
जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा की एक सदियों पुरानी अनोखी परंपरा है जो आज भी निभाई जाती है। भगवान जगन्नाथ का रथ उनके परम भक्त सालबेग की मजार पर कुछ देर के लिए जरूर रुकता है।

2/6बताया जाता है कि सालबेग के पिता मुगल सूबेदार थे और उनकी मां हिंदू थीं। युवावस्था में एक गंभीर बीमारी से ठीक होने के बाद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी भगवान जगन्नाथ की भक्ति में ही समर्पित कर दिया था।

3/6मुस्लिम समुदाय से होने के नाते सालबेग को जगन्नाथ मंदिर में एंट्री की अनुमति नहीं मिली थी। हालांकि फिर भी उन्होंने अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। उन्होंने कई भजन की रचना की और इनमें से आज एक जगन्नाथ पुरी के गर्भगृह में गाया जाता है।

4/6ऐसा कहा जाता है कि सालबेग भगवान जगन्नाथ का ही जाप किया करते थे। उनकी भक्ति को इतना सच्चा माना जाने लगा कि आज उनके भजन श्रद्धा से गाए जाते हैं। भगवान भी उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए थे।

5/6मान्यता है कि एक बार रथ यात्रा के दौरान सालबेग टाइम पर पुरी नहीं पहुंच पाए थे। ऐसे में उन्होंने भगवान से मन ही मन प्रार्थना की उनके आने तक रथ रुका रहे। हालांकि कहा जाता है कि उनकी कुटिया के पास पहुंचते ही भगवान का रथ अपने आप ही रुक गया था।

6/6जब सालबेग का निधन हुआ तभी उनकी मजार वही बनाई गई। तबसे लेकर आज तक रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ मजार के पास रोका जाता है। ये परंपरा सदियों से चली आ रही है।
