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हिंदू धर्म: मंदिर में नंगे पांव ही क्यों जाना चाहिए? जानिए इसके पीछे का कारण

हिंदू धर्म के मुताबिक, मंदिर जाते समय पवित्रता का विशेष ध्यान रखना बहुत जरूरी है। मंदिर में कई तरह के नियमों का पालन किया जाता है। इन्हीं में से एख नियम है जूते-चप्पल बाहर उतारकर नंगे पांव अंदर जाना। क्या यह सिर्फ परंपरा है या इसके पीछे आध्यात्मिक कारण है? आइए जानते हैं नंगे पांव मंदिर जाने के कारण।

Navaneet RathaurOct 28, 2025 04:57 pm IST
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पवित्रता और सम्मान का प्रतीक

मंदिर को भगवान का घर माना जाता है। भगवान के सम्मान और पवित्रता को बनाए रखने के लिए जूते-चप्पल प्रवेश द्वार के बाहर उतार देते हैं। जूते धूल-मिट्टी, कीटाणु लाते हैं, जो मंदिर की पवित्र ऊर्जा को प्रभावित कर सकते हैं। नंगे पांव जाना भगवान के प्रति सम्मान दिखाता है।

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विनम्रता और समानता का भाव

नंगे पांव चलना अहंकार त्यागने का प्रतीक है। अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का भेद मिट जाता है। सभी समान रूप से भगवान के सामने खड़े होते हैं। यह विनम्रता और भक्ति का भाव जगाता है।

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सेहत के लिए फायदेमंद

ज्यादातर मंदिरों के फर्श पर चंदन, हल्दी और सिंदूर का लेप लगाया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, लेप लगे फर्शों पर चलना हमारे सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है। इन तत्वों के लाभ ग्रहण करने के लिए मंदिर के अंदर बिना जूते-चप्पल का प्रवेश करना चाहिए।

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सकारात्मक ऊर्जा

मंदिर एक ऐसा स्थान हैं, जो आपको मानसिक शांति प्रदान करती है। ऐसे में जब आप मंदिर में नंगे पैर प्रवेश करते हैं, तो सकारात्मक ऊर्जा आपके पैरों के माध्यम से आपके शरीर में प्रवेश करती है। ये ऊर्जा आपके मन को शांत रखने में मदद करती है।

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एकाग्रता और ध्यान के लिए जरूरी

जूते-चप्पल पहनकर चलते हैं, तो दिमाग जूतों की सुरक्षा में लगा रहता है। नंगे पांव चलने से पैरों की त्वचा फर्श की ठंडक, गर्माहट या उसके बनावट को महसूस करती है। इससे ध्यान भटकता नहीं है और मन भगवान पर केंद्रित रहता है। योग और ध्यान में भी नंगे पांव रहने की सलाह दी जाती है।

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प्राचीन परंपरा और शास्त्रीय आधार

गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण में मंदिर में नंगे पांव जाने का उल्लेख है। वास्तु शास्त्र कहता है कि मंदिर का फर्श ऊर्जा का केंद्र है। जूते चमड़े या सिंथेटिक के होते हैं, जो अपवित्र होने के साथ ही ऊर्जा के अवरोधक हैं। नंगे पांव चलने से प्राण ऊर्जा का संचार बेहतर होता है। डिस्क्लेमर: यह खबर विभिन्न माध्यमों, धर्म ग्रंथों और विशेषज्ञों के सलाह पर आधारित है। किसी भी तरह की विशेष जानकारी के लिए धर्म विशेषज्ञ से उचित सलाह लें।