Diabetes can be controlled just follow these things - नियंत्रित हो सकती है डायबिटीज, बस इन बातों पर करें अमल 1 DA Image
17 नबम्बर, 2019|5:52|IST

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नियंत्रित हो सकती है डायबिटीज, बस इन बातों पर करें अमल

हिन्दुस्तान फीचर टीम, नई दिल्ली
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मधुमेह आज एक गंभीर समस्या बन चुकी है। जीवनशैली से संबंधित बीमारियों में प्रमुखता से शामिल मधुमेह यानी डायबिटीज की चपेट में हर उम्र के लोग आ रहे हैं। 14 नवंबर को विश्व डायबिटीज दिवस है। इस मौके पर विशेषज्ञों से बातचीत कर इस बीमारी के बारे में जानकारी दे रही हैं इंद्रेशा समीर डायबिटीज एक बार हो जाए तो उम्र भर का अभिशाप बन जाती है। दुनिया में सबसे ज्यादा डायबिटीज के रोगी इस समय हमारे देश में हैं। एक अध्ययन के अनुसार, सात करोड़ से ज्यादा हिदुस्तानी डायबिटीज रोगियों में शामिल हैं, जिनकी संख्या अगले 10 साल तक 15 करोड़ के पार भी जा सकती है। इन हालात के बावजूद चिंताजनक यह है कि इस बीमारी के प्रति लोग अभी भी उतने जागरूक नहीं हैं, जितना होना चाहिए। 15 से 49 आयु वर्ग के हमारे देश के सिर्फ आधे वयस्क ही डायबिटीज की स्थिति के बारे में ठीक-ठाक ढंग से जानकारी रखते हैं।
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कैसे होती है डायबिटीज सामान्य भाषा में कहें तोजब हमारे शरीर में किसी वजह से ग्लूकोज को अवशोषित करने की क्षमता खत्म हो जाती है तो डायबिटीज की बीमारी पैदा होती है। असली भूमिका है इंसुलिन नाम के हार्मोन की, जो शरीर के भीतर आहार को ऊर्जा में बदलने का काम करता है। इसी की वजह से शरीर में ग्लूकोज नियंत्रण में रहता है। जब पैंक्रियाज से इंसुलिन का स्राव कम हो जाता है, तो रक्त में इसकी मात्रा बढ़ जाती है। बीमारी का चेहरा पहचानें डायबिटीज के अब तक दो रूप माने जाते रहे हैं। टाइप-1 और टाइप-2, टाइप-1 डायबिटीज का मुख्य लक्षण शरीर में इंसुलिन का बनना बंद होना है, जबकि टाइप-2 की स्थिति में शरीर में इंसुलिन का जरूरत के हिसाब से निर्माण नहीं होता या इसका इस्तेमाल ठीक ढंग से नहीं हो पाता। इंसुलिन का निर्माण रुक क्यों जाता है, इसका अभी पता नहीं लग पाया है, पर चिकित्सा विज्ञानियों की एक धारणा है कि टाइप-1 डायबिटीज के कारणों में आनुवंशिकता और वायरल इन्फेक्शन विशेष रूप से शामिल हैं। टाइप-2 डायबिटीज में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के काम में रुकावट पैदा करने लगती हैं, पर उस रुकावट को दूर करने के लिए पैंक्रियाज उतने इंसुलिन का स्राव नहीं कर पाता, जितने की जरूरत होती है। इसके मूल कारण का अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं लगाया जा सका है, पर मोटापा, पर्यावरणीय कारक और आधुनिक जीवनशैली को इसके मुख्य कारणों के रूप में देखा जाता है। टाइप-2 आमतौर पर 45 साल की उम्र के बाद होता रहा है
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डायबिटीज की पांच श्रेणियां स्वीडन के ल्युड यूनिवर्सिटी डायबिटीज सेंटर और फिनलैंड के इंस्टीट्यूट फॉर मॉलिक्यूलर मेडिसिन ने 14,775 मरीजों पर व्यापक अध्ययन करने के बाद पाया कि डायबिटीज रोगियों को 5 अलग-अलग क्लस्टर में विभाजित किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन सबका इलाज भी अलग-अलग तरीके से किया जाना चाहिए। चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि टाइप-1 डायबिटीज को इम्यून सिस्टम से संबंधित गंभीर बीमारी की श्रेणी में रखा जाना चाहिए तथा टाइप-2 डायबिटीज को चार श्रेणियों में बांटा जाना चाहिए। लक्षणों पर ऱखें नजर ’प्यास ज्यादा लगना ’भूख ज्यादा लगना ’वजन बढ़ना या अकारण कम होने लगना ’थोड़ी मेहनत करने पर या अनायास थकान महसूस करना ’शरीर में पानी की कमी होना ’बार-बार मिचली महसूस होना ’सामान्य से ज्यादा पेशाब आना ’बार-बार मुंह सूखना ’अकारण वमन होना ’घाव लंबे समय तक ठीक न होना ’संक्रमण के प्रति अति-संवेदनशीलता ’आंखों से धुंधला दिखाई देना ’मुंह में अकसर छाले होना ’त्वचा में खुजली होना ’बार-बार फोड़े-फुंसी होना ’असामान्य चिड़चिड़ापन ’मसूड़ों से खून बहना
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डायबिटीज के बड़े खतरे ’डायबिटीज ज्यादा समय तक अनियंत्रित रहे तो हृदयाघात हो सकता है। ’ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने से हार्मोनल बदलाव होते हैं और कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होती हैं। ’आंखों की रोशनी कम हो सकती है या अंधापन पैदा हो सकता है। ’हाथ-पैरों में संक्रमण हो सकता है। ’प्रतिरक्षा प्रणाली इतनी कमजोर हो जाती है कि भांति-भांति की बीमारियां आसानी से आक्रमण करने लगती हैं। ’किडनी फेल हो सकती है।
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कब जाएं डॉक्टर के पास इसके प्रमुख लक्षण दिखाई दें तो अविलंब डॉक्टर की सलाह लें और सुनिश्चित करें कि आपको डायबिटीज तो नहीं। डॉक्टर कुछ टेस्ट का सुझाव दे सकते हैं। हीमोग्लोबिन ए1सी टेस्ट, र्फांस्टग प्लाज्मा ग्लूकोज टेस्ट (एफपीजी), ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी), रैंडम ब्लड शुगर जैसे टेस्ट कराए जा सकते हैं। बचाव के लिए क्या करें ’डायबिटीज होने पर मीठे खाद्य पदार्थों और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट वाली चीजों का सेवन तुरंत बंद करें। ’पानी खूब पिएं। ’शरीर का वजन बढ़ गया हो तो नियंत्रित करें। ’धूम्रपान और मद्यपान से बचें। ’पैदल टहलने की आदत बनाएं। ’योग-प्राणायाम और व्यायाम को अपनी दिनचर्या में प्रमुखता से शामिल करें। ’साल में एक बार शरीर और आंखों की जांच कराने का नियम बनाएं। ’आरामतलबी का जीवन छोड़कर सक्रिय दिनचर्या अपनाएं। ’नींद पर्याप्त लें और तनाव के कारणों से बचें। ’पांवों को गुनगुने पानी से प्रतिदिन धोएं। ’फाइबरयुक्त भोजन लें। ’विटामिन-डी की कमी न होने दें। ’सब्जियां, ताजे फल, साबुत अनाज का प्रचुर मात्रा में सेवन करें। ’ओमेगा-3 युक्त आहार का सेवन करें। ’दिन में थोड़ा-थोड़ा कई बार खाएं। ’गेहूं, जौ और इनसे आधी मात्रा में चना मिलाकर एक साथ पिसवाएं और इस आटे की बनी रोटियां खाएं। ’सब्जियों में करेला, लौकी, मेथी, तोरई, शलगम, बैंगन, परवल, मूली, ब्रोकली, बंदगोभी, टमाटर और पत्तेदार सब्जियां विशेष लाभप्रद हैं। ’फलों में पपीता, खरबूजा, अमरूद, संतरा, मौसमी, नाशपाती, आंवला, नींबू, जामुन जैसे फलों का सेवन किया जाना चाहिए। ’आलू, चावल, मक्खन आदि का सेवन कम करें। ’आंवला, हल्दी, जामुन के बीजों का चूर्ण, मेथी चूर्ण, करेला चूर्ण फायदेमंद हैं। ’प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार खानपान इस रोग को बेहतर ढंग से नियंत्रित रख सकता है। ’डायबिटीज को नियंत्रित रखने के लिए होम्योपैथी कारगर पद्धति है। इसकी कई दवाएं निरापद हैं और कुछ लोगों की बीमारी पूरी तरह से ठीक भी हो सकती है। ’योग विशेषज्ञों के अनुसार, डायबिटीज रोगियों को कपालभाति, अनुलोम-विलोम प्राणायाम और मंडूक आसन व सर्वांगासन अवश्य करना चाहिए। ये यौगिक क्रियाएं शरीर में हार्मोन स्राव को नियमित करने में मददगार हैं। (प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. ब्रजभूषण गोयल व आरोग्य निकेतन के डॉ. सुरेश यादव से की गई बातचीत पर आधारित)
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