1/7ऋग्वेद के सूर्याविवाह सूक्त में कहा गया है कि 'वामे पाणिं गृहीत्वा' अर्थात दुल्हन दूल्हे के बाएं हाथ को पकड़कर चलती है। बायां पक्ष चंद्रमा और सोम का है जो शांति, प्रेम और समृद्धि देता है। दुल्हन बायीं ओर बैठकर दांपत्य जीवन में शांति और सौभाग्य लाती है।

मनुष्य का हृदय बाईं ओर धड़कता है। दुल्हन बायीं ओर बैठकर सीधे दूल्हे के हृदय से जुड़ती है। इससे पति-पत्नी में भावनात्मक एकता, विश्वास और अटूट प्रेम बना रहता है। दूल्हा दुल्हन के हृदय की रक्षा करता है और दुल्हन उसके हृदय में निवास करती है।

दूल्हा (शिव) दाईं ओर और दुल्हन (पार्वती) बाईं ओर बैठकर अर्धनारीश्वर रूप बनाते हैं। यह संकेत देता है कि विवाह के बाद दोनों एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। बायां भाग शक्ति और दायां शिव है – दोनों मिलकर पूर्ण ब्रह्म बनते हैं।

दुल्हन को लक्ष्मी और दूल्हे को नारायण कहा जाता है। श्री विष्णु की छाती में लक्ष्मी जी बायीं ओर विराजमान हैं। ठीक वैसे ही विवाह मंडप में दुल्हन बायीं ओर बैठकर घर में सुख-समृद्धि लाती है। दायीं ओर बैठने से लक्ष्मी रुष्ट हो सकती हैं।

पहले तीन फेरे दुल्हन आगे चलती है (धर्म, अर्थ, काम) और अगले चार फेरे दूल्हा आगे चलता है (मोक्ष)। लेकिन बैठते समय हमेशा दुल्हन बायीं ओर रहती है। इससे दंपति को धर्म और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। यह संतुलन जीवन भर बना रहता है।

जब दुल्हन बायीं ओर बैठती है तो दोनों का हृदय एक-दूसरे के सबसे करीब होता है। इससे दोनों की हार्टबीट एक-दूसरे को महसूस होती है। वैज्ञानिक अध्ययन कहते हैं कि ऐसा करने से कपल में भावनात्मक बॉन्डिंग बढ़ती है और तनाव कम होता है।

चाहे मंडप हो, स्टेज हो या फोटो खिंचवानी हो, दुल्हन हमेशा दूल्हे के बाएं रहे। यह परंपरा सदियों से सुखी दांपत्य जीवन का आधार है। डिस्क्लेमर: यह खबर धर्म ग्रंथों, सामान्य जानकारियों और धर्म विशेषज्ञों के सलाह पर आधारित है। किसी भी तरह की विशेष जानकारी के लिए धर्म विशेषज्ञ से उचित सलाह लें।
