिटीज मैनेजमेंट को प्रभावित कर सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से सहायता लेनी चाहिए, ताकि डायबिटीज प्रबंध के साथ किशोरों में हार्मोन परिवर्तन से होने वाले मनोवैज्ञानिक मामलों को समझने में सहायता मिले।
गर्भावस्था के बारे में जागरूकता बढ़ाएं : किशोरियों और गर्भधारण करने की उम्र वाली महिलाओं को यह बताया जाना चाहिए कि बगैर योजना बनाए गर्भ धारण करने तथा खराब मेटाबोलिज्म के जोखिम क्या हैं। गर्भधारण से पहले प्रभावी योजना बनाना और विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है।
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दवाओं से उपचार : टाइप 1 डायबिटीज का इलाज मुख्य रूप से इंटेंसिव इंसुलिन रेजीमेन से किया जाता है। इसमें रोज कई इंजेक्शन लेने होते हैं या लगातार इंसुलिन का सहारा लेना पड़ता है। इसके अलावा खून में ग्लूकोज का स्तर भी रोज कई बार देखने की आवश्यकता होती है। सुरक्षा के लिए इसकी आवश्यकता अक्सर पड़ती है और एक दिन में कई बार इसकी जरूरत हो सकती है। जल्दी और लंबे समय तक काम करने वाला इंसुलिन एनालॉग, लो ग्लूकोज इंसुलिन पंप्स और ऑटोमेटेड इंसुलिन डिलीवरी सिस्टम उत्कृष्ट ग्लाइसेमिक नियंत्रण मुहैया कराते हैं, जिससे हाइपोग्लाइसेमिया का जोखिम बहुत कम होता है। एलडीएल कोलेस्ट्रॉल और लिपिड प्रोफाइल की वार्षिक निगरानी जरूरी है। इस दौरान कोई समस्या होने पर जरूरी कदम उठाना आवश्यक हो जाता है।
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मोटापे के लिए जीवनशैली का प्रबंधन: टाइप 2 डायबिटीज के लिए मोटे युवा मरीजों को अपना वजन 7-10 प्रतिशत कम करने के लिए वर्क आउट करना चाहिए। रोज एक घंटे की ठीक-ठाक या जोरदार शारीरिक गतिविधि से आरामतलब जीवनशैली को सुधारने में सहायता मिलती है। स्वस्थ भोजन शैली अपनाएं। उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों के साथ एक डाइट प्लान और ज्यादा कैलरी वाला खाना कम खाने से लाभ होता है। इसमें मीठे पेय का सेवन कम करना महत्वपूर्ण है।
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तेजी से बढ़ते हैं लक्षण : टाइप 1 डायबिटीज के लक्षण कुछ ही हफ्ते में तेजी से विकसित होते हैं, जबकि टाइप 2 के लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं और इन्हें कुछ महीने या साल बाद ही देखा जा सकता है। (क्लिनिक एप के सीईओ सतकाम दिव्य से की गई बातचीत पर आधारित)
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  • Web Title:know about symptoms of diabetes in kids