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आपकी आंखों की रोशनी न छीन ले ग्लूकोमा, जानिए इसके बारे में अहम बातें

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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ग्लूकोमा आंखों की एक गंभीर समस्या है, जिसमें आंखों की रोशनी भी जा सकती है। तेजी से बढ़ रही इस समस्या के प्रति जागरूकता की जरूरत समझते हुए आगामी 10 से 16 मार्च के बीच विश्व ग्लूकोमा सप्ताह मनाया जाएगा। आप भी अपनी आंखों को स्वस्थ कैसे रख सकते हैं, इस मौके पर जानकारी दे रही हैं राजलक्ष्मी त्रिपाठी
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आंखों की बनावट एक गुब्बारे की तरह होती है। इसके भीतर एक तरल पदार्थ भरा होता है। आंखों के अंदर का यह तरल पदार्थ आंखों के भीतर लगातार बनता रहता है और बाहर निकलता रहता है, जिससे आपकी आंखों को नमी मिलती रहती है और आप सूखी आंखों की समस्या से बचे रहते हैं। लेकिन जब आंखों के भीतर के इस तरल पदार्थ के बनने और बाहर निकलने की प्रक्रिया में किसी किस्म की दिक्कत आती है, तो आंखों में दबाव बढ़ जाता है। आंखों में कुछ ऑप्टिक नर्व होती हैं, जो किसी वस्तु के बारे में दिमाग तक संकेत पहुंचाने में सहायक होती हैं। आंखों पर पड़े दबाव की वजह से इन ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है, जिसकी वजह से धीरे-धीरे आंखों की रोशनी कम होने लगती है। इसी स्थिति को ग्लूकोमा कहते हैं। ग्लूकोमा को आम भाषा में काला मोतिया के नाम से भी जाना जाता है। अगर सही समय पर इसकी जांच न करवायी जाए, तो इसकी वजह से मरीज की आंखों की रोशनी जा सकती है। पहले इस समस्या से 40 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोग ही ग्रसित होते थे, लेकिन वर्तमान में बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
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कैसा होता है काला मोतिया आमतौर पर ग्लूकोमा या काला मोतिया दो प्रकार का होता है—ओपन एंगल ग्लूकोमा और क्लोज एंगल ग्लूकोमा। जब कभी आंखों के बढ़े हुए दबाव की वजह से आंखों की ऑप्टिक नर्व खराब हो जाती हैं और उसकी वजह से नजर कमजोर होने लगती है, तो उसे ओपन एंगल ग्लूकोमा कहते हैं। इसमें आंखों की रोशनी धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसमें आंखों के भीतर मौजूद तरल पदार्थ को सुखाने वाली कनैल ब्लॉक हो जाती है, जिसकी वजह से आंखों का दबाव बढ़ जाता है। क्लोज एंगल ग्लूकोमा में आंखों को पोषण प्रदान करने वाले तरल पदार्थ का प्रवाह एकदम से रुक जाता है। इसकी वजह से सिर में तेज दर्द होना, दिखाई देना बंद हो जाना, आंखें लाल हो जाना, उल्टी और चक्कर आना, धुंधला दिखाई देना जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो एंगल्स पूरी तरह से बंद हो जाते हैं और मरीज को दिखायी देना एकदम से बंद हो जाता है।
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क्या हैं लक्षण ग्लूकोमा के कोई खास लक्षण नहीं होते। डॉक्टरों की मानें, तो इसके लिए नियमित तौर पर साल में दो बार अपनी आंखों की जांच करवाएं और अगर डॉक्टर आपसे ग्लूकोमा की जांच करवाने के लिए कहे, तो उसकी सलाह पर अमल करें। ओपन एंगल ग्लूकोमा का तो कोई भी लक्षण नहीं होता है, लेकिन क्लोज एंगल ग्लूकोमा के कुछ सामान्य लक्षण हो सकते हैं। सामान्य लक्षण चश्मे के नंबर में बार-बार बदलाव। पूरे दिन काम करने के पश्चात शाम के समय आंखों में या सिर में तेज दर्द होना। बल्ब के चारों ओर इंद्रधनुषी रंग दिखना। अंधेरे कमरे में आने पर चीजों पर ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत महसूस होना। साइड विजन को नुकसान पहुंचता है, जिससे आप आसपास की चीजों को ठीक तरह से देख नहीं पाते हैं। बाकी विजन सामान्य रहता है।
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कौन होता है प्रभावित ग्लूकोमा आनुवंशिक बीमारी है। अगर परिवार में कोई सदस्य इस बीमारी से पीड़ित है, तो उस घर के बच्चे को यह बीमारी होने की ज्यादा आशंका होती है। आमतौर पर 40 साल की उम्र के बाद ग्लूकोमा होने की आशंका ज्यादा होती है, लेकिन वर्तमान में छोटे बच्चे भी इस बीमारी से पीड़ित हो रहे हैं। इससे बचने के लिए आंखों की नियमित तौर पर जांच करवाते रहना चाहिए। जो लोग अस्थमा या आथ्र्राइटिस जैसी बीमारी के लिए काफी समय से स्टेरॉएड ले रहे हैं, उनके ग्लूकोमा से पीड़ित होने की आशंका बढ़ जाती है। आंखों में हुआ कोई जख्म या सर्जरी भी ग्लूकोमा का कारक बन सकता है। जो लोग मायोपिया, डायबिटीज से पीड़ित हैं या उनका ब्लडप्रेशर घटता-बढ़ता रहता है, उनके अन्य लोगों के मुकाबले ग्लूकोमा से पीड़ित होने का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है।
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जांच है जरूरी अगर ग्लूकोमा की जांच पहले ही करा ली जाए, तो इसका उपचार किया जा सकता है। ग्लूकोमा हो जाने के बाद इसे ठीक करना बेहद मुश्किल हो जाता है। 40 वर्ष की आयु के बाद तो नियमित जांच करवाते रहें। इस जांच में विजन टेस्ट को भी शामिल करना चाहिए। आई प्रेशर मैनेजमेंट, कम रोशनी में आंखों के रेटिना की जांच के साथ-साथ ऑप्टिव नर्व की भी जांच करवाते रहें।
कैसे होगा इलाज ग्लूकोमा का उपचार उसकी स्थिति और प्रकार पर निर्भर करता है। इसे ठीक करने के लिए लगातार दवाओं का सेवन करना पड़ता है। अगर यह शुरुआती अवस्था में है, तो ज्यादातर मामलों में यह दवाओं से नियंत्रण में आ जाता है। लेकिन एक अवस्था ऐसी भी आती है, जिसमें कोई भी दवा कारगर नहीं होती। ऐसे में मरीज की लेजर सर्जरी करानी पड़ती है। सर्जरी के दौरान आंखों को थोड़ी देर के लिए सुन्न किया जाता है, फिर लेजर तकनीक से इसका इलाज किया जाता है। अभी तक ग्लूकोमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है। शोधकर्ता अपने शोध में ग्लूकोमा के लिए जिम्मेदार जीन का पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि जीन का पता चल जाए, जो ग्लूकोमा के लिए जिम्मेदार है, तो मरीज की आंखों की रोशनी बचाई या वापस लाई जा सकती है।
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सफेद मोतिया-ग्लूकोमा में अंतर ग्लूकोमा और सफेद मोतियाबिंद एक-दूसरे से अलग हैं। ग्लूकोमा में अगर एक बार आंखों की रोशनी चली जाए, तो वह दुबारा किसी भी इलाज से वापस नहीं आ सकती, क्योंकि अभी तक इसका कोई भी इलाज उपलब्ध नहीं है। मोतियाबिंद पक जाने पर ऑपरेशन करवा देने के बाद आंखों की रोशनी दुबारा वापस आ जाती है। मोतियाबिंद पकने पर ऑपरेशन न करवाया जाए, तो ग्लूकोमा हो सकता है।
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इन बातों का रखें ध्यान ग्लूकोमा आनुवंशिक बीमारी है। इस बीमारी से बच्चों के पीड़ित होने की आशंका ज्यादा होती है। अगर घर में ग्लूकोमा का कोई मरीज है, तो ऐसे में बच्चों की आंखों की जांच जरूर करा लें। आंखों की एलर्जी, अस्थमा, चर्म रोग या किसी अन्य रोग के लिए प्रयोग की जाने वाली स्टेरॉएड दवाओं की वजह से आंखों में दिक्कत आ जाती है। ऐसी दवाओं का सेवन करने से परहेज करें। आंखों में दर्द होने या आंखें लाल हो जाने की स्थिति में नेत्र रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें। आंखों में किसी वजह से चोट लग गयी है, तो तुरंत इसका इलाज करवाएं, क्योंकि भविष्य में इस चोट की वजह से आपको ग्लूकोमा की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। अगर आंखों की किसी किस्म की सर्जरी हुई हो या घाव हो गया हो, तो उसकी समय-समय पर जांच करवाते रहें, क्योंकि इसकी वजह से ग्लूकोमा होने का खतरा बढ़ जाता है। अगर आपके चश्मे का नंबर जल्दी-जल्दी बदल रहा है, तो तुरंत ही डॉक्टर से संपर्क करें। आप सीधे देख रहे हों, लेकिन आपको अपनी आंखों के किनारों से नजर ना आ रहा हो, तो आंखों की जांच कराएं। आंखों में, सिर में और पेट में होने वाले दर्द को नजरअंदाज ना करें। अपने आहार में बादाम, दूध, संतरे का जूस, खरबूजे, अंडा, सोयाबीन का दूध, मूंगफली, गाजर और हरी पत्तेदार सब्जियों को शामिल करें।
आनुवंशिक भी है ये बीमारी भारत में नेत्र रोग विशेषज्ञों ने दो सौ मरीजों पर किये अपने शोध में यह पाया है कि यह आनुवंशिक बीमारी है। इस बीमारी का शिकार वे लोग ज्यादा होते हैं, जिनके परिवार में इस बीमारी से पीड़ित कोई व्यक्ति है। (वसंत कुंज स्थित इंडियन स्पाइनल इंजरीज सेंटर के वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. आलोक गुप्ता से की गई बातचीत पर आधारित)
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